केंद्र सरकार ने परीक्षा व्यवस्था को साफ-सुथरा बनाने के लिए बड़ा कदम उठाया है। सार्वजनिक परीक्षाओं में पेपर लीक और नकल जैसी गड़बड़ियों पर लगाम कसने के लिए नया संशोधन विधेयक तैयार किया गया है। इसे 27 जुलाई को लोकसभा में पेश किया जाएगा। लाखों छात्रों और उनके परिवारों के लिए यह खबर राहत भरी है, क्योंकि हाल के वर्षों में NEET-UG और UGC-NET जैसी परीक्षाओं में हुई धांधली ने युवाओं का भविष्य प्रभावित किया था। अब सरकार दोषियों को जल्द और सख्त सजा दिलाने का रास्ता साफ कर रही है।
जांच में देरी अब नहीं चलेगी, 2 महीने का सख्त टाइमलाइन
नए विधेयक में सबसे अहम बदलाव जांच प्रक्रिया को लेकर है। पुलिस, केंद्रीय जांच एजेंसी या स्पेशल टास्क फोर्स (STF) को ऐसे मामलों की जांच दो महीने के अंदर पूरी करनी होगी। जरूरत पड़ने पर केंद्र सरकार खुद STF बना सकेगी। इससे पहले कई मामलों में जांच लंबी खिंच जाती थी और दोषी निकल भागते थे। अब समयबद्ध जांच का प्रावधान छात्रों को भरोसा दिलाएगा कि उनकी शिकायत पर जल्दी कार्रवाई होगी।
हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने का भी प्रावधान रखा गया है। इन अदालतों में रोजाना सुनवाई होगी। चार्जशीट दाखिल होने के बाद तीन महीने के अंदर फैसला देने की कोशिश की जाएगी। पुराने लंबित मामले भी इन कोर्ट में भेजे जा सकेंगे। इससे न्याय में देरी की शिकायत काफी हद तक कम होने की उम्मीद है।
सजा और जुर्माना बढ़ा, दोषियों की नींद उड़ेगी
अनुचित साधनों का इस्तेमाल करने वालों के लिए सजा बढ़ा दी गई है। अब कम से कम पांच साल और अधिकतम दस साल तक की जेल हो सकती है। जुर्माने की सीमा भी पहले के दस लाख से बढ़ाकर पचास लाख रुपये कर दी गई है। संगठित गिरोहों पर और ज्यादा सख्ती बरती जाएगी। उनके लिए न्यूनतम सजा सात साल और न्यूनतम जुर्माना दस करोड़ रुपये रखा गया है। पहले यह सीमा एक करोड़ थी।
परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसियों और सर्विस प्रोवाइडर्स पर भी नकेल कसी गई है। अगर कोई सर्विस प्रोवाइडर पेपर लीक या गड़बड़ी में शामिल पाया जाता है, तो उस पर पांच करोड़ रुपये तक का जुर्माना लग सकता है। पहले यह सीमा एक करोड़ थी। ऐसी एजेंसियों को परीक्षा आयोजित करने से आठ साल तक रोका जा सकेगा। पहले यह अवधि चार साल थी।
कंपनियों के निदेशक और सीनियर अधिकारियों की जिम्मेदारी भी तय की गई है। अगर कोई अधिकारी घोटाले में दोषी पाया जाता है, तो उसे कम से कम पांच साल की जेल और पांच करोड़ रुपये तक के जुर्माने का सामना करना पड़ सकता है। राज्य और केंद्र शासित प्रदेश स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर नियुक्त कर सकेंगे, जिससे मुकदमों की सुनवाई और तेज होगी।
हाईकोर्ट से भी राहत आसान नहीं, तीन महीने का बंधन
फास्ट ट्रैक कोर्ट के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट की दो जजों वाली बेंच में अपील की जा सकेगी। लेकिन वहां भी तीन महीने के अंदर फैसला देने का प्रयास किया जाएगा। इससे दोषी लोग लंबे समय तक कानूनी उलझनों में फंसकर बच नहीं पाएंगे। सरकार का स्पष्ट लक्ष्य है कि परीक्षा व्यवस्था सुरक्षित बने, दोषियों को जल्द सजा मिले और लाखों छात्रों का भविष्य सुरक्षित रहे।
यह विधेयक उन परिवारों के लिए महत्वपूर्ण है जिनके बच्चे साल भर मेहनत करके परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। पेपर लीक की घटनाएं न सिर्फ मेहनत पर पानी फेरती हैं, बल्कि मानसिक तनाव भी बढ़ाती हैं। नए कानून के लागू होने के बाद परीक्षा माफिया के लिए खेलना महंगा पड़ने वाला है। आम छात्र अब उम्मीद कर सकते हैं कि उनकी मेहनत का सही मूल्यांकन होगा और धांधली करने वालों को सजा मिलेगी।
सरकार का यह कदम परीक्षा व्यवस्था में भरोसा बहाल करने की दिशा में एक ठोस प्रयास लगता है। अब देखना होगा कि लोकसभा में पेश होने के बाद विधेयक कितनी जल्दी कानून बनता है और जमीनी स्तर पर कितना प्रभावी साबित होता है।



