मुंबई के कुर्ला में हुए दर्दनाक लैंडस्लाइड हादसे के बाद एक ऐसा खुलासा सामने आया है, जिसने प्रशासनिक लापरवाही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस हादसे में अब तक 8 लोगों की मौत हो चुकी है, लेकिन सरकारी दस्तावेज बताते हैं कि जिस पहाड़ी का हिस्सा बुधवार को ढहा, उसके खतरे की चेतावनी जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (GSI) ने करीब आठ साल पहले ही दे दी थी। इतना ही नहीं, एजेंसी ने दुर्घटना रोकने के लिए कई ठोस सुझाव भी दिए थे, लेकिन उन पर समय रहते अमल नहीं हुआ।
दस्तावेजों के मुताबिक, कुर्ला के साकीनाका इलाके की हिल नंबर-3 को पहले ही अत्यधिक जोखिम वाला क्षेत्र बताया गया था। रिपोर्ट में कहा गया था कि भारी बारिश के दौरान यहां चट्टानें गिर सकती हैं और ढलान के नीचे बसी बस्तियों की जान-माल को बड़ा खतरा हो सकता है।
दो साल तक सर्वे के बाद तैयार हुई थी चेतावनी वाली रिपोर्ट
GSI ने मुंबई के 74 संभावित लैंडस्लाइड क्षेत्रों का लगभग दो साल तक फील्ड सर्वे और तकनीकी अध्ययन किया था। इसके बाद वर्ष 2018 में 435 पन्नों की विस्तृत जोखिम आकलन रिपोर्ट तैयार कर बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) को सौंपी गई थी।
इस रिपोर्ट में केवल खतरे की पहचान ही नहीं की गई थी, बल्कि शहर के संवेदनशील इलाकों के लिए अलग भूमि उपयोग नीति (Land Use Policy) बनाने की भी सलाह दी गई थी।
रिपोर्ट में कुर्ला को मुंबई के पांच प्रमुख लैंडस्लाइड जोखिम वाले क्षेत्रों में रखा गया था। इसके साथ भांडुप, घाटकोपर, विक्रोली और चेंबूर जैसे इलाकों का भी उल्लेख किया गया था।
विशेष रूप से हिल नंबर-3 को लेकर कहा गया था कि यहां की खड़ी ढलान, कमजोर मिट्टी और जुड़ी हुई चट्टानें भारी बारिश के दौरान गंभीर खतरा पैदा कर सकती हैं।
पहले भी हो चुके थे हादसे, फिर भी नहीं बदली तस्वीर
यह इलाका पहले भी लैंडस्लाइड की घटनाएं देख चुका है। वर्ष 2005 से 2008 के बीच यहां तीन बार भूस्खलन हुआ था। उन हादसों में 16 लोगों की जान गई थी और कम से कम 26 घर तबाह हो गए थे।
GSI ने नेताजी नगर और मिलिंद नगर जैसी ढलान पर बसी बस्तियों का आकलन करने के बाद पाया था कि यहां का जोखिम महाराष्ट्र के कई अन्य इलाकों की तुलना में कहीं ज्यादा है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया था कि चट्टानों की प्राकृतिक दरारों में बारिश का पानी भरने और पेड़ों की जड़ों के फैलने से ढलान कमजोर होती जाती है। यही स्थिति बाद में बड़े भूस्खलन की वजह बन सकती है।
बुधवार को भी भारी बारिश के दौरान ढलान पर लगा एक पीपल का पेड़ उखड़ गया। इसके बाद बड़ी-बड़ी चट्टानें नीचे बनी झुग्गियों पर आ गिरीं और कई परिवार इसकी चपेट में आ गए।
बचाव के लिए दिए गए थे कई सुझाव, लेकिन अमल नहीं हुआ
GSI ने अपनी रिपोर्ट में कई व्यावहारिक उपाय सुझाए थे। इनमें ढलान की आगे कटाई रोकना, नए निर्माण पर रोक लगाना, पेड़ों की जड़ों की नियमित छंटाई, छोटे पेड़ों को हटाना और ढलान पर वीप होल्स, टो ड्रेन तथा मजबूत रिटेनिंग वॉल बनाने की सलाह शामिल थी।
इसके अलावा इलाके में बेहतर ड्रेनेज सिस्टम विकसित करने की भी सिफारिश की गई थी, ताकि बारिश का पानी सुरक्षित तरीके से निकल सके।
GSI के एक अधिकारी ने हादसे के बाद कहा कि लैंडस्लाइड अचानक नहीं होता। जब पहाड़ी की संरचना बदली जाती है, ढलानों को काटा जाता है और प्राकृतिक जल निकासी प्रभावित होती है, तब जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।
2023 में भी सूची में आया था इलाका, फिर भी सवाल बरकरार
BMC के रिकॉर्ड बताते हैं कि 2023 में हिल नंबर-3 को आधिकारिक तौर पर भूस्खलन संभावित क्षेत्रों की सूची में शामिल किया गया था। उस समय यहां रिटेनिंग वॉल बनाना प्राथमिकता वाले कार्यों में रखा गया था।
वहीं कुर्ला से शिवसेना पार्षद विजेंद्र शिंदे ने दावा किया कि उन्होंने करीब तीन महीने पहले BMC सदन में इस खतरे को उठाया था। उनका कहना है कि उन्होंने पहाड़ियों पर धातु की सुरक्षा जाली लगाने का सुझाव दिया था, ताकि चट्टानों को नीचे गिरने से रोका जा सके। हालांकि उनके अनुसार उस समय इस प्रस्ताव पर ध्यान नहीं दिया गया।
अब हादसे के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब खतरे की चेतावनी पहले से मौजूद थी और बचाव के उपाय भी स्पष्ट रूप से सुझाए गए थे, तो उन्हें समय रहते लागू क्यों नहीं किया गया।



