दीवानी मुकदमों में लिखित बयान दाखिल करने में देरी होने पर क्या उसे हर मामले में एक ही नियम से माफ किया जा सकता है? राजस्थान हाईकोर्ट ने इसका जवाब साफ कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि गैर-वाणिज्यिक दीवानी मामलों में लिखित बयान दाखिल करने की तय समय-सीमा को लेकर कोई कठोर और सार्वभौमिक फॉर्मूला नहीं बनाया जा सकता। देरी हुई है तो उसके पीछे की वजह देखनी होगी। मामला किन परिस्थितियों में आगे बढ़ा, पक्षकार की स्थिति क्या थी और देरी से दूसरे पक्ष को कितना नुकसान हुआ—इन सभी पहलुओं पर अदालत को विचार करना होगा।
जस्टिस सुदेश बंसल ने यह टिप्पणी उस याचिका पर फैसला सुनाते हुए की, जिसमें निचली अदालत के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसके जरिए देरी से दाखिल लिखित बयान को रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति दी गई थी।
Order 8 Rule 1 में समय-सीमा अनिवार्य या सिर्फ निर्देशात्मक?
मामले में सबसे अहम सवाल CPC के Order 8 Rule 1 से जुड़ा था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि गैर-वाणिज्यिक दीवानी मुकदमों में इस प्रावधान के तहत लिखित बयान दाखिल करने की समय-सीमा को अनिवार्य यानी ऐसा नियम नहीं माना जा सकता, जिसके बाद हर स्थिति में अदालत के हाथ बंध जाएं।
कोर्ट ने कहा कि यह प्रावधान मुख्य रूप से मुकदमे की कार्यवाही को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए है। इसका उद्देश्य यह है कि पक्षकार अनावश्यक रूप से समय न लें और मामला लंबे समय तक लटका न रहे।
लेकिन इसका यह अर्थ भी नहीं है कि तय अवधि गुजरने के बाद कोई भी पक्ष बिना वजह लिखित बयान दाखिल कर सकता है। यदि देरी के बाद लिखित बयान रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति मांगी जाती है, तो संबंधित पक्ष को देरी का पर्याप्त कारण या उचित स्पष्टीकरण देना होगा।
यानी अदालत के सामने सिर्फ देरी होना ही सवाल नहीं है। असली बात यह होगी कि देरी क्यों हुई।
2021 में मुकदमा, 2026 में दाखिल हुआ लिखित बयान
यह विवाद एक स्थायी निषेधाज्ञा से जुड़े दीवानी मुकदमे से सामने आया। याचिकाकर्ता ने जून 2021 में मुकदमा दायर किया था। इसमें कुल 10 लोगों को प्रतिवादी बनाया गया था। रिकॉर्ड के मुताबिक, जून 2021 में सभी प्रतिवादियों को समन की तामील भी हो गई थी।
इसके बावजूद एक प्रतिवादी ने अप्रैल 2026 में अपना लिखित बयान दाखिल किया। यानी मुकदमा दायर होने के काफी समय बाद लिखित बयान रिकॉर्ड पर लाया गया। प्रतिवादी ने इसके साथ देरी माफ करने के लिए आवेदन भी दिया।
निचली अदालत ने इस आवेदन को स्वीकार कर लिया और लिखित बयान रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति दे दी। याचिकाकर्ता ने इसी आदेश को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी।
याचिकाकर्ता की दलील थी कि प्रतिवादी ने इतनी देरी के लिए कोई पर्याप्त वजह नहीं बताई है। ऐसे में Order 8 Rule 1 के तहत निर्धारित समय के बाद लिखित बयान स्वीकार करने का आधार नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी दिया हवाला
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कैलाश बनाम नानकू मामले का उल्लेख किया। इसमें सुप्रीम कोर्ट ने Order 8 Rule 1 में तय समय-सीमा को निर्देशात्मक माना था। इसका मकसद मुकदमे की प्रक्रिया में तेजी लाना है, न कि ऐसी स्थिति पैदा करना जिसमें न्यायिक प्रक्रिया ही प्रभावित हो जाए।
कोर्ट ने एटकॉम टेक्नोलॉजीज लिमिटेड बनाम वाई.ए. चुनावाला एंड कंपनी के फैसले का भी संदर्भ दिया। सुप्रीम कोर्ट ने उस मामले में संबंधित प्रावधान को प्रक्रिया से जुड़ा माना था, न कि किसी मूल अधिकार को तय करने वाला प्रावधान।
इसी आधार पर राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि उचित परिस्थितियों में समय-सीमा बीतने के बाद भी अदालत के पास लिखित बयान रिकॉर्ड पर लेने की शक्ति रह सकती है। लेकिन हर मामले में देरी को माफ करना भी जरूरी नहीं है।
‘एक ही फॉर्मूला नहीं’, मामले के नुकसान और हालात भी देखे जाएंगे
जस्टिस सुदेश बंसल ने खास तौर पर कहा कि गैर-वाणिज्यिक विवादों में देरी को लेकर कोई एक तय फॉर्मूला नहीं बनाया जा सकता। हर मुकदमे के तथ्य अलग होते हैं। इसलिए अदालत को परिस्थितियों के आधार पर निर्णय लेना होगा।
कोर्ट यह भी देख सकती है कि देरी से दूसरे पक्ष को वास्तविक और गंभीर नुकसान हुआ या नहीं। साथ ही यह भी महत्वपूर्ण है कि देरी के लिए जिम्मेदार कौन था और मुकदमे की पूरी परिस्थितियां क्या थीं।
इस मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि लिखित बयान को रिकॉर्ड पर लेने से याचिकाकर्ता को कोई गंभीर prejudice या नुकसान नहीं हुआ। अदालत ने यह भी माना कि मुकदमे में हुई देरी के लिए संबंधित प्रतिवादी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
इसी वजह से हाईकोर्ट ने निचली अदालत के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और याचिका खारिज कर दी। नतीजतन, देरी से दाखिल किया गया लिखित बयान रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति बरकरार रही।
इस फैसले का व्यावहारिक संदेश यही है कि समय-सीमा महत्वपूर्ण है, लेकिन गैर-वाणिज्यिक दीवानी मामलों में हर देरी का फैसला सिर्फ कैलेंडर देखकर नहीं किया जाएगा। अदालत देरी का कारण, मुकदमे की परिस्थितियां और दूसरे पक्ष पर उसके असर को देखकर तय करेगी कि लिखित बयान स्वीकार किया जाना चाहिए या नहीं।


