सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को लड़कियों की शिक्षा को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने साफ कहा कि सैनिटरी नैपकिन और अलग शौचालय न होने के कारण लड़कियों को पढ़ाई छोड़ने या घरेलू कामों तक सीमित रहने की जरूरत नहीं है। न्यायमूर्ति जेबी परदीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह अपने पिछले फैसलों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करे।
यह फैसला उन लाखों परिवारों के लिए बड़ी राहत की खबर है जहां बेटियां माहवारी के दिनों में स्कूल जाने से हिचकिचाती हैं। आम अभिभावक अब उम्मीद कर सकते हैं कि स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध होने से उनकी बेटियों की पढ़ाई निरंतर बनी रहेगी।
मुफ्त सैनिटरी नैपकिन और शौचालय अनिवार्य
30 जनवरी को दिए गए अपने ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया था कि छात्राओं को मुफ्त ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराए जाएं और स्कूलों में लिंग-विभेदित, साफ-सुथरे शौचालय बनाए जाएं।
सोमवार को अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अर्चना पाठक दवे से कोर्ट ने कहा कि अब यह केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है कि इस फैसले का पूरा लाभ सभी लड़कियों तक पहुंचे। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि लड़कियों को केवल इन सुविधाओं के अभाव में शिक्षा नहीं छोड़नी चाहिए और न ही घर पर बैठकर घरेलू कामों तक सीमित रहना चाहिए।
स्कूलों पर सख्ती, मान्यता रद्द होने का खतरा
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि अगर कोई स्कूल पानी, साबुन, शौचालय और सैनिटरी पैड जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराता है तो उसकी मान्यता तक रद्द की जा सकती है।
यह कदम उन स्कूलों के लिए चेतावनी है जो अब तक इन मुद्दों को गंभीरता से नहीं ले रहे थे। माहवारी के दौरान उचित स्वच्छता की कमी के कारण कई लड़कियां स्कूल जाना बंद कर देती हैं। बार-बार कक्षाएं छूटने से उनकी पढ़ाई प्रभावित होती है, आत्मविश्वास कम होता है और अंत में कई छात्राएं पढ़ाई बीच में ही छोड़ देती हैं।
लड़कियों के भविष्य को मिलेगा नया बल
इस फैसले से देशभर के सरकारी और निजी स्कूलों में लड़कियों के लिए माहवारी प्रबंधन की सुविधाएं बेहतर होने की उम्मीद बढ़ गई है। कई स्कूलों में पहले से ही पैड की व्यवस्था शुरू हो चुकी है, लेकिन अब यह हर जगह अनिवार्य हो जाएगा।
आम परिवारों की बेटियां अब बिना शर्मिंदगी और तनाव के स्कूल जा सकेंगी। शिक्षा का अधिकार सिर्फ किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि सुरक्षित और सम्मानजनक माहौल भी प्रदान करना शामिल है। सुप्रीम कोर्ट का यह रुख लैंगिक समानता और शिक्षा के अधिकार को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम है।
सरकार और स्कूल प्रशासन को अब इस दिशा में तेजी से काम करना होगा ताकि कोई भी लड़की सुविधाओं की कमी के कारण अपनी पढ़ाई से वंचित न रहे। यह फैसला न सिर्फ लड़कियों के व्यक्तिगत विकास में मदद करेगा, बल्कि पूरे समाज को सशक्त बनाएगा।


