सरकारी अस्पताल में स्टेंट नहीं मिला तो प्राइवेट से खरीदना पड़ा, हाईकोर्ट ने कहा- मरीज को लौटानी होगी पूरी रकम

सरकारी अस्पताल में स्टेंट नहीं मिला तो प्राइवेट से खरीदना पड़ा, हाईकोर्ट ने कहा- मरीज को लौटानी होगी पूरी रकम

राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में सरकारी अस्पताल में इलाज करा रहे मरीज को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि मरीज को प्राइवेट सप्लायर से खरीदे गए स्टेंट की बची हुई पूरी रकम वापस की जाए। मामला जोधपुर के मथुरा दास माथुर अस्पताल का है, जहां दिल की बीमारी के इलाज के दौरान मरीज को चार स्टेंट लगाए गए थे। अस्पताल में स्टेंट उपलब्ध नहीं होने के कारण मरीज के परिवार को बाहर से इन्हें खरीदना पड़ा। कुल खर्च करीब 2.70 लाख रुपये आया, लेकिन सरकारी स्तर पर सिर्फ 1.70 लाख रुपये की ही प्रतिपूर्ति की गई।

मामला हाईकोर्ट पहुंचा तो सिंगल जज ने मरीज के पक्ष में फैसला सुनाया और पूरी रकम वापस करने का निर्देश दिया। राज्य सरकार ने इस आदेश को डिवीजन बेंच में चुनौती दी। अब जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस विनीत कुमार माथुर की पीठ ने सिंगल जज के फैसले को बरकरार रखा है।

अस्पताल में स्टेंट नहीं था, मरीज को बाहर से खरीदना पड़ा

मामले की शुरुआत एक दिल के मरीज के इलाज से हुई। मरीज का ऑपरेशन जोधपुर के मथुरा दास माथुर अस्पताल में किया गया। इलाज के दौरान चार स्टेंट की जरूरत पड़ी। लेकिन सरकारी अस्पताल में उस समय स्टेंट उपलब्ध नहीं थे।

ऐसे में मरीज को जरूरी स्टेंट प्राइवेट सप्लायर से खरीदने पड़े। इसके लिए करीब 2.70 लाख रुपये खर्च हुए। इलाज पूरा होने के बाद मरीज को इस खर्च का पूरा पैसा वापस नहीं मिला। सरकारी व्यवस्था के तहत उसे करीब 1.70 लाख रुपये ही लौटाए गए।

बाकी रकम की वापसी के लिए मरीज ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। उसका तर्क था कि जब इलाज सरकारी अस्पताल में हो रहा है और जरूरी मेडिकल उपकरण अस्पताल में उपलब्ध नहीं हैं, तो मरीज को अपनी जेब से उसका इंतजाम करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

सरकार ने कहा- तीन से ज्यादा स्टेंट का खर्च नियमों में नहीं

राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में सिंगल जज के फैसले को चुनौती देते हुए कहा कि मरीज को तीन से अधिक स्टेंट के खर्च की प्रतिपूर्ति का निर्देश नियमों के अनुरूप नहीं था।

सरकार ने राजस्थान सिविल सेवा (मेडिकल अटेंडेंस) नियम, 2013 के अपेंडिक्स IX का हवाला दिया। सरकार का कहना था कि इन नियमों के तहत तीन से अधिक स्टेंट के खर्च की प्रतिपूर्ति की अनुमति नहीं है।

दूसरी तरफ मरीज की ओर से कहा गया कि सरकारी अस्पताल में इलाज कराने वाले व्यक्ति को जरूरी मेडिकल सुविधा और उपकरण उपलब्ध कराना अस्पताल की जिम्मेदारी है। अगर इलाज के दौरान इस्तेमाल होने वाली कोई जरूरी चीज अस्पताल में मौजूद नहीं है और मरीज को मजबूरी में उसे प्राइवेट सप्लायर से खरीदना पड़ता है, तो उसका वास्तविक खर्च मरीज को वापस मिलना चाहिए।

यानी विवाद सिर्फ स्टेंट की संख्या को लेकर नहीं था। असली सवाल यह था कि सरकारी अस्पताल में इलाज के दौरान जरूरी मेडिकल उपकरण उपलब्ध नहीं होने का आर्थिक बोझ आखिर किस पर पड़ेगा।

हाईकोर्ट ने स्वास्थ्य के अधिकार को माना अहम आधार

डिवीजन बेंच ने मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का भी संदर्भ लिया। इनमें Consumer Education and Research Centre and Others v. Union of India and Others का फैसला शामिल था।

इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्वास्थ्य और मेडिकल देखभाल के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21 से जोड़ते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी। अदालत ने स्वास्थ्य और मेडिकल देखभाल को व्यक्ति के जीवन और गरिमा से जुड़े अधिकार के रूप में देखा था।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ‘In Re: Proper Treatment of COVID-19 Patients and Dignified Handling of Dead Bodies in Hospitals etc.’ मामले का भी उल्लेख किया। इसमें स्वास्थ्य के अधिकार को अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार माना गया था और इसमें किफायती इलाज के अधिकार को भी शामिल बताया गया था।

इसी आधार पर राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि मेडिकल इलाज के खर्च की प्रतिपूर्ति से जुड़े प्रावधानों की व्याख्या बहुत संकीर्ण तरीके से नहीं की जानी चाहिए। मरीज के स्वास्थ्य के अधिकार को ध्यान में रखते हुए इन नियमों को उदार दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए।

सिंगल जज का फैसला बरकरार, बाकी रकम लौटाने का आदेश

डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार की अपील को स्वीकार नहीं किया और सिंगल जज के आदेश को बरकरार रखा। कोर्ट ने राज्य को निर्देश दिया कि मरीज को स्टेंट की कीमत की बाकी बची रकम का भुगतान किया जाए।

इस फैसले का सीधा असर उस मरीज पर पड़ा है, जिसे सरकारी अस्पताल में इलाज के दौरान जरूरी स्टेंट उपलब्ध नहीं होने के कारण बाहर से खरीदने पड़े थे।

फैसले का व्यापक महत्व इस बात में है कि सरकारी अस्पताल में इलाज करा रहे मरीज के लिए जरूरी मेडिकल उपकरण की उपलब्धता और उसके खर्च का सवाल केवल प्रशासनिक या नियमों का विषय नहीं रह जाता। अदालत ने इसे स्वास्थ्य के मौलिक अधिकार के संदर्भ में देखा है।

मामला Chairman-cum-Managing Director, Jodhpur Vidhyut Vitran Nigam Limited & Ors. v. Jagdish Chandra Bissa के नाम से दर्ज है। राजस्थान हाईकोर्ट का यह फैसला सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में इलाज करा रहे उन मरीजों के लिए महत्वपूर्ण है, जिन्हें अस्पताल में जरूरी मेडिकल सामग्री उपलब्ध न होने पर बाहर से खरीदारी करनी पड़ती है।