उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में रहने वाली 12वीं क्लास की छात्रा पूजा आज देश के लाखों स्टूडेंट्स के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं हैं. एक बेहद गरीब और सामान्य परिवार से आने वाले पूजा ने अपनी पढ़ाई के दम पर जापान में भारत का प्रतिनिधित्व किया है. हालांकि, इस पूरे मामले में सबसे बड़ी विडंबना यह है कि पूजा का परिवार अब तक मुलभूत सुविधा जैसे बिजली और शौचालय तक के लिए तरस रहा है.
दिये की रोशनी में पढ़ाई कर रही पूजा
छोटे से छप्पर नुमा घर में पूजा अपने माता-पिता और पांच भाई बहनों के साथ रहती हैं. आजादी के 77 साल पूरा हो जाने के बावजूद आज भी पूजा दिये की रोशनी में पढ़ाई करने को मजबूर हैं. बताया जा रहा है कि डीएम ने पूजा के घर में बिजली कनेक्शन और शौचालय की स्वीकृति दे दी है. घर में मीटर भी लग गया है, लेकिन खंभे से घर तक केबल खरीदने के लिए पैसे नहीं है. इस कारण पूजा के घर तक बिजली नहीं पहुंची है. पूजा पढ़ाकू छात्रा होने के साथ-साथ घरेलू जिम्मेदारियों में भी आगे हैं.
जानें कब मिली पहली बार पहचान
पूजा की कहानी एक मिसाल है प्रतिभा की, संकल्प की और बदलाव की. क्लास 8 में पढ़ाई के दौरान पूजा को पहली बार पहचान तब मिली जब उन्होंने एक अनोखा विज्ञान मॉडल तैयार किया. यह मॉडल धूल रहित थ्रेशर मशीन का है. स्कूल के पास मौजूद थ्रेशर मशीन से उड़ने वाली धूल के कारण बच्चों को परेशानी होती थी. इसी समस्या से प्रेरित होकर पूजा ने टिन और एक पंखे की मदद से ऐसा मॉडल तैयार किया जो धूल को उड़ने से रोकता है और उसे एक थैले में इकट्ठा कर देता है.
पहले मॉडल को तैयार करने में 3 हजार का लागत
यह मॉडल न केवल पर्यावरण के लिए सुरक्षित था, बल्कि किसानों के लिए भी बेहद उपयोगी साबित हो सकता है. इस मॉडल को तैयार करने में पूजा ने करीब 3,000 रुपये खर्च किए. एक ऐसी राशि जो उनके परिवार के लिए काफी बड़ी थी. साल 2020 में उनका मॉडल पहले जिला और मंडल स्तर पर, फिर राज्य स्तरीय प्रदर्शनी में चुना गया और आखिर में राष्ट्रीय विज्ञान मेले तक पहुंचा. साल 2024 में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय की ओर से आयोजित राष्ट्रीय विज्ञान मेले में भी पूजा के मॉडल को विशेष स्थान मिला.
जापन में किया भारत का प्रतिनिधित्व
पूजा की मेहनत तब रंग लाई जब जून 2025 में भारत सरकार ने शैक्षिक भ्रमण के लिए जापान भेजा. वहां उन्होंने अपने मॉडल और विचारों से खूब सराहना बटोरी और यह साबित किया कि सच्ची प्रतिभा कभी संसाधनों की मोहताज नहीं होती. जापान से लौटने के बाद अब पूजा का सपना है कि वह अपने गांव के गरीब बच्चों को शिक्षित करे और उन्हें आगे बढ़ने की राह दिखाए.



