नाम आया, ज़िंदगी चली गई: वोटर बनने से पहले ही दुनिया छोड़ गईं मीना जलाल, परिवार अभी भी सूची से बाहर

नाम आया, ज़िंदगी चली गई: वोटर बनने से पहले ही दुनिया छोड़ गईं मीना जलाल, परिवार अभी भी सूची से बाहर

Kolkata के चौऱंगी विधानसभा क्षेत्र की 77 वर्षीय मीना जलाल की कहानी लोकतंत्र की जटिलता और मानवीय पीड़ा दोनों को सामने लाती है। मीना जलाल का नाम चुनाव आयोग की अंतिम सूची में 9 अप्रैल को शामिल हुआ, लेकिन उससे पहले ही 27 मार्च को उनका निधन हो गया। विडंबना यह रही कि जीवनभर मतदान करने वाली यह महिला अपने आखिरी चुनाव में वोट देने का अधिकार मिलने से पहले ही दुनिया छोड़ गईं।

परिवार में असमान स्थिति, कुछ नाम शामिल तो कुछ बाहर

जहां मीना जलाल का नाम सूची में शामिल हुआ, वहीं उनके पति और बेटे को “अधिकार” नहीं मिला। उनके पति जलालुद्दीन अहमद सिद्दीकी और बेटे इमरान जाकी का नाम अभी भी सूची में नहीं है, जिसके खिलाफ उन्होंने ट्रिब्यूनल का रुख किया है। हालांकि परिवार के अन्य सदस्यों—तीन बेटे और एक बेटी—को वोटर के रूप में मान्यता मिल चुकी है।

SIR प्रक्रिया पर सवाल, पारदर्शिता की मांग

इस पूरे मामले ने Election Commission of India की SIR (Special Intensive Revision) प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं। परिवार का आरोप है कि सभी जरूरी दस्तावेज देने के बावजूद उन्हें स्पष्ट कारण नहीं बताया गया कि उनके नाम क्यों हटाए गए।इमरान जाकी ने कहा कि यह प्रक्रिया “छुपाने और टालने” जैसी लगती है और इसमें पारदर्शिता की कमी है।

सात दशकों से एक ही जगह रह रहा परिवार

परिवार का कहना है कि वे पिछले 70 सालों से बोबाजार इलाके में रह रहे हैं और उनका संबंध शहर से ब्रिटिश काल से है। इसके बावजूद वोटर सूची से नाम हटना उनके लिए चिंता और असमंजस का कारण बना हुआ है।

मानसिक तनाव और लोकतंत्र पर सवाल

मीना जलाल के बेटे के मुताबिक, उनकी मां इस बात से परेशान थीं कि इस बार वे वोट नहीं दे पाएंगी। यह मानसिक तनाव उनके लिए भारी पड़ा और अंततः वे अपने अधिकार का इस्तेमाल किए बिना ही चल बसीं।

सिस्टम की देरी, नागरिक की हार

यह मामला केवल एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि उस चुनौती को दिखाता है जहां प्रक्रियात्मक देरी और अस्पष्टता आम नागरिक के अधिकारों को प्रभावित करती है। लोकतंत्र की मजबूती सिर्फ चुनाव कराने में नहीं, बल्कि हर योग्य नागरिक को समय पर उसका अधिकार देने में है।