लखनऊ हाईकोर्ट का बड़ा आदेश: तेलीबाग के इंटर कॉलेज से 3 महीने में हटेगा अवैध कब्जा, पूर्व प्रिंसिपल पर भी सख्ती

लखनऊ हाईकोर्ट का बड़ा आदेश: तेलीबाग के इंटर कॉलेज से 3 महीने में हटेगा अवैध कब्जा, पूर्व प्रिंसिपल पर भी सख्ती

लखनऊ में एक इंटर कॉलेज की जमीन पर कथित अवैध कब्जे के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने जिला प्रशासन को तेलीबाग स्थित राम भरोसे माईकू लाल इंटर कॉलेज के परिसर से सभी अनधिकृत कब्जे तीन महीने के भीतर हटाने का आदेश दिया है। अदालत ने जिलाधिकारी को तय समयसीमा में कार्रवाई पूरी कर रिपोर्ट पेश करने को कहा है। खास बात यह है कि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कब्जे के आरोपों का सामना कर रहे व्यक्ति का राज्य के वित्त मंत्री के जनसंपर्क अधिकारी के पद पर होना प्रशासनिक कार्रवाई में बाधा नहीं बनना चाहिए। अदालत ने पूर्व प्रधानाचार्य सुखपाल सिंह को भी चेतावनी दी है कि बेदखली की प्रक्रिया में किसी तरह की रुकावट डालने को गंभीरता से लिया जाएगा।

तीन महीने में कब्जा हटाने का आदेश, जिलाधिकारी को देनी होगी रिपोर्ट

राम भरोसे माईकू लाल इंटर कॉलेज की प्रबंधन समिति ने परिसर की जमीन पर कथित अवैध कब्जे को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। बुधवार को मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस पंकज भाटिया ने लखनऊ के जिलाधिकारी को निर्देश दिया कि कॉलेज परिसर से सभी अनधिकृत कब्जे तीन महीने के भीतर हटाए जाएं।

अदालत ने केवल कब्जा हटाने का आदेश ही नहीं दिया, बल्कि प्रशासन को तय समयसीमा के भीतर की गई कार्रवाई की रिपोर्ट भी पेश करने को कहा है। इससे साफ है कि कोर्ट इस मामले में आदेश के वास्तविक पालन पर भी नजर रखना चाहता है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रशासन किसी व्यक्ति के राजनीतिक या सरकारी पद से प्रभावित हुए बिना कानून के अनुसार कार्रवाई करे। आदेश में खास तौर पर कहा गया कि कथित कब्जाधारियों में से एक के राज्य के वित्त मंत्री के जनसंपर्क अधिकारी होने से कार्रवाई पर कोई असर नहीं पड़ना चाहिए।

कोर्ट ने पूर्व प्रधानाचार्य सुखपाल सिंह को चेतावनी दी कि यदि उन्होंने कब्जा हटाने की प्रक्रिया में बाधा डालने की कोशिश की, तो इसे गंभीरता से लिया जाएगा। साथ ही, न्यायिक आदेश की एक प्रति राज्य के वित्त मंत्री को भी भेजने का निर्देश दिया गया।

पूर्व प्रिंसिपल पर सरकारी आवास खाली नहीं करने का आरोप

प्रबंधन समिति की याचिका के मुताबिक, सुखपाल सिंह ने वर्ष 1988 से 31 जनवरी 2017 तक कॉलेज के प्रधानाचार्य के रूप में काम किया। सेवानिवृत्ति के बाद भी उन्होंने कथित तौर पर कॉलेज परिसर में स्थित आधिकारिक आवास खाली नहीं किया।

समिति का कहना है कि प्रधानाचार्य के कार्यकाल के दौरान सिंह को नियमित रूप से मकान किराया भत्ता मिलता रहा। इसके बावजूद पद से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने संस्थान का आवास प्रबंधन को वापस नहीं सौंपा।

कॉलेज प्रबंधन ने अदालत से मांग की है कि संबंधित संपत्ति को खाली कराया जाए। इसके साथ ही, जिस अवधि में आवास पर कथित तौर पर अनधिकृत कब्जा बना रहा, उस पूरे समय के लिए मौजूदा बाजार दर के हिसाब से किराये की वसूली भी की जाए।

हालांकि, किराये की वसूली को लेकर प्रबंधन की मांग पर अंतिम निर्णय की जानकारी उपलब्ध खबर में नहीं दी गई है। फिलहाल हाईकोर्ट का प्रमुख निर्देश परिसर से अनधिकृत कब्जे हटाने और प्रशासन से समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित कराने से संबंधित है।

जमीन के रिकॉर्ड में क्या मिला? विरासत के दावे पर भी सवाल

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पेश सत्यापन रिपोर्ट में कॉलेज की मान्यता प्राप्त जमीन का विवरण रखा गया। रिपोर्ट के मुताबिक, संस्थान का परिसर गाटा संख्या 41 और 44 में दर्ज भूखंडों में फैला है।

इस निर्धारित परिसर में कॉलेज की इमारत, प्रधानाचार्य का कक्ष, प्रशासनिक कार्यालय, अन्य सहायक निर्माण और खुले मैदान शामिल हैं। राज्य की रिपोर्ट में बताया गया कि इस जमीन के अलग-अलग हिस्सों पर कई लोगों का अनधिकृत कब्जा है। इनमें पूर्व प्रधानाचार्य का नाम भी शामिल बताया गया।

दूसरी ओर, सुखपाल सिंह की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि संबंधित परिसर पर उनके दादा का कब्जा था और उन्हें यह संपत्ति विरासत में मिली है। इस आधार पर उन्होंने अपने पक्ष को सही ठहराने की कोशिश की।

लेकिन सुनवाई के दौरान अदालत के सामने इस विरासत संबंधी दावे को साबित करने के लिए कोई दस्तावेज पेश नहीं किया जा सका। ऐसे में जमीन पर अधिकार को लेकर दोनों पक्षों के दावों के बीच विवाद बना हुआ है।

राजस्व रिकॉर्ड में जमीन की पहचान और उस पर वास्तविक कब्जे की स्थिति इस मामले के अहम पहलू हैं। अदालत के सामने रखी गई सरकारी रिपोर्ट के आधार पर प्रशासन को अब निर्धारित परिसर से अनधिकृत कब्जे हटाने की दिशा में कार्रवाई करनी होगी।

सरकारी पद से नहीं मिलेगी राहत, अब प्रशासन की कार्रवाई पर नजर

इस मामले में हाईकोर्ट का आदेश इसलिए अहम है क्योंकि अदालत ने सरकारी पद या प्रभाव को प्रशासनिक कार्रवाई के रास्ते में आने से रोकने का स्पष्ट संदेश दिया है। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि कब्जा हटाने की प्रक्रिया में किसी तरह का बाहरी प्रभाव नहीं होना चाहिए।

हालांकि, अदालत ने सभी आरोपों पर अंतिम फैसला सुनाए जाने की बात नहीं कही है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, मुख्य निर्देश कॉलेज परिसर से अनधिकृत कब्जे हटाने और तीन महीने के भीतर कार्रवाई की रिपोर्ट पेश करने का है।

अब लखनऊ जिला प्रशासन के सामने तय समयसीमा में आदेश का पालन कराने की जिम्मेदारी है। दूसरी ओर, कॉलेज प्रबंधन की मांग है कि परिसर खाली कराने के साथ-साथ कथित अनधिकृत कब्जे की अवधि का किराया भी वसूल किया जाए।

इस विवाद का असर संस्थान की जमीन और परिसर के इस्तेमाल पर पड़ सकता है। कॉलेज की इमारतों और खुले मैदान पर प्रबंधन का नियंत्रण बहाल होने से संबंधित संपत्ति के उपयोग को लेकर स्थिति स्पष्ट हो सकती है। हालांकि, आगे की स्थिति प्रशासन की कार्रवाई और मामले में होने वाली कानूनी प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।

फिलहाल हाईकोर्ट का स्पष्ट निर्देश है कि तेलीबाग स्थित राम भरोसे माईकू लाल इंटर कॉलेज से सभी अनधिकृत कब्जे तीन महीने में हटाए जाएं और जिलाधिकारी तय समयसीमा में कार्रवाई की रिपोर्ट अदालत को दें।