कपिल सिब्बल का बड़ा आरोप: ‘सरकार सुप्रीम कोर्ट पर भी कब्जे की कोशिश में’, बोले- लेकिन ऐसा नहीं होने देंगे

कपिल सिब्बल का बड़ा आरोप: ‘सरकार सुप्रीम कोर्ट पर भी कब्जे की कोशिश में’, बोले- लेकिन ऐसा नहीं होने देंगे

वरिष्ठ वकील और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने केंद्र सरकार पर देश की संवैधानिक संस्थाओं को अपने प्रभाव में लेने की कोशिश करने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि 2014 से सरकार की नीति मीडिया और दूसरी संस्थाओं पर नियंत्रण स्थापित करने की रही है। सिब्बल के मुताबिक, कई संस्थानों के बाद अब सुप्रीम कोर्ट को भी प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है। हालांकि, उन्होंने भरोसा जताया कि देश की सर्वोच्च अदालत पर ऐसा नहीं हो पाएगा। उन्होंने चुनाव आयोग, मतदाता सूची और दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों पर लगी पाबंदियों को लेकर भी सवाल उठाए। इन आरोपों के बीच न्यायपालिका की स्वतंत्रता और आम नागरिकों के विरोध करने के अधिकार पर बहस एक बार फिर तेज हो गई है।

2014 से संस्थाओं पर नियंत्रण की कोशिश का आरोप

कपिल सिब्बल ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में केंद्र सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए। यह प्रेस कॉन्फ्रेंस मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के खिलाफ हालिया विरोध-प्रदर्शनों पर सरकार की प्रतिक्रिया के संदर्भ में हुई।

सिब्बल ने आरोप लगाया कि 2014 के बाद से सरकार की रणनीति विभिन्न संस्थाओं पर अपना प्रभाव बढ़ाने की रही है। उनके मुताबिक, इस प्रक्रिया में सबसे पहले मीडिया को निशाना बनाया गया। उन्होंने कहा कि मीडिया पर नियंत्रण का असर यह हुआ कि जमीनी स्तर की खबरें आम लोगों तक पहुंचने में मुश्किलें आने लगीं।

उन्होंने विश्वविद्यालयों, राज्यपालों और अन्य संस्थाओं का भी जिक्र किया। सिब्बल का दावा है कि इन संस्थानों की स्वतंत्रता प्रभावित हुई है। हालांकि, ये उनके राजनीतिक और कानूनी आकलन हैं, जिन्हें सरकार के खिलाफ लगाए गए आरोपों के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।

मीडिया के बाद सुप्रीम कोर्ट पर नजर? सिब्बल ने जताया भरोसा

सिब्बल ने कहा कि मुख्यधारा के मीडिया की भूमिका प्रभावित होने के कारण सोशल मीडिया लोगों के लिए जानकारी का एक वैकल्पिक माध्यम बनकर उभरा है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार संस्थाओं को प्रभावित करने के साथ लोगों के मतदान के अधिकार पर भी असर डालने की कोशिश कर रही है।

उन्होंने अपनी बात रखते हुए कहा, “पहले उन्होंने मीडिया पर नियंत्रण किया। इसके बाद दूसरी संस्थाओं पर नियंत्रण स्थापित किया। एक संस्था अभी भी बची हुई है, वह है भारत का सुप्रीम कोर्ट। वे इसे भी अपने प्रभाव में लेने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन मुझे पूरा भरोसा है कि ऐसा नहीं हो पाएगा।”

सिब्बल ने आगे कहा कि जब दूसरी संस्थाओं पर नियंत्रण की कोशिशों के बीच मतदाता सूची का सवाल सामने आया, तो यह चिंता और बढ़ गई कि कहीं लोगों के लोकतांत्रिक अधिकार प्रभावित न हों।

यह मुद्दा आम मतदाता के लिए भी अहम है। मतदाता सूची में नाम होना और चुनाव में अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर पाना लोकतांत्रिक व्यवस्था के बुनियादी हिस्से हैं। इसलिए चुनावी प्रक्रिया और उससे जुड़ी संस्थाओं की निष्पक्षता पर उठने वाले सवाल सीधे जनता के भरोसे से जुड़े होते हैं।

दिल्ली में प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी और धारा 163 पर सवाल

कपिल सिब्बल ने दिल्ली में प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी और विरोध-प्रदर्शनों पर लगाई गई पाबंदियों को लेकर भी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करना संविधान के तहत एक मौलिक अधिकार है। इस अधिकार को केवल उन्हीं परिस्थितियों में सीमित किया जा सकता है, जहां संविधान और कानून इसकी अनुमति देते हैं। सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना ऐसी परिस्थितियों में शामिल हो सकता है।

उन्होंने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत जारी निषेधाज्ञाओं पर भी सवाल उठाए। सिब्बल के मुताबिक, प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि किसी इलाके में ऐसी पाबंदियां लगाने की जरूरत क्यों पड़ी और उनके पीछे क्या आधार था।

धारा 163 के तहत सक्षम प्रशासनिक अधिकारी कुछ परिस्थितियों में तत्काल रोकथाम के आदेश जारी कर सकते हैं। हालांकि, ऐसे आदेशों की वैधता और जरूरत परिस्थितियों तथा उनके कानूनी आधार पर निर्भर करती है।

सिब्बल ने कहा कि इन आदेशों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चर्चा की जाएगी। इस मामले में प्रदर्शन पर लगी पाबंदियों की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाएं भी अहम हैं। इससे यह सवाल सामने आता है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने और नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार के बीच संतुलन कैसे कायम किया जाए।

आम नागरिकों के लिए क्यों अहम है यह मामला?

इस पूरे विवाद का महत्व केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं है। मीडिया की स्वतंत्रता, न्यायपालिका की निष्पक्षता, चुनावी प्रक्रिया और शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार ऐसे मुद्दे हैं, जिनका असर आम नागरिकों की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ सकता है।

यदि किसी नागरिक को सरकारी नीतियों पर सवाल उठाना हो, किसी फैसले के खिलाफ आवाज उठानी हो या अपने मताधिकार से जुड़े मुद्दे पर न्याय मांगना हो, तो स्वतंत्र संस्थाओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। यही वजह है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर होने वाली बहस लोकतंत्र में विशेष महत्व रखती है।

सिब्बल ने विश्वास जताया कि सुप्रीम कोर्ट इन मामलों पर विचार करेगा और नागरिकों के विरोध करने के अधिकार की रक्षा सुनिश्चित करेगा। उन्होंने साफ कहा कि उन्हें भरोसा है कि सरकार सर्वोच्च अदालत को अपने नियंत्रण में लेने में सफल नहीं होगी।

फिलहाल, सिब्बल के बयान ने संस्थाओं की स्वतंत्रता, मतदाता सूची और प्रदर्शनकारियों के अधिकारों को लेकर चल रही बहस को फिर सामने ला दिया है। इन आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष निकालने के बजाय संबंधित कानूनी मामलों और अदालत के फैसलों पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा।