डीपफेक और AI से तैयार किए गए कंटेंट को लेकर भारत में कानूनी व्यवस्था को लेकर चल रही बहस अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है। सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट में इस मुद्दे पर चल रही PIL की कार्यवाही पर रोक लगा दी है। मामला सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर तेजी से फैलने वाले डीपफेक और सिंथेटिक तरीके से तैयार कंटेंट से जुड़ा है। कोर्ट का यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ऐसे कंटेंट की पहचान, उसे हटाने की प्रक्रिया और सोशल मीडिया कंपनियों की कानूनी जिम्मेदारी को लेकर देश में एक समान व्यवस्था की जरूरत पर चर्चा चल रही है।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने यह आदेश केंद्र सरकार की उस याचिका पर नोटिस जारी करते हुए दिया, जिसमें मामले को गुजरात हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर करने की मांग की गई है।
गुजरात हाईकोर्ट में क्या चल रहा था?
गुजरात हाईकोर्ट के सामने दाखिल PIL में डिजिटल प्लेटफॉर्म पर फैल रहे AI-जनरेटेड और डीपफेक कंटेंट को लेकर चिंता जताई गई थी। अप्रैल में हाईकोर्ट ने X, Meta, Google और Reddit जैसे सोशल मीडिया इंटरमीडियरीज को नोटिस जारी किए थे।
कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से दाखिल हलफनामों के आधार पर डिजिटल प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारियों पर विचार शुरू किया था। खास तौर पर Information Technology (Intermediary Guidelines and Digital Media Ethics Code) Rules, 2021 के तहत तय ड्यू डिलिजेंस यानी उचित सावधानी से जुड़े दायित्वों को प्रभावी तरीके से लागू करने पर जोर था। इन नियमों में 2026 के संशोधनों का भी संदर्भ सामने आया।
हाईकोर्ट ने सोशल मीडिया कंपनियों से केंद्र सरकार के SAHYOG पोर्टल से जुड़ने को भी कहा था, ताकि कानून लागू करने वाली एजेंसियों और प्लेटफॉर्म के बीच सूचना का आदान-प्रदान और कार्रवाई तेज हो सके।
कंटेंट हटाने में देरी पर कोर्ट की नजर
मामले में एक बड़ा सवाल यह था कि जब किसी डिजिटल प्लेटफॉर्म को गैरकानूनी कंटेंट हटाने के लिए कानूनी नोटिस दिया जाता है, तो उस पर कितनी तेजी से कार्रवाई होनी चाहिए।
हाईकोर्ट ने इंटरमीडियरीज को निर्देश दिया था कि IT Act, 2000 की धारा 79(3)(b) के तहत जारी नोटिस पर तेजी से कार्रवाई या जवाब दिया जाए। इसके साथ IT Rules के तहत तय समय-सीमा में कंटेंट हटाने की जिम्मेदारी का पालन सुनिश्चित करने की बात कही गई।
राज्य सरकार ने अपने हलफनामे में एक मजबूत रेगुलेटरी फ्रेमवर्क की जरूरत बताई थी। प्रस्तावित व्यवस्था में जांच एजेंसियों और डिजिटल सर्विस प्रोवाइडर्स के बीच तत्काल और प्रभावी समन्वय की बात थी।
हालांकि, इसका उद्देश्य वैध अभिव्यक्ति पर रोक लगाना नहीं बताया गया। फोकस इस बात पर था कि डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल गैरकानूनी कंटेंट तैयार करने या फैलाने के लिए न हो, जिससे कानून-व्यवस्था प्रभावित हो या लोकतांत्रिक संस्थाओं पर असर पड़े।
SAHYOG पोर्टल में 524 इंटरमीडियरीज जुड़े
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उसने IT Act की धारा 79(3)(b) और IT Rules के Rule 3(1)(d) के तहत सूचनाएं भेजने के लिए SAHYOG पोर्टल तैयार किया है। यह पोर्टल अक्टूबर 2024 से काम कर रहा है।
सरकार के मुताबिक, इसका उद्देश्य अधिकृत कानून प्रवर्तन एजेंसियों और इंटरमीडियरीज को एक साझा प्लेटफॉर्म पर लाना है। इससे गैरकानूनी तरीके से तैयार सिंथेटिक कंटेंट को हटाने की प्रक्रिया तेज करने और जरूरत पड़ने पर संबंधित यूजर की जानकारी, लॉग तथा न्यायिक प्रक्रिया के लिए जरूरी सबूत हासिल करने में मदद मिल सकती है।
सुप्रीम कोर्ट को यह भी बताया गया कि संबंधित तारीख तक 524 IT intermediaries SAHYOG पोर्टल से जुड़ चुके थे। इनमें Meta और Google भी शामिल थे।
हालांकि, X समेत कुछ अन्य प्लेटफॉर्म अभी पोर्टल से जुड़े नहीं थे या उनका पूर्ण एकीकरण नहीं हुआ था। केंद्र की ओर से यह भी बताया गया कि कुछ मामलों में धारा 79(3)(b) के तहत भेजे गए कंटेंट हटाने के नोटिस का समय पर जवाब नहीं मिलता।
अब सुप्रीम कोर्ट में होगी बड़ी तस्वीर पर सुनवाई
सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से वकील ज़ोहेब हुसैन ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने दूसरे हाईकोर्ट में चल रही इसी तरह की कार्यवाही पर भी रोक लगाई है और संबंधित मामले अब सुप्रीम कोर्ट के सामने लंबित हैं।
गुजरात मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की कार्यवाही पर रोक लगा दी है। इससे इस मुद्दे पर अलग-अलग अदालतों में अलग-अलग दिशा में चल रही कार्यवाही को एक स्तर पर लाने का रास्ता बनता दिख रहा है।
आम यूजर के लिए इसका महत्व सीधा है। आज सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति की तस्वीर, आवाज या वीडियो को AI की मदद से बदलकर वास्तविक जैसा दिखाया जा सकता है। ऐसे कंटेंट के वायरल होने की स्थिति में उसे हटाने की प्रक्रिया कितनी तेज होगी और प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी क्या होगी, यही इस पूरे विवाद का अहम हिस्सा है।
मामला अब Union of India v. Vikas Vijay Nair and Ors. के रूप में सुप्रीम कोर्ट के सामने है। आगे की सुनवाई में अदालत के सामने डिजिटल प्लेटफॉर्म, AI-जनरेटेड कंटेंट, यूजर की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और गैरकानूनी कंटेंट पर कार्रवाई के बीच संतुलन से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल रहेंगे।


