लोकसभा में प्रियंका गांधी का तीखा हमला: ‘महिलाएं बहकावे को पहचानती हैं’, महिला आरक्षण बिल पर सरकार घिरी

लोकसभा में प्रियंका गांधी का तीखा हमला: ‘महिलाएं बहकावे को पहचानती हैं’, महिला आरक्षण बिल पर सरकार घिरी

लोकसभा में महिला आरक्षण संशोधन विधेयक पर चर्चा के दौरान कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने साफ कहा कि उनकी पार्टी महिला आरक्षण का समर्थन करती है, लेकिन इसके साथ जो परिसीमन (डिलिमिटेशन) जोड़ा जा रहा है, उस पर गंभीर आपत्ति है। उनके बयान ने सदन में राजनीतिक माहौल को और गर्म कर दिया।

महिला आरक्षण पर समर्थन, लेकिन शर्तों पर विरोध

प्रियंका गांधी ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने की पहल का कांग्रेस हमेशा समर्थन करती रही है। उन्होंने याद दिलाया कि 2023 में जब यह बिल पहली बार लाया गया था, तब भी पार्टी ने उसका समर्थन किया था।

हालांकि, मौजूदा संशोधन को लेकर उन्होंने सवाल उठाए। उनके मुताबिक, बिल के साथ जो परिसीमन की प्रक्रिया जुड़ी है, वही असली चिंता का विषय है। उन्होंने इसे प्रतिनिधित्व के संतुलन से जुड़ा मुद्दा बताया और कहा कि इसके जरिए राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित करने की कोशिश हो सकती है।

प्रधानमंत्री पर तंज, ‘बहकावे’ का आरोप

अपने भाषण के दौरान प्रियंका गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधा निशाना साधा। उन्होंने कहा कि बार-बार बहकाने की कोशिश करने वालों को महिलाएं आसानी से पहचान लेती हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि सरकार भले ही कहे कि उसे इस बिल का श्रेय नहीं चाहिए, लेकिन इसके पीछे राजनीतिक मंशा नजर आती है। उनके इस बयान ने सदन में तीखी प्रतिक्रिया पैदा की और बहस को और तेज कर दिया।

जातिगत जनगणना और OBC प्रतिनिधित्व पर सवाल

प्रियंका गांधी ने इस मुद्दे को जातिगत जनगणना से भी जोड़ा। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार नई जनगणना कराने से बच रही है क्योंकि इससे ओबीसी वर्ग की वास्तविक संख्या सामने आ सकती है।

उनके अनुसार, अगर सही आंकड़े सामने आएंगे, तो उसी अनुपात में आरक्षण की मांग भी मजबूत होगी। उन्होंने कहा कि मौजूदा बिल में 2011 की जनगणना को आधार बनाया जा रहा है, जिससे कई वर्गों का वास्तविक प्रतिनिधित्व प्रभावित हो सकता है।

लोकतंत्र और प्रतिनिधित्व पर चिंता

प्रियंका गांधी ने अपने भाषण में यह भी कहा कि अगर यह विधेयक मौजूदा स्वरूप में पारित होता है, तो इससे लोकतांत्रिक ढांचे पर असर पड़ सकता है। उन्होंने इसे प्रतिनिधित्व के संतुलन के लिए चुनौती बताया।

उन्होंने सरकार से सवाल किया कि इतनी जल्दबाजी क्यों है और क्या इसके पीछे कोई राजनीतिक रणनीति है। उनके अनुसार, बिल की गहराई में जाने पर इसके प्रभाव को समझना जरूरी है।

यह बहस केवल एक विधेयक तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश में प्रतिनिधित्व, सामाजिक संतुलन और राजनीतिक पारदर्शिता जैसे बड़े मुद्दों से जुड़ी हुई है। आम नागरिक के लिए यह समझना जरूरी है कि संसद में होने वाली ऐसी चर्चाएं सीधे तौर पर भविष्य की नीतियों और व्यवस्था को प्रभावित करती हैं।