पुणे की स्पेशल MP/MLA कोर्ट ने राहुल गांधी के खिलाफ चल रहे विनायक सावरकर मानहानि मामले में एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने खुद को सावरकर के जीवन का शोधकर्ता और जानकार बताने वाले पंकज फड़नीस की हस्तक्षेप याचिका खारिज कर दी। इतना ही नहीं, कोर्ट ने यह कहते हुए उन पर 20,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया कि उन्होंने अदालत का कीमती समय बर्बाद किया। यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे साफ हो गया कि निजी आपराधिक मानहानि के मुकदमे में हर व्यक्ति सिर्फ विशेषज्ञता के आधार पर पक्षकार नहीं बन सकता।
सावरकर मामले में दखल देने की कोशिश क्यों हुई?
यह मामला कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ दायर आपराधिक मानहानि शिकायत से जुड़ा है। यह शिकायत विनायक सावरकर के भाई के पोते सत्याकी सावरकर ने दर्ज कराई थी। आरोप है कि लंदन में दिए गए एक भाषण के दौरान राहुल गांधी ने सावरकर के बारे में कथित रूप से आपत्तिजनक टिप्पणी की थी।
फिलहाल स्पेशल कोर्ट में शिकायतकर्ता सत्याकी सावरकर की जिरह चल रही है। इसी दौरान पंकज फड़नीस ने अदालत में याचिका दाखिल कर खुद को मामले में शामिल करने की मांग की। उनका कहना था कि उन्होंने सावरकर के जीवन पर करीब 25 साल तक शोध किया है और इस विषय पर तीन किताबें भी लिखी हैं। उनके मुताबिक, सत्याकी सावरकर को सावरकर की विचारधारा और जीवन के बारे में पर्याप्त व्यक्तिगत जानकारी नहीं है, इसलिए जिरह के दौरान कई बातें सही तरीके से सामने नहीं आ पा रही हैं।
कोर्ट ने क्यों कहा- आपका इस मामले से कानूनी संबंध नहीं
स्पेशल जज अमोल शिंदे ने फड़नीस की दलीलों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि फड़नीस इस मामले में “पीड़ित व्यक्ति” की कानूनी श्रेणी में नहीं आते। उन्होंने यह भी साबित नहीं किया कि राहुल गांधी की कथित टिप्पणी से उनके किसी कानूनी अधिकार का उल्लंघन हुआ है।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि फड़नीस न तो सावरकर के परिवार के सदस्य हैं और न ही ऐसे करीबी रिश्तेदार, जिन्हें आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 199 के तहत इस मामले में हस्तक्षेप करने का अधिकार मिले। इसलिए उन्हें कार्यवाही में पक्षकार नहीं बनाया जा सकता।
अदालत ने यह भी माना कि उनकी याचिका की वजह से सुनवाई का समय अनावश्यक रूप से खर्च हुआ। इसी आधार पर उन्हें पुणे जिला विधिक सेवा प्राधिकरण में 20,000 रुपये जमा कराने का निर्देश दिया गया।
जिरह से सवाल हटाने की मांग भी नहीं मानी गई
फड़नीस ने सिर्फ हस्तक्षेप की मांग ही नहीं की थी। उन्होंने यह भी आग्रह किया था कि अब तक जिरह के दौरान पूछे गए सवालों और दिए गए जवाबों को रिकॉर्ड से हटाया जाए। उनका तर्क था कि कई सवाल अदालत के अधिकार क्षेत्र से बाहर के ऐतिहासिक और राजनीतिक मुद्दों से जुड़े हैं।
हालांकि राहुल गांधी के वकील मिलिंद पवार ने इसका कड़ा विरोध किया। उन्होंने अदालत से कहा कि किसी आपराधिक मुकदमे को ऐसे लोगों के लिए खुला मंच नहीं बनाया जा सकता, जो बाद में अपना स्वतंत्र हित बताकर कार्यवाही में शामिल होना चाहें। उन्होंने यह भी दलील दी कि यदि ऐसे हस्तक्षेप की अनुमति दी गई तो इससे मुकदमे में बार-बार नए पक्ष जुड़ेंगे और निष्पक्ष सुनवाई प्रभावित होगी।
शिकायतकर्ता ने भी जताया विरोध, आगे क्या होगा?
शिकायतकर्ता सत्याकी सावरकर की ओर से वकील संग्राम कोल्हाटकर ने भी फड़नीस की याचिका का विरोध किया। उनका कहना था कि भारतीय आपराधिक कानून निजी मानहानि के मुकदमों में अनावश्यक इंटरवेनर की व्यवस्था नहीं करता। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि फड़नीस की मौजूदगी से मुकदमे में देरी होगी और कार्यवाही मूल मुद्दे से भटक जाएगी।
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद स्पेशल कोर्ट ने हस्तक्षेप याचिका पूरी तरह खारिज कर दी। इसके साथ ही अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि मौजूदा सुनवाई शिकायतकर्ता और आरोपी के बीच तय कानूनी दायरे में ही आगे बढ़ेगी।
Case Title: Satyaki Savarkar vs Rahul Gandhi


