20 साल बाद कान्स में धूम: ‘पैंस लैबिरिंथ’ ने 22 मिनट का स्टैंडिंग ओवेशन दोहराया, गुइलेर्मो डेल टोरो की मास्टरपीस आज भी अनोखी

20 साल बाद कान्स में धूम: ‘पैंस लैबिरिंथ’ ने 22 मिनट का स्टैंडिंग ओवेशन दोहराया, गुइलेर्मो डेल टोरो की मास्टरपीस आज भी अनोखी

79वें कान्स फिल्म फेस्टिवल की शुरुआत एक यादगार फिल्म के साथ हुई है। 20 साल पहले जिस फिल्म ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया था, उसे अब स्पेशल क्लासिक स्क्रीनिंग में दोबारा दिखाया गया। फिल्म का नाम है ‘पैंस लैबिरिंथ’। गुइलेर्मो डेल टोरो द्वारा निर्देशित यह फिल्म आज भी सिनेमा प्रेमियों के लिए एक बेंचमार्क बनी हुई है।

27 मई 2006 को अपने वर्ल्ड प्रीमियर पर इस फिल्म को कान्स में लगभग 22 मिनट तक स्टैंडिंग ओवेशन मिला था। यह उपलब्धि आज तक कोई फिल्म दोहरा नहीं पाई है। 3 ऑस्कर और 3 बाफ्टा अवॉर्ड जीतने वाली इस फिल्म ने फैंटसी, डार्क हॉरर और लोककथाओं को मिलाकर एक अनोखी दुनिया रची थी। कान्स के 78 साल के इतिहास में ऐसी कम फिल्में हैं जो इतनी गहराई और कलात्मकता के साथ याद की जाती हैं।

फिल्म की कहानी और जादुई दुनिया

फिल्म की मुख्य किरदार है छोटी सी लड़की ओफिलिया। अपनी गर्भवती मां के साथ वह अपने सौतेले पिता से मिलने जंगल में बनी एक मिल पर जाती है। रास्ते में मां की तबीयत बिगड़ जाती है। जंगल के बीच ओफिलिया को एक पुरानी मूर्ति दिखती है। मूर्ति का एक टुकड़ा जोड़ते ही एक अजीब सा जीव बाहर निकलता है।

रात में उसी जीव के पीछे जाते हुए वह एक भूलभुलैया (लैबिरिंथ) के पास पहुंचती है। वहां उसे एक सैटर मिलता है। सैटर उसे बताता है कि वह असल में अंधेरी दुनिया की राजकुमारी प्रिंसेस मोआना है। उसके पिता ने उसे वापस ले जाने के लिए सैटर को भेजा है। वापस जाने के लिए ओफिलिया को तीन कठिन काम पूरे करने होंगे।

कहानी भले ही सरल लगे, लेकिन फिल्म की विजुअल्स, माहौल और कहानी कहने का तरीका इसे कालजयी बनाता है। आज के दौर में भी यह फिल्म फिल्म स्कूलों में उदाहरण के तौर पर पढ़ाई जाती है।

गुइलेर्मो डेल टोरो की अनोखी शैली

निर्देशक गुइलेर्मो डेल टोरो फैंटसी और डार्क हॉरर को मिलाकर जादुई दुनिया बनाने में माहिर हैं। फिल्म बनाने से पहले उन्होंने करीब 10 साल तक स्पेशल इफेक्ट्स और मेकअप सुपरवाइजर के रूप में काम किया था। यही वजह है कि ‘पैंस लैबिरिंथ’ में सैटर और पेल मैन जैसे किरदार बिना भारी CGI के भी बेहद जीवंत और डरावने लगते हैं।

डेल टोरो की फिल्में हमेशा दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती हैं। उन्होंने ‘द शेप ऑफ वॉटर’, ‘पिनोचियो’, ‘हैल्बॉय’ सीरीज और 2025 में नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई ‘फ्रैंकस्टीन’ का निर्देशन किया। ‘फ्रैंकस्टीन’ इस साल ऑस्कर बेस्ट फिल्म के लिए नामांकित भी हुई थी। उनकी हॉरर सीरीज ‘कैबिनेट ऑफ क्यूरियोसिटीज’ भी नेटफ्लिक्स पर काफी लोकप्रिय रही। सिनेमा में उनके योगदान के लिए उन्हें हॉलीवुड वॉक ऑफ फेम पर स्टार से नवाजा जा चुका है।

क्यों आज भी प्रासंगिक है ‘पैंस लैबिरिंथ’

20 साल बाद भी यह फिल्म अपनी जगह बनाए हुए है क्योंकि यह सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि युद्ध, बचपन, कल्पना और हकीकत के टकराव की गहरी कहानी है। कान्स में इसकी स्पेशल स्क्रीनिंग नए दर्शकों को इस क्लासिक से रू-ब-रू करा रही है।

जो लोग सिनेमा को गंभीरता से लेते हैं, उनके लिए ‘पैंस लैबिरिंथ’ एक जरूरी फिल्म है। यह दिखाती है कि अच्छी कहानी, मजबूत विजन और कलात्मक साहस के साथ बनी फिल्में समय की दीवारें पार कर जाती हैं। कान्स जैसे मंच पर इसकी वापसी साबित करती है कि असली क्लासिक कभी पुरानी नहीं होतीं।