पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष अब भारत की आम जनता की रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगा है। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि अगर यह तनाव लंबा खिंचा तो पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ सकती हैं। फिलहाल सरकार और सरकारी तेल कंपनियां कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का बोझ खुद उठा रही हैं, लेकिन यह स्थिति ज्यादा दिनों तक जारी नहीं रखी जा सकती। स्विट्जरलैंड में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में गवर्नर मल्होत्रा के इन बयानों ने अर्थव्यवस्था की चिंता को और गहरा कर दिया है।
आम नागरिक के लिए यह खबर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ईंधन की कीमतों में कोई भी बढ़ोतरी सीधे ट्रांसपोर्ट, किराने के सामान और रोजाना की जरूरतों की महंगाई को बढ़ा देगी।
सरकार और RBI की वर्तमान रणनीति
सरकार ने अभी एक्साइज ड्यूटी कम रखी हुई है और तेल कंपनियां भी नुकसान उठाकर ग्राहकों पर पूरा बोझ नहीं डाल रही हैं। लेकिन गवर्नर मल्होत्रा ने साफ किया कि अगर युद्ध और क्षेत्रीय तनाव लंबा चला तो यह राहत ज्यादा समय तक नहीं दी जा सकेगी।
आरबीआई ने चालू वित्त वर्ष के लिए भारत की आर्थिक विकास दर 6.9 प्रतिशत रहने का अनुमान रखा है। महंगाई औसतन 4.6 प्रतिशत रहने की उम्मीद जताई गई है। अप्रैल में रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर स्थिर रखा गया था। गवर्नर ने कहा कि केंद्रीय बैंक अब हर नीतिगत बैठक में आने वाले आंकड़ों के आधार पर फैसला लेगा। अगर महंगाई का दबाव लंबे समय तक बना रहा तो जरूरी कदम उठाने में कोई हिचकिचाहट नहीं होगी।
प्रधानमंत्री की अपील और बचत की जरूरत
इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से ईंधन की बचत करने और गैर-जरूरी खर्च कम करने की अपील की है। उन्होंने खासतौर पर पेट्रोल-डीजल का कम इस्तेमाल करने और सोने की खरीदारी टालने की सलाह दी है। सरकार ने सोने पर आयात शुल्क भी दोगुना से ज्यादा बढ़ा दिया है। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में आयातित वस्तुओं की मांग को नियंत्रित करने के और भी कदम उठाए जा सकते हैं।
यह अपील इसलिए की गई है ताकि देश का विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत बना रहे और अनावश्यक आयात पर निर्भरता कम हो। आम लोगों से सीधे जुड़ी यह अपील दिखाती है कि वैश्विक संकट का सामना अब सामूहिक प्रयास से ही किया जा सकता है।
महंगाई का बढ़ता दबाव और भविष्य की चुनौतियां
अप्रैल महीने में भारत की खुदरा महंगाई बढ़कर 3.48 प्रतिशत हो गई, जो मार्च के 3.40 प्रतिशत से थोड़ी ज्यादा है। हालांकि यह आंकड़ा अनुमान से कम रहा, लेकिन विशेषज्ञ चेताव रहे हैं कि कच्चे तेल की कीमतें अगर ऊंची बनी रहीं तो महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है।
पश्चिम एशिया के तनाव ने सप्लाई चेन को भी प्रभावित किया है। माल ढुलाई और तेल आपूर्ति में दिक्कतें बढ़ रही हैं, जिसका असर आने वाले महीनों में बाजार पर साफ दिख सकता है। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि अगर संघर्ष लंबा चला तो आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी पड़ सकती है।
वर्तमान में सरकार और रिजर्व बैंक सतर्कता के साथ स्थिति को संभालने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन लंबे समय तक चले तनाव का बोझ अंततः आम आदमी तक पहुंचेगा। पेट्रोल-डीजल की संभावित महंगाई, बढ़ती महंगाई और आर्थिक अनिश्चितता हर परिवार की योजना को प्रभावित करेगी। ऐसे समय में ईंधन की बचत, अनावश्यक खर्च पर नियंत्रण और सरकार की अपीलों का साथ देना हर नागरिक की जिम्मेदारी बन जाता है। आने वाले दिनों में स्थिति कैसे विकसित होती है, इस पर हर किसी की नजर है।


