ईरान का अमेरिका को दो टूक संदेश: ‘शांति या युद्ध—अब फैसला वॉशिंगटन करे’

ईरान का अमेरिका को दो टूक संदेश: ‘शांति या युद्ध—अब फैसला वॉशिंगटन करे’

मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच ईरान ने अमेरिका को साफ संदेश दिया है कि अब आगे का रास्ता वॉशिंगटन तय करे—कूटनीति या टकराव। तेहरान में विदेशी राजनयिकों से बातचीत के दौरान ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने कहा कि उनका देश दोनों परिस्थितियों के लिए तैयार है। यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के नए शांति प्रस्ताव को लेकर संदेह जताया है। ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि मौजूदा प्रस्ताव को स्वीकार करना आसान नहीं होगा।

ट्रंप का सख्त रुख, प्रस्ताव पर जताया अविश्वास

राष्ट्रपति ट्रंप ने एयर फोर्स वन में मीडिया से बातचीत के दौरान कहा कि वे प्रस्ताव की समीक्षा करेंगे, लेकिन इसकी सफलता को लेकर आश्वस्त नहीं हैं। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान ने अभी तक अपने पिछले व्यवहार के लिए पर्याप्त कीमत नहीं चुकाई है। इसके बाद सोशल मीडिया पर उन्होंने और सख्त रुख अपनाते हुए लिखा कि पिछले कई दशकों में ईरान के रवैये को देखते हुए इस प्रस्ताव को स्वीकार करना मुश्किल है। उनके बयान से साफ है कि अमेरिका फिलहाल दबाव बनाए रखने की रणनीति पर कायम है।

14 सूत्रीय प्रस्ताव में क्या है, क्यों अहम है होर्मुज स्ट्रेट

ईरान ने यह शांति प्रस्ताव पाकिस्तान के माध्यम से अमेरिका तक पहुंचाया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसमें 14 प्रमुख मांगें शामिल हैं। इनमें क्षेत्र से अमेरिकी सैनिकों की वापसी, होर्मुज स्ट्रेट पर नाकाबंदी हटाना, ईरान की जब्त संपत्तियों की वापसी और सभी आर्थिक प्रतिबंधों को खत्म करना शामिल है। इसके अलावा, लेबनान समेत विभिन्न मोर्चों पर संघर्ष खत्म करने और होर्मुज स्ट्रेट के लिए नया नियंत्रण तंत्र बनाने की बात भी कही गई है। दिलचस्प बात यह है कि ईरान ने परमाणु मुद्दे के समाधान से पहले ही इस अहम समुद्री मार्ग को खोलने का प्रस्ताव दिया है। होर्मुज स्ट्रेट वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का एक प्रमुख रास्ता है। यहां किसी भी तरह की रुकावट का असर सीधे तेल और गैस की कीमतों पर पड़ता है।

वैश्विक असर: तेल महंगा, बाजार में अनिश्चितता

इस पूरे गतिरोध का असर वैश्विक बाजारों पर साफ दिखाई दे रहा है। युद्ध जैसे हालात और नाकाबंदी के चलते तेल की कीमतों में करीब 50 प्रतिशत तक उछाल आ चुका है। अमेरिका ने भी शिपिंग कंपनियों को चेतावनी दी है कि अगर वे ईरान को किसी भी रूप में भुगतान करती हैं, तो उन्हें कड़े प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है। इसमें नकद के साथ डिजिटल लेनदेन और अन्य अप्रत्यक्ष तरीके भी शामिल हैं। दूसरी ओर, ईरान ने होर्मुज पर अपना नियंत्रण बनाए रखा है, जिससे आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव बना हुआ है। इसका असर सिर्फ ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि उर्वरक और अन्य जरूरी वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ रहा है।

आम आदमी के लिए क्या मतलब?

यह टकराव सिर्फ दो देशों के बीच की राजनीति नहीं है। इसका सीधा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जेब पर पड़ता है। तेल महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ती है, जिसका असर रोजमर्रा की चीजों की कीमतों पर दिखता है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत आगे बढ़ती है या तनाव और गहराता है। फिलहाल, दोनों देशों के रुख से साफ है कि स्थिति अभी भी संतुलन की नाजुक स्थिति में है।