बिजली की ट्रांसमिशन लाइन के लिए जमीन मालिक की मंजूरी जरूरी नहीं! MP हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, मुआवजे का रास्ता खुला

बिजली की ट्रांसमिशन लाइन के लिए जमीन मालिक की मंजूरी जरूरी नहीं! MP हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, मुआवजे का रास्ता खुला

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बिजली ट्रांसमिशन लाइन से जुड़े एक अहम मामले में साफ कर दिया है कि अगर किसी बिजली कंपनी को इलेक्ट्रिसिटी एक्ट, 2003 की धारा 164 के तहत टेलीग्राफ अथॉरिटी की शक्तियां दी गई हैं, तो ट्रांसमिशन लाइन बिछाने के लिए हर जमीन मालिक से पहले से मंजूरी लेना जरूरी नहीं है। कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में कंपनी को इंडियन टेलीग्राफ एक्ट, 1885 के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करने का अधिकार है। हालांकि, प्रभावित जमीन मालिक के लिए मुआवजे का कानूनी रास्ता खुला रहेगा।

यह फैसला उन लोगों के लिए खासा अहम है जिनकी जमीन से हाई-वोल्टेज बिजली लाइन या उसके टावर गुजरते हैं। यानी केवल जमीन मालिक की असहमति के आधार पर ट्रांसमिशन प्रोजेक्ट को रोकना संभव नहीं होगा, बशर्ते बिजली कंपनी को धारा 164 के तहत अधिकार विधिवत दिए गए हों।

धारा 164 के बाद बदल जाता है नियमों का खेल

एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच ने यह फैसला Daulat Ram Engineering Services Ltd v State of Madhya Pradesh मामले में सुनाया। मामला मंडीदीप क्षेत्र में 132 kV ट्रांसमिशन लाइन की दूसरी सर्किट स्ट्रिंगिंग से जुड़ा था।

कोर्ट ने ‘Works of Licensees Rules, 2006’ के नियम 3(a) की भी जांच की। सामान्य तौर पर इस नियम के तहत किसी निजी संपत्ति पर बिजली से जुड़ा काम करने से पहले मालिक या कब्जाधारी की मंजूरी लेने की बात कही गई है। लेकिन नियम 3(4) में साफ अपवाद मौजूद है। यह प्रावधान धारा 164 के तहत लाइसेंसधारी को दिए गए अधिकारों को प्रभावित नहीं करता।

कोर्ट ने इसी अंतर को महत्वपूर्ण माना। उसके मुताबिक, जब धारा 164 के तहत टेलीग्राफ अथॉरिटी की शक्तियां विधिवत प्रदान हो जाती हैं, तब निजी जमीन पर ट्रांसमिशन लाइन का सर्वे करने या उसका अलाइनमेंट तय करने के लिए पहले से जमीन मालिक की सहमति लेना अनिवार्य नहीं रहता। इसके लिए पहले से सुनवाई का अधिकार भी नहीं बनता।

जमीन मालिक ने सुझाया दूसरा रास्ता, लेकिन सुरक्षा नियम आड़े आए

मामला 132kV DCSS मंडीदीप नहर ट्रांसमिशन लाइन की दूसरी सर्किट स्ट्रिंगिंग का था। MP Power Transmission Company Limited ने 10 जून 2024 को परियोजना को मंजूरी दी थी। इसके बाद रायसेन कलेक्टर ने 30 जुलाई 2025 को नाहर पॉली फिल्म्स लिमिटेड की नई यूनिट को बिजली आपूर्ति के लिए ट्रांसमिशन लाइन बिछाने की अनुमति दी।

दौलत राम इंजीनियरिंग सर्विसेज लिमिटेड और नासा कॉर्पोरेशन ने प्रस्तावित रूट को चुनौती दी। कुल 13 टावरों में खास आपत्ति टावर नंबर 7 और 8 को लेकर थी। टावर 8 नासा कॉर्पोरेशन की जमीन पर प्रस्तावित था। वहीं, दौलत राम की संपत्ति के सामने वाले हिस्से में टावर लगाने का प्रस्ताव नहीं था।

याचिकाकर्ताओं ने एक वैकल्पिक रूट भी सुझाया। लेकिन तकनीकी विशेषज्ञों की टीम ने इसे स्वीकार नहीं किया। स्पॉट इंस्पेक्शन के दौरान पाया गया कि उस रास्ते पर टावर 8 मौजूदा गैस पाइपलाइन से महज 3.5 मीटर की दूरी पर आ जाता। यह दूरी Central Electricity Authority के 2023 के सुरक्षा नियमों के अनुरूप नहीं थी।

कोर्ट ने इस तथ्य को महत्वपूर्ण माना। हाई-वोल्टेज ट्रांसमिशन लाइन और गैस पाइपलाइन के बीच सुरक्षा दूरी से जुड़े नियमों को महज तकनीकी औपचारिकता नहीं माना जा सकता। इसलिए केवल इस आधार पर वैकल्पिक रूट को मंजूर करने का निर्देश नहीं दिया जा सकता कि मौजूदा रूट से कुछ जमीन मालिकों को परेशानी हो रही है।

‘प्राइवेट कंपनी को बिजली देने के लिए लाइन नहीं बिछ सकती’ वाली दलील भी खारिज

याचिकाकर्ताओं की एक प्रमुख दलील थी कि धारा 164 का इस्तेमाल ऐसी ट्रांसमिशन लाइन के लिए नहीं किया जा सकता जिसका उद्देश्य किसी एक निजी उपभोक्ता को बिजली उपलब्ध कराना हो। कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।

बेंच ने स्पष्ट किया कि किसी इंडस्ट्रियल कंज्यूमर को बिजली देने वाली ट्रांसमिशन लाइन केवल इस वजह से अपनी कानूनी प्रकृति नहीं खो देती कि उसका शुरुआती लाभार्थी कोई निजी उपभोक्ता है। इसलिए प्रोजेक्ट को केवल इस आधार पर धारा 164 के दायरे से बाहर नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने यह भी पाया कि वैकल्पिक रूट को याचिकाकर्ताओं द्वारा बाद में सुझाए जाने के कारण खारिज नहीं किया गया था। तकनीकी टीम इसे 22 नवंबर 2024 को ही खारिज कर चुकी थी। यानी याचिकाकर्ताओं के प्रस्ताव से करीब एक साल पहले ही उस विकल्प की तकनीकी जांच हो चुकी थी।

मुआवजे का अधिकार रहेगा, लेकिन प्रोजेक्ट रोकने का नहीं

कोर्ट ने यह भी साफ किया कि जमीन मालिक की सहमति न होने का मतलब यह नहीं है कि उसके सभी अधिकार खत्म हो जाते हैं। प्रभावित जमीन मालिक के पास इंडियन टेलीग्राफ एक्ट की धारा 10(d) और 16(3) के तहत मुआवजे का कानूनी उपाय मौजूद है।

यानी ट्रांसमिशन लाइन के लिए जमीन का इस्तेमाल होने पर कानून के मुताबिक मुआवजे का दावा किया जा सकता है। लेकिन केवल असहमति के आधार पर लाइन का रास्ता बदलवाने या प्रोजेक्ट रोकने का अधिकार जमीन मालिक को नहीं मिल जाता।

मामले में कुछ अन्य विवादित मुद्दे भी उठाए गए थे। इनमें स्टाफ बिल्डिंग, मेस, राष्ट्रीय ध्वज के खंभे, फ्लडलाइट्स और कार्गो डिस्पैच एरिया से जुड़े तथ्य शामिल थे। हाईकोर्ट ने इन विवादित तथ्यों पर फैसला देने से इनकार कर दिया।

कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की देरी पर भी सवाल उठाया। याचिकाएं शुरुआती नोटिफिकेशन के 17 महीने से ज्यादा समय बाद दाखिल की गईं। इसके अलावा 13 टावर खड़े होने के करीब 9 महीने बाद हाईकोर्ट का रुख किया गया।

अंततः हाईकोर्ट ने दोनों याचिकाएं खारिज कर दीं। साथ ही प्रत्येक याचिकाकर्ता पर ₹1 लाख का जुर्माना लगाया गया। यह रकम नाहर पॉली फिल्म्स लिमिटेड को दी जानी है।

फैसले का सीधा संदेश यह है कि धारा 164 के तहत वैध अधिकार मिलने के बाद ट्रांसमिशन लाइन का काम केवल जमीन मालिक की सहमति न मिलने के कारण नहीं रोका जा सकता। हालांकि, प्रभावित संपत्ति मालिक के लिए कानून के तहत मुआवजे का अधिकार बना रहेगा।