सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: बिना ठोस सबूत ससुराल वालों पर दहेज-घरेलू हिंसा का केस नहीं चलेगा

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: बिना ठोस सबूत ससुराल वालों पर दहेज-घरेलू हिंसा का केस नहीं चलेगा

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में अहम फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने साफ कहा कि पति के रिश्तेदारों पर सिर्फ आरोप लगाकर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। इसके लिए ठोस सबूत जरूरी हैं। कोर्ट ने मध्य प्रदेश के गुना जिले के एक मामले को पूरी तरह रद्द कर दिया। इस फैसले से उन परिवारों को राहत मिलने की उम्मीद है, जहां वैवाहिक विवाद में पूरे ससुराल को बिना वजह परेशान किया जाता है।

आम नागरिकों के लिए यह फैसला काफी अहम है। अक्सर देखा जाता है कि पति-पत्नी के झगड़े में पूरा परिवार कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने को मजबूर हो जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रवृत्ति पर ब्रेक लगाने की कोशिश की है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कहा कि गुस्से और कड़वाहट में पूरे परिवार को हथियार बनाकर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि और कोर्ट का फैसला

यह पूरा मामला मध्य प्रदेश के गुना जिले का है। 2019 में शादी हुई एक महिला ने जनवरी 2023 में अपने पति और ससुराल वालों के खिलाफ दहेज उत्पीड़न, घरेलू हिंसा और क्रूरता के आरोप लगाए थे। महिला ने आईपीसी की धारा 498ए, धारा 34 और दहेज अधिनियम की धाराओं के तहत शिकायत दर्ज कराई थी। आरोपों में मानसिक उत्पीड़न, निगरानी, आने-जाने पर रोक और हथियार से धमकी जैसे गंभीर दावे शामिल थे।

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने ससुराल वालों की याचिका खारिज कर दी थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि सिर्फ यह कहना कि रिश्तेदारों ने पति का साथ दिया या हस्तक्षेप नहीं किया, पर्याप्त नहीं है। बिना ठोस सबूत के पूरे परिवार को मुकदमे में नहीं घसीटा जा सकता।

498ए कानून के दुरुपयोग पर सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी

धारा 498ए विवाहित महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाया गया सख्त कानून है, लेकिन इसका दुरुपयोग भी एक बड़ी समस्या बन गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि जब वैवाहिक संबंध खराब होते हैं, तो अक्सर गुस्से में पूरे ससुराल पर आरोप लगा दिए जाते हैं। निचली अदालतों को ऐसे मामलों में सावधानी बरतनी चाहिए।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रिश्तेदार होने भर से किसी पर केस नहीं चलाया जा सकता। यदि कोई ठोस सबूत न हो तो ऐसे मामले रद्द किए जा सकते हैं। बता दें कि अब आईपीसी की धारा 498ए को भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 85 और 86 के तहत शामिल किया गया है।

यह फैसला उन हजारों परिवारों के लिए उम्मीद की किरण है, जो छोटे-मोटे आरोपों में सालों तक अदालती लड़ाई लड़ रहे हैं। इससे कानून के सही इस्तेमाल पर भी बल मिलेगा।

फैसले का समाज पर प्रभाव

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सामाजिक संतुलन बनाए रखने की दिशा में एक सकारात्मक कदम है। इससे एक तरफ महिलाओं की सुरक्षा बनी रहेगी, वहीं दूसरी तरफ निर्दोष परिवारों को बेवजह परेशानी से बचाया जा सकेगा।

आम पाठक इस फैसले को राहत भरा मान रहे हैं क्योंकि आजकल वैवाहिक विवाद में पूरा परिवार प्रभावित हो जाता है। कोर्ट ने कहा है कि कानून का इस्तेमाल हथियार के रूप में नहीं होना चाहिए।