जींद–सोनीपत रूट पर शुरू होगी देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन, कैसे बनता है ये फ्यूल और क्यों है खास?

जींद–सोनीपत रूट पर शुरू होगी देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन, कैसे बनता है ये फ्यूल और क्यों है खास?

Indian Railways’ First Hydrogen Train:कोयला, डीजल, बिजली के बाद भारतीय रेल ने हाइड्रोजन से ट्रेन चलाने का फैसला किया है. इसे जींद-सोनीपत मार्ग पर शुरू किया जाना है. तय है कि इसे अगर विस्तार मिल सका तो कॉर्बन उत्सर्जन कम करने की दिशा में भारत को बड़ी कामयाबी मिल सकती है. पर, इसमें अभी समय है. क्योंकि हाइड्रोजन से ट्रेन संचालन अभी शुरुआती चरण में है. अभी इस मुद्दे पर बहुत काम होना बाकी है. पर, पहल शानदार है तो इसके अन्य पहलुओं की चर्चा जरूरी है.

आइए, इसी बहाने जानते हैं कि हाइड्रोजन फ्यूल होता क्या है, बनता कैसे है, और यह कार्बन उत्सर्जन क्यों नहीं करता या कितना करता है? दुनिया में अभी हाइड्रोजन से कहां-कहां ट्रेन चल रही है?

हाइड्रोजन फ्यूल कैसे बनता है?

हाइड्रोजन पृथ्वी पर मुक्त रूप में कम मिलता है. यह अक्सर पानी (H₂O) या हाइड्रोकार्बन जैसे प्राकृतिक गैस में बंधा होता है, इसलिए हाइड्रोजन को बनाना पड़ता है. इसके लिए कई तरीके अपनाए जाते हैं.

  • पानी का इलेक्ट्रोलिसिस (Electrolysis): पानी में बिजली प्रवाहित करके उसे हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में तोड़ा जाता है. यदि बिजली सौर/पवन/जलविद्युत जैसी नवीकरणीय स्रोतों से आए, तो इसे आमतौर पर ग्रीन हाइड्रोजन कहा जाता है यानी उत्पादन चरण में भी कार्बन उत्सर्जन बहुत कम/शून्य हो सकता है.
  • प्राकृतिक गैस से (Steam Methane ReformingSMR): उद्योगों में मीथेन से हाइड्रोजन निकाली जाती है. इसमें CO₂ बनती है. बिना कार्बन कैप्चर के इसे अक्सर ग्रे हाइड्रोजन कहा जाता है. अगर CO₂ को पकड़कर/स्टोर करके उत्सर्जन घटाया जाए (CCS), तो उसे कई जगह ब्लू हाइड्रोजन कहा जाता है.
  • कोयला गैसीफिकेशन: कुछ क्षेत्रों में हाइड्रोजन कोयले से भी बनती है, पर इसका कार्बन फुटप्रिंट सामान्यतः सबसे भारी होता है.

सरल शब्दों में हाइड्रोजन ईंधन होने के साथ-साथ एक एनर्जी कैरियर है. इसे बनाने में भी ऊर्जा लगती है.

Hydrogen Fuel
कई तरीकों से हाइड्रोजन फ्यूल बनाया जाता है.

कहां-कहां होता है हाइड्रोजन का इस्तेमाल?

आज हाइड्रोजन का उपयोग भविष्य नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर वर्तमान है. हालांकि उसका बड़ा हिस्सा अभी परिवहन में नहीं, उद्योग में इस्तेमाल हो रहा है. ईंधन की गुणवत्ता सुधारने और सल्फर घटाने में इसका इस्तेमाल रिफाइनरी एवं पेट्रोलियम उद्योग में हो रहा है. खाद बनाने में हाइड्रोजन एक प्रमुख इनपुट है. मेथनॉल बनाने में भी इसका इस्तेमाल हो रहा है.

स्टील इंडस्ट्री में आयरन से ऑक्सीजन हटाने (रिडक्शन) के लिए कोयले की जगह हाइड्रोजन का विकल्प अपनाया जा रहा है. सार्वजनिक परिवहन में भी इसका इस्तेमाल हो रहा है. बस, ट्रक, रेल संचालन में भी इसका इस्तेमाल खूब हो रहा है. रेल में हाइड्रोजन का आकर्षण यह है कि जहां तार लगाकर पूरी लाइन को इलेक्ट्रिफाई करना चुनौतीपूर्ण हो, वहां ट्रेन अपने साथ ऊर्जा का टैंक लेकर चल सकती है.

Hydrogen Train (1)
जर्मनी और चीन समेत कई देशों में हाइड्रोजन ट्रेन चलाई जा रही है.

क्या इससे कार्बन उत्सर्जन वाकई नहीं होता?

इस सवाल का हां या न में जवाब जानने के लिए कुछ जरूरी चीजें जान लेना उचित होगा. प्रॉसेस समझना होगा. ट्रेन के केस में हाइड्रोजन (H₂) को फ्यूल सेल में हवा की ऑक्सीजन (O₂) के साथ रिएक्ट कराकर बिजली बनती है. इस प्रक्रिया का मुख्य आउटपुट बिजली और पानी होता है. यानी ट्रेन के एग्जॉस्ट पाइप से CO₂ नहीं निकलती. यही कारण है कि इसे ज़ीरो डायरेक्ट CO₂ कहा जाता है. ऑपरेशन में केवल पानी निकलता है.

लेकिन एक जरूरी बात यह है कि टेलपाइप पर शून्य होने का मतलब यह नहीं कि पूरे जीवन चक्र में शून्य हो गया.

अगर हाइड्रोजन ग्रे (फॉसिल आधारित) है, तो उत्सर्जन ट्रेन से नहीं, हाइड्रोजन प्लांट से होगा. इसलिए यह धारणा एकदम से सही नहीं है कि इससे कॉर्बन उत्सर्जन नहीं होता. हाइड्रोजन ट्रेन स्थानीय प्रदूषण और टेलपाइप CO₂ खत्म कर सकती है लेकिन कुल कार्बन लाभ हाइड्रोजन के स्रोत पर निर्भर है.

दुनिया में कहां-कहां हाइड्रोजन ट्रेनें चलती हैं?

जर्मनी में ट्रेन गैर विद्युतीकृत रूट पर नियमित पैसेंजर सेवा के लिए चलती हैं. Alstom के अनुसार यह दुनिया की पहली हाइड्रोजन पावर्ड पैसेंजर ट्रेन है और जर्मनी में कमर्शियल सेवा में रही है. कनाडा में भी हाइड्रोजन ट्रेन का संचालन हो रहा है. अन्य यूरोपीय देशों ऑस्ट्रिया, स्वीडन, पोलैंड, नीदरलैंड्स आदि में ट्रायल का उल्लेख मिलता है. फ्रांस, इटली जैसे देश भी इस दिशा में आगे बढ़ चुके हैं.

China's Hydrogen Train
चीन की हाइड्रोजन ट्रेन. फोटो: Zhang Yao/China News Service/VCG via Getty Images

चीन ने भी इस दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं. इस तरह कहा जा सकता है कि जर्मनी, फ्रांस, स्वीडन और चीन के बाद भारत पांचवां देश होगा, जहां ट्रेन हाइड्रोजन से चलने जा रही है. लेकिन यह भी तय है कि दुनिया परिवहन में अब हाइड्रोजन को बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करने को तैयार है.

भारतीय रेलवे के लिए हाइड्रोजन ट्रेन का मतलब क्या है?

भारतीय रेलवे ने जींदसोनीपत सेक्शन पर हाइड्रोजन ट्रेन ट्रायल की दिशा में कदम बढ़ाए हैं. इस पहल का सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि गैर विद्युतीकृत/कम ट्रैफिक लाइनों पर डीज़ल पर निर्भरता घट सकती है. स्टेशन एवं शहरों में स्थानीय प्रदूषण और शोर कम हो सकता है. अगर हाइड्रोजन ग्रीन स्रोत से आए, तो डी-कार्बनाइज़ेशन का लाभ वास्तविक रूप से बड़ा बन सकता है. लेकिन सफल होने के लिए कुछ व्यावहारिक शर्तें निर्णायक होंगी.

  • हाइड्रोजन उत्पादन + भंडारण + रीफ्यूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर
  • सुरक्षा मानक, ट्रेन डिपो प्रक्रियाएँ, और आपातकालीन प्रतिक्रिया
  • ईंधन की कीमत और उपलब्धता क्योंकि सप्लाई बाधित हो तो ऑपरेशन प्रभावित हो सकता है.

इस तरह हम कह सकते हैं कि हाइड्रोजन फ्यूल जादुई शून्य कार्बन गैस नहीं है. यह एक शक्तिशाली विकल्प है, जिसकी हरितता इस बात से तय होती है कि उसे बनाया कैसे गया. ट्रेन के स्तर पर इसका सबसे बड़ा फायदा है ज़ीरो टेलपाइप CO₂ और डीज़ल धुएं से मुक्ति. जर्मनी जैसे उदाहरण दिखाते हैं कि तकनीक प्रयोगशाला से निकलकर पटरी पर आ चुकी है. कहीं नियमित सेवा में, कहीं डेमो/ट्रायल के रूप में. भारत में पहली हाइड्रोजन ट्रेन की घोषणा इसी वैश्विक ट्रेंड का हिस्सा है. कठिन रूटों पर डीज़ल को हटाने के लिए यह एक नया रास्ता हो सकता है.