पटना हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि अदालत से जमानत हासिल करने के लिए शपथ पर झूठ बोलना आरोपी को भारी पड़ सकता है, भले ही जमानत मिलने के बाद उसने किसी शर्त का उल्लंघन न किया हो। कोर्ट ने करीब आठ साल पहले दिए गए अग्रिम जमानत के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि न्यायिक राहत पाने के लिए तथ्यों को ईमानदारी से सामने रखना जरूरी है। अगर कोई व्यक्ति अपने ही दस्तावेजों में मौजूद तथ्यों के विपरीत शपथ पर बयान देता है, तो वह यह कहकर जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि सही जानकारी FIR में पहले से दर्ज थी। जमीन की खरीद-बिक्री से जुड़े इस मामले में हाईकोर्ट का फैसला उन लोगों के लिए अहम है, जो अदालत में गलत जानकारी देकर राहत हासिल करने की कोशिश करते हैं।
जमीन के सौदे से शुरू हुआ विवाद, 49.73 लाख रुपये के भुगतान पर उठे सवाल
यह मामला बिहार के हाजीपुर में पुश्तैनी जमीन की बिक्री से जुड़ा है। शिकायतकर्ता राम अयोध्या साहनी के मुताबिक, उन्होंने अपनी जमीन बेचने की जिम्मेदारी अपने भतीजे अमित कुमार उर्फ अमित कुमार साहनी को सौंपी थी। आरोप है कि भतीजे ने जमीन का एक हिस्सा खुद खरीदने और बाकी हिस्से के लिए दूसरे खरीदार तलाशने की बात कही थी।
शिकायतकर्ता का दावा था कि पूरे सौदे में कुल 49.73 लाख रुपये का भुगतान बैंकिंग माध्यम से किया जाना था। लेकिन 14 सितंबर 2017 को चार बिक्री विलेख यानी सेल डीड रजिस्टर्ड होने के बावजूद उन्हें कथित तौर पर पैसे नहीं मिले। उनका आरोप था कि इन दस्तावेजों में गलत तरीके से यह दर्ज कर दिया गया कि पूरी रकम का भुगतान पहले ही किया जा चुका है।
मामले में धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक साजिश जैसे आरोप लगाए गए। शिकायतकर्ता ने बाद में अदालत का रुख करते हुए कहा कि आरोपी ने अग्रिम जमानत लेते समय अपनी भूमिका के बारे में गलत जानकारी दी थी।
जमानत के लिए आरोपी ने क्या कहा था? दस्तावेजों से खुली पोल
मामले में अमित कुमार ने पहले सत्र अदालत में अग्रिम जमानत की अर्जी दाखिल की थी। अगस्त 2018 में उनकी अर्जी खारिज हो गई। इसके बाद उन्होंने पटना हाईकोर्ट का रुख किया और 4 दिसंबर 2018 को अग्रिम जमानत हासिल कर ली।
हालांकि, शिकायतकर्ता ने इस आदेश को चुनौती दी। उनका कहना था कि आरोपी ने शपथ पर खुद को केवल बिक्री विलेख में एक ‘पहचानकर्ता’ बताया था। यानी उसने दावा किया था कि वह न तो जमीन का विक्रेता था और न ही खरीदार।
लेकिन शिकायतकर्ता के मुताबिक, आरोपी खुद विवादित जमीन के सबसे बड़े हिस्से का खरीदार था। उसने 32.75 डिसमिल जमीन 29.48 लाख रुपये में रजिस्टर्ड सेल डीड के जरिए खरीदी थी।
जस्टिस संदीप कुमार की एकल पीठ ने दस्तावेजों पर विचार करते हुए पाया कि आरोपी की ओर से दिया गया बयान रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों से मेल नहीं खाता था। कोर्ट ने कहा कि जिस व्यक्ति के पक्ष में खुद रजिस्टर्ड सेल डीड तैयार हुई हो, वह यह दावा नहीं कर सकता कि उसे उस लेन-देन की जानकारी नहीं थी।
यही विरोधाभास अग्रिम जमानत रद्द करने की कार्यवाही में महत्वपूर्ण साबित हुआ।
FIR में सही जानकारी होने की दलील भी नहीं आई काम
अग्रिम जमानत रद्द करने का विरोध करते हुए आरोपी की ओर से दलील दी गई कि जमानत अर्जी के साथ FIR की कॉपी भी लगाई गई थी। उसमें संबंधित तथ्यों का उल्लेख मौजूद था। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि अदालत से कोई जरूरी तथ्य छिपाया गया।
आरोपी की ओर से यह तर्क भी दिया गया कि जमानत आमतौर पर तभी रद्द की जाती है, जब आरोपी रिहा होने के बाद स्वतंत्रता का दुरुपयोग करे, गवाहों को धमकाए या कोई अन्य अनुचित गतिविधि करे।
हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी मामले में राहत मांगने वाले व्यक्ति की जिम्मेदारी है कि वह अपनी याचिका और शपथपत्र में सभी महत्वपूर्ण तथ्यों का सही खुलासा करे। केवल FIR की कॉपी संलग्न कर देना इस जिम्मेदारी को पूरा नहीं करता।
अदालत ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में याचिका और शपथपत्र में किए गए बयानों पर भरोसा किया जाता है। अगर कोई व्यक्ति शपथ लेकर ऐसा दावा करता है, जो उसके द्वारा ही पेश किए गए दस्तावेजों के विपरीत है, तो वह यह नहीं कह सकता कि गलती पकड़ना अदालत का काम था।
आठ साल बाद भी क्यों रद्द हुई जमानत? कोर्ट ने बताई अहम वजह
इस मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी था कि अग्रिम जमानत रद्द करने की अर्जी अप्रैल 2019 से लंबित थी। वहीं, जमानत का आदेश दिसंबर 2018 में पारित हुआ था। इस दौरान करीब आठ साल बीत गए। अदालत ने यह भी माना कि जमानत मिलने के बाद आरोपी की ओर से स्वतंत्रता का दुरुपयोग किए जाने का आरोप नहीं था।
इसके बावजूद हाईकोर्ट ने कहा कि इन परिस्थितियों से उस आदेश की मूल खामी दूर नहीं हो सकती, जो गलत बयान के आधार पर हासिल किया गया हो।
कोर्ट ने जमानत रद्द करने के दो अलग-अलग आधारों के बीच अंतर भी स्पष्ट किया। अगर जमानत मिलने के बाद आरोपी का व्यवहार अनुचित हो जाता है, तो उसे रद्द करने के लिए ठोस कारणों की जरूरत होती है। लेकिन यदि जमानत का आदेश ही गलत जानकारी या धोखाधड़ी के आधार पर हासिल किया गया हो, तो स्थिति अलग होती है। ऐसे आदेश को अदालत शुरू से ही दोषपूर्ण मान सकती है।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अमित कुमार ने जमीन के सौदे में अपनी भूमिका के बारे में जानबूझकर शपथ पर गलत बयान दिया था। अदालत ने 4 दिसंबर 2018 का अग्रिम जमानत आदेश वापस लेते हुए उसे रद्द कर दिया। साथ ही आरोपी की जमानत खारिज कर दी और उसके जमानत बॉन्ड को भी रद्द कर दिया।
मामले का नाम: राम अयोध्या साहनी बनाम बिहार राज्य एवं अन्य (Ram Ayodhya Sahani v. State of Bihar and Anr.)
आम लोगों के लिए इस फैसले का क्या मतलब है?
इस फैसले का व्यापक संदेश यह है कि अदालत से राहत मांगते समय सही जानकारी देना बेहद जरूरी है। कोई दस्तावेज साथ लगा देने भर से शपथपत्र में किए गए गलत दावे सही नहीं हो जाते। जमीन की खरीद-बिक्री जैसे विवादों में भी दस्तावेजों और अदालत में दिए गए बयानों के बीच अंतर गंभीर कानूनी परिणाम पैदा कर सकता है। हालांकि, इस मामले में लगे आरोपों और अदालत की टिप्पणियों को इसी मुकदमे के तथ्यों के संदर्भ में समझना चाहिए।



