इस साल शारदीय नवरात्रि की शुरुआत सोमवार से हो रही है, और इस पावन मौके पर हम आपको उस रहस्यमयी जगह की कहानी सुनाने जा रहे हैं, जहां मां भगवती ने पहली बार धरती पर कदम रखा था। जी हां, हम बात कर रहे हैं उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से सटे सुरहा ताल की, जो अपने चमत्कारों और आध्यात्मिक शक्ति के लिए आज भी मशहूर है। दुर्गा सप्तशती, मार्कंडेय पुराण, वाराह पुराण और देवी भागवत महापुराण में इस जगह का जिक्र मिलता है, जहां मां ने राजा सूरत की प्रार्थना सुनकर अवतार लिया था।
एक राजा की जिंदगी बदलने वाली चमत्कारी घटना
कहानी शुरू होती है सतयुग से, जब राजा सूरत यवन राजाओं से जंग हार गए। बुरी तरह घायल, उनके सैनिक उन्हें लेकर जंगल में शरण लिए। प्यास से बेसुध राजा को सैनिकों ने एक छोटे से गड्ढे से पानी लाकर पिलाया। जैसे ही राजा ने वो पानी पिया, उनके सारे घाव गायब हो गए! हैरान होकर राजा उस गड्ढे तक पहुंचे और उत्साह में उसमें कूद पड़े। जब वे बाहर निकले, तो उनका बदसूरत शरीर एकदम सुंदर हो गया था। राजा के मन में विचार कौंधा—ये कोई साधारण जगह नहीं, बल्कि कोई पवित्र स्थल है।
मेघा ऋषि का आश्रम और चमत्कारों का संसार
राजा ने सैनिकों को छोड़कर अकेले उस जंगल में भटकना शुरू किया। थोड़ी देर बाद उन्हें मेघा ऋषि का आश्रम दिखाई दिया, जहां चारों तरफ बसंत की महक बिखरी थी। हैरत की बात ये थी कि हिंसक शेर, बाघ और भालू भी वहां शांतिपूर्वक घूम रहे थे, मानो हिंसा उनके स्वभाव से गायब हो गई हो। राजा ने ऋषि से इसका राज पूछा और वहीं रहने का फैसला किया।
कुछ दिन बाद एक वैश्य संदीप भी वहां पहुंचा, जिसकी सारी संपत्ति बंधुओं ने छीन ली थी। उसकी दर्दभरी कहानी सुनकर मेघा ऋषि ने दोनों को अपराजिता देवी की उपासना करने की सलाह दी। एक साल तक बिना खाए-पिए तप करने के बाद मां भगवती प्रकट हुईं और दोनों की मनोकामना पूरी की।
सुरहा ताल का जन्म और मंदिरों की कहानी
मां की कृपा से राजा और वैश्य ने वहां विशाल यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें ऋषि-मुनि, गंधर्व, किन्नर, देवी-देवता शामिल हुए। मेहमानों के लिए ठहरने और पानी की व्यवस्था के लिए राजा ने एक बड़ा जलाशय बनवाया, जिसे गंगा से जोड़ा गया। आज ये जलाशय सुरहा ताल के नाम से जाना जाता है, जो राजा सूरत के नाम से प्रेरित है। वहीं, मेघा ऋषि का आश्रम वसंतपुर कहलाया, जहां आज भी पेड़ों के पत्ते कभी नहीं सूखते।
यज्ञ से पहले राजा ने पांच मंदिर बनवाए—ब्रह्माइन में मां भगवती का मंदिर, सुरहा ताल के दूसरी ओर शंकरपुर में देवी मंदिर, और बनखंडी नाथ, अश्वनी नाथ, शोक हरण नाथ—तीन शिव मंदिर। इनमें से ब्रह्माइन मंदिर वो पवित्र स्थल है, जहां मां ने राजा को दर्शन दिए थे। मान्यता है कि यहां मां के दर्शन के बाद बाकी चार मंदिरों में प्रार्थना करने से हर मनोकामना पूरी होती है।
आज भी जिंदा है वो इतिहास
बलिया जिला मुख्यालय से महज पांच किमी दूर गोरखपुर रोड पर हनुमानगंज के ब्रह्मइन गांव में ये सारा इतिहास आज भी सांस लेता है। सुरहा ताल को गंगा से जोड़ने वाली नहर, जो पहले कुष्टहर थी, अब कटहर नाला के नाम से जानी जाती है। नवरात्रि के इस मौके पर जब भक्त मां के दर्शन के लिए उमड़ते हैं, तो ये जगह अपनी पुरानी कहानी को फिर से जीवंत कर देती है।



