दिल्ली-NCR में महिलाओं और नाबालिगों के खिलाफ यौन अपराधों की हालिया घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए सुरक्षा व्यवस्था को लेकर बड़ा दखल दिया है। सोमवार, 28 सितंबर को जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने दिल्ली पुलिस और नागरिक प्रशासन को साफ निर्देश दिए कि सार्वजनिक जगहों को अपराध के लिए आसान निशाना बनने से रोकना होगा। इसके लिए संवेदनशील इलाकों की पहचान, जिलेवार वल्नरेबिलिटी मैपिंग, पुलिस पेट्रोलिंग, स्ट्रीट लाइट और CCTV की जांच जैसे कदम चार हफ्ते के भीतर पूरे करने होंगे।
कोर्ट का फोकस किसी एक घटना में किसी एक व्यक्ति की गलती तय करने पर नहीं है। पीठ ने कहा कि मामला उन व्यापक संस्थागत कमियों से जुड़ा है, जिन्हें समय रहते सुधारा जा सकता है। यानी सड़क, पार्क, ट्रांसपोर्ट हब या किसी सार्वजनिक जगह पर खराब रोशनी, निगरानी की कमी और कमजोर पेट्रोलिंग जैसी खामियों को केवल प्रशासनिक कमी मानकर छोड़ा नहीं जा सकता।
चार हफ्ते में संवेदनशील इलाकों की पूरी तस्वीर तैयार करनी होगी
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस कमिश्नर को हर पुलिस जिले में विशेष टीमें बनाने का निर्देश दिया है। इन टीमों की अगुवाई DSP स्तर से नीचे का अधिकारी नहीं करेगा। टीमें बाहरी इलाके, सुनसान जगहें, पार्क, बाजार, ट्रांसपोर्ट हब और शिक्षण संस्थानों के आसपास के इलाकों का सुरक्षा ऑडिट करेंगी।
इस ऑडिट में केवल पुलिस रिकॉर्ड ही आधार नहीं होगा। NCRB का डेटा, स्थानीय खुफिया जानकारी, पहले की घटनाएं और मौजूदा शिकायतों को भी शामिल किया जाएगा। अधिकारियों को उन जगहों की पहचान करनी होगी जहां खराब रोशनी, CCTV की कमी, अपर्याप्त गश्त, लावारिस इमारतों या कमजोर एंट्री-एग्जिट व्यवस्था के कारण अपराध का जोखिम बढ़ सकता है।
इसके बाद हर जिले का एक वल्नरेबिलिटी मैप तैयार किया जाएगा। इसे आसपास के पुलिस थानों के साथ साझा किया जाएगा, ताकि किसी इलाके में बार-बार होने वाली घटनाओं या आदतन अपराधियों से जुड़ी जानकारी सिर्फ एक थाने की सीमा में बंद न रहे।
पार्क, CCTV और स्ट्रीट लाइट पर अब सीधे नजर
कोर्ट ने सार्वजनिक पार्कों और चिन्हित संवेदनशील जगहों पर नियमित सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने को कहा है। खासतौर पर सुबह जल्दी और शाम के समय पेट्रोलिंग पर ध्यान देना होगा। हर संवेदनशील जगह के लिए एक जिम्मेदार अधिकारी तय किया जाएगा और उसके निरीक्षण की व्यवस्था भी बनाई जाएगी।
सार्वजनिक पार्कों और ऐसे इलाकों में ‘ब्लाइंड स्पॉट’ की पहचान के लिए तत्काल ऑडिट होगा। बंद पड़े CCTV कैमरे और खराब लाइटें ठीक करनी होंगी। जहां नागरिकों की शिकायत के आधार पर जरूरत सामने आए, वहां अतिरिक्त कैमरे और लाइट लगाने पर भी कार्रवाई करनी होगी।
यही प्रक्रिया मेट्रो स्टेशन, बस स्टॉप, बस टर्मिनल और रेलवे स्टेशन जैसी सार्वजनिक परिवहन सुविधाओं पर भी लागू होगी। खासकर उन स्थानों की जांच होगी जो पहले से चिन्हित संवेदनशील इलाकों के आसपास हैं।
कोर्ट ने नागरिक शिकायतों को भी सुरक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा माना है। सीएम जन सुनवाई पोर्टल जैसे मौजूदा प्लेटफॉर्म के जरिए अंधेरी जगहों, खराब लाइटिंग, CCTV की कमी और असुरक्षित एंट्री-एग्जिट पॉइंट की शिकायतों को रिकॉर्ड किया जाना चाहिए। शिकायत संबंधित अधिकारी तक पहुंचे और शिकायतकर्ता को कार्रवाई की स्थिति भी पता चल सके, यह व्यवस्था सुनिश्चित करने को कहा गया है।
पुलिस पेट्रोलिंग के साथ अवैध टिंटेड ग्लास पर भी सख्ती
सुप्रीम कोर्ट ने पेट्रोलिंग बढ़ाने के साथ मोबाइल चेक-पोस्ट और वाहनों की नियमित जांच के निर्देश दिए हैं। पुलिस को ‘अभिषेक गोयनका बनाम भारत संघ’ मामले में दिए गए निर्देशों को भी सख्ती से लागू करने को कहा गया है।
इसका मतलब है कि नियमों का उल्लंघन करने वाली गाड़ियों पर कार्रवाई होगी। अवैध काली या टिंटेड फिल्म हटाने और जरूरत पड़ने पर वाहन जब्त करने की कार्रवाई भी की जानी है।
कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल से भी चार हफ्ते के भीतर फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट और POCSO स्पेशल कोर्ट से जुड़ी विस्तृत जानकारी मांगी है। इसमें मौजूदा अदालतों की संख्या, लंबित मामलों का आंकड़ा, पिछले तीन वर्षों में मामलों के निपटारे की दर और मामलों के अंतिम निपटारे में लगने वाला औसत समय शामिल होगा।
हाईकोर्ट को इन घटनाओं से जुड़े मामलों को विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट में भेजने और सुनवाई में तेजी सुनिश्चित करने को कहा गया है। कोर्ट ने कोशिश करने को कहा है कि ट्रायल शुरू होने के एक साल के भीतर मामले का निपटारा हो।
हेल्पलाइन से लेकर ‘सेफ सिटी’ तक, हर सिस्टम की मांगी रिपोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने केवल पुलिसिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर तक मामला सीमित नहीं रखा है। अधिकारियों से जमीनी स्तर पर महिला सुरक्षा से जुड़े मौजूदा सिस्टम की स्थिति पर पूरी स्टेटस रिपोर्ट मांगी गई है।
इसमें यौन अपराधियों का राष्ट्रीय डेटाबेस, Sexual Offenders Investigation Tracking System यानी ITSSO, मिशन शक्ति, ERSS-112, महिला हेल्पलाइन 181, सेफ सिटी प्रोजेक्ट, पुलिस थानों में महिला हेल्प डेस्क और वन स्टॉप सेंटर शामिल हैं।
हर सिस्टम के बारे में अधिकारियों को बताना होगा कि वह वास्तव में काम कर रहा है या नहीं, उसका कवरेज कितना है, जिम्मेदार अधिकारी कौन है, पिछले तीन वर्षों में कितनी शिकायतें या मामले आए और औसत रिस्पॉन्स टाइम क्या रहा।
कोर्ट ने हेल्पलाइन और सहायता सेवाओं के बारे में जागरूकता बढ़ाने के निर्देश भी दिए हैं। स्कूल, कॉलेज, दूसरे शिक्षण संस्थान और रिहायशी इलाकों में नियमित जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करने को कहा गया है। जिला प्रशासन को मीडिया संस्थानों के साथ बैठक कर सुरक्षा उपायों और हेल्पलाइन नंबरों के प्रचार के लिए अखबारों में जगह और प्रसारण समय उपलब्ध कराने की दिशा में काम करने को कहा गया है।
साथ ही मीडिया को पीड़ितों की पहचान की सुरक्षा को लेकर जिम्मेदार और संवेदनशील रिपोर्टिंग की याद दिलाई गई। कोर्ट ने भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 72 और POCSO Act की धारा 23 का उल्लेख किया, जिनमें पीड़ितों की पहचान उजागर करने पर रोक से जुड़े प्रावधान हैं।
ये निर्देश आस्था कुंज पार्क में 17 वर्षीय लड़की के साथ कथित सामूहिक दुष्कर्म, स्वरूप नगर में एक किशोरी के साथ कथित सामूहिक दुष्कर्म और हत्या तथा ग्रेटर नोएडा से दिल्ली जा रही स्लीपर बस में नाबालिग लड़की के साथ कथित यौन उत्पीड़न की घटनाओं के संदर्भ में आए हैं।
पीठ ने साफ किया कि वह किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत गलती तय करने के बजाय उन व्यापक संस्थागत कमियों की जांच कर रही है, जिनसे ऐसी घटनाओं का जोखिम बढ़ सकता है।
इस मामले में दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव, दिल्ली पुलिस कमिश्नर और दिल्ली हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को नोटिस जारी किया गया है। सीनियर एडवोकेट लिज़ मैथ्यू को कोर्ट की सहायता के लिए एमिक्स क्यूरी नियुक्त किया गया है।
अब मामले की अगली सुनवाई 5 अक्टूबर 2026 को होगी।

