राम मंदिर चंदे से जुड़े विवादों और कथित गड़बड़ियों पर रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार अभिषेक उपाध्याय अब खुद एक कानूनी विवाद में फंस गए हैं। गाजियाबाद के इंदिरापुरम इलाके में दर्ज रोड-रेज की FIR को चुनौती देते हुए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। उपाध्याय का आरोप है कि उनके खिलाफ दर्ज मामला तथ्यों पर आधारित नहीं है और उनकी पत्रकारिता के कारण उन्हें निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने FIR रद्द करने के साथ गिरफ्तारी और किसी भी कठोर कार्रवाई से सुरक्षा की मांग की है।
शिप्रा मॉल के पास आखिर हुआ क्या था?
मामला 18 अगस्त का है। इंदिरापुरम पुलिस स्टेशन में दर्ज शिकायत के मुताबिक, शिप्रा मॉल के पास एक बलेनो कार ने कथित तौर पर एक मोटरसाइकिल सवार को टक्कर मारी। शिकायतकर्ता का आरोप है कि हादसे के बाद कार चालक ने उसके साथ गाली-गलौज और धमकी दी। शिकायत में कार से जुड़े मामले में अभिषेक उपाध्याय का नाम सामने आया।
हालांकि, उपाध्याय ने इन आरोपों को पूरी तरह नकार दिया है। उनका कहना है कि उस दिन वह अपनी बेटी को स्कूल से लेकर लौट रहे थे। शिप्रा मॉल के पास एक बाइक सवार उनकी कार के पास आया और विवाद करने लगा, लेकिन उनके मुताबिक न तो कार से बाइक की टक्कर हुई और न ही कोई मारपीट हुई। बेटी उनके साथ थी, इसलिए उन्होंने विवाद बढ़ाने के बजाय वहां से निकलना बेहतर समझा।
याचिका में उन्होंने FIR में दर्ज बाइक के नंबर को लेकर भी सवाल उठाया है। उनका दावा है कि शिकायत में जिस स्प्लेंडर बाइक का उल्लेख किया गया है, उसके साथ दिया गया रजिस्ट्रेशन नंबर किसी दूसरी बाइक से संबंधित है। उपाध्याय के मुताबिक, यह विसंगति पूरे मामले की जांच के दौरान महत्वपूर्ण हो सकती है।
CCTV फुटेज को लेकर भी उठाए सवाल
पत्रकार ने पुलिस की कार्रवाई पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि पुलिसकर्मी घटनास्थल के आसपास मौजूद दुकानदारों के पास पहुंचे और CCTV फुटेज को लेकर दबाव बनाया गया। उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि घटनास्थल के आसपास लगे कैमरों की रिकॉर्डिंग और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सबूत सुरक्षित रखने के निर्देश दिए जाएं।
उनका यह भी कहना है कि उन्होंने FIR की पूरी कॉपी उपलब्ध कराने का अनुरोध किया, लेकिन उन्हें पूरी FIR नहीं दी गई। याचिका में दावा किया गया है कि सुप्रीम कोर्ट के ‘यूथ बार एसोसिएशन’ मामले में दिए गए निर्देशों के बावजूद FIR को पुलिस की वेबसाइट पर भी अपलोड नहीं किया गया।
मामला तब और गंभीर हो गया जब उपाध्याय के मुताबिक 20 अगस्त की रात करीब एक दर्जन पुलिसकर्मियों की टीम उनके घर पहुंची। उस समय वह घर पर मौजूद नहीं थे। घर में उनकी पत्नी और दो बेटियां थीं। उपाध्याय ने इस घटनाक्रम को अपनी गिरफ्तारी की आशंका से जोड़ते हुए सुप्रीम कोर्ट से सुरक्षा की मांग की है।
पत्रकारिता और FIR के बीच क्या है कनेक्शन?
याचिका में अभिषेक उपाध्याय ने अपने खिलाफ हुई कार्रवाई को अपनी खोजी पत्रकारिता से भी जोड़कर देखा है। उनका कहना है कि उन्होंने उत्तर प्रदेश में कथित भ्रष्टाचार और सरकारी व्यवस्था से जुड़े कई मामलों पर रिपोर्टिंग की है। इनमें अयोध्या में राम मंदिर के चंदे से जुड़े विवाद और सरकारी अधिकारियों तथा विभागों पर लगाए गए आरोपों से संबंधित रिपोर्टें भी शामिल हैं।
उपाध्याय का आरोप है कि रोड-रेज की FIR उन्हीं रिपोर्टों के बाद उन्हें परेशान करने की कोशिश का हिस्सा हो सकती है। हालांकि, यह उनका दावा है और मामले में लगाए गए आरोपों की अंतिम पुष्टि अदालत या जांच के निष्कर्ष से ही होगी।
उन्होंने यह भी कहा है कि मौजूदा परिस्थितियों में उनके लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख करना आसान नहीं है, क्योंकि उन्हें तत्काल गिरफ्तारी का डर है। इसी वजह से उन्होंने सीधे सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर गिरफ्तारी से सुरक्षा मांगी है।
CBI जैसी एजेंसी से जांच की मांग
सुप्रीम कोर्ट के सामने उपाध्याय ने केवल FIR रद्द करने की मांग ही नहीं रखी है। उन्होंने वैकल्पिक तौर पर उत्तर प्रदेश पुलिस से अलग किसी स्वतंत्र एजेंसी से मामले की जांच कराने का आग्रह भी किया है। याचिका में CBI जैसी एजेंसी से जांच की मांग का उल्लेख किया गया है।
साथ ही उन्होंने अदालत को बताया है कि वह किसी भी वैधानिक जांच में सहयोग करने के लिए तैयार हैं। अब इस मामले में आगे की तस्वीर अदालत की सुनवाई और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर साफ होगी।
फिलहाल पूरा विवाद दो अलग-अलग दावों के बीच खड़ा है। पुलिस शिकायत में रोड-रेज और धमकी के आरोप हैं, जबकि पत्रकार इन आरोपों से इनकार करते हुए FIR की प्रक्रिया, बाइक नंबर, CCTV फुटेज और पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठा रहे हैं। ऐसे में आने वाले समय में जांच और न्यायिक प्रक्रिया यह तय करने में अहम भूमिका निभाएगी कि मामले की वास्तविक स्थिति क्या है।


