सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात में शराब तस्करी के आरोप में जब्त वाहनों को लेकर अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ किया कि गुजरात प्रोहिबिशन एक्ट, 1949 की धारा 98(2) ऐसी गाड़ी को ट्रायल पूरा होने तक मालिक को अंतरिम तौर पर सौंपने पर हर स्थिति में पूर्ण रोक नहीं लगाती। बुधवार को जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की बेंच ने निचली अदालत और गुजरात हाईकोर्ट के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनमें शराब की बड़ी खेप मिलने के कारण एक अशोक लेलैंड ट्रक की अंतरिम कस्टडी देने से इनकार किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने ₹15 लाख की सिक्योरिटी और कुछ शर्तों के साथ ट्रक मालिक को गाड़ी सौंपने का निर्देश दिया।
यह फैसला खास इसलिए है क्योंकि कोर्ट ने एक तरफ प्रोहिबिशन कानून के तहत जब्ती की कार्रवाई को बरकरार रखा, तो दूसरी तरफ यह भी माना कि किसी वाहन को सालों तक पुलिस परिसर में खड़ा रखना अपने आप में समाधान नहीं है।
ट्रक में मिली थीं 8 हजार से ज्यादा शराब की बोतलें
मामला गुजरात के लुनावाड़ा इलाके का है। यह ट्रक मोडासा से वड़ोदरा की तरफ जा रहा था और रास्ते में लुनावाड़ा में इसे रोका गया। जांच के दौरान ड्राइवर प्रतिबंधित सामान के लिए जरूरी पास या परमिट नहीं दिखा सका।
तलाशी में ट्रक से IMFL की 8,064 बोतलें बरामद हुईं। इनकी कुल मात्रा करीब 22,532.253 लीटर बताई गई। बरामद शराब की कीमत लगभग ₹17.02 लाख थी। शराब को करीब ₹98.66 लाख मूल्य के खाने-पीने के सामान की खेप के बीच छिपाकर ले जाया जा रहा था।
इसके बाद गुजरात प्रोहिबिशन एक्ट की कई धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया। ड्राइवर समेत चार लोगों के खिलाफ चार्जशीट भी दाखिल कर दी गई।
ट्रक की मालिक कंपनी ने बाद में अंतरिम कस्टडी के लिए आवेदन किया। उसका कहना था कि वह ट्रांसपोर्ट कंपनी है और अपराध में उसकी कोई भूमिका नहीं है। मुकदमा पूरा होने में चार-पांच साल लग सकते हैं और ट्रक एक साल से ज्यादा समय से पुलिस स्टेशन में खड़ा है। ऐसे में वाहन लगातार खराब हो रहा है और कंपनी को आर्थिक नुकसान हो रहा है।
गुजरात सरकार ने क्यों किया विरोध?
गुजरात सरकार ने ट्रक छोड़ने का विरोध किया। सरकार का तर्क था कि प्रोहिबिशन एक्ट की धारा 98(2) के तहत जब्त शराब निर्धारित सीमा से ज्यादा हो तो वाहन को बॉन्ड या सिक्योरिटी पर छोड़ने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
इसी आधार पर लुनावाड़ा के चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने अंतरिम कस्टडी की मांग खारिज कर दी। महिसागर के सेशंस कोर्ट और बाद में गुजरात हाईकोर्ट ने भी इस फैसले को बरकरार रखा।
इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। यहां अदालत के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या धारा 98(2) को वाहन की अंतरिम कस्टडी पर पूरी तरह रोक लगाने वाले प्रावधान के तौर पर पढ़ा जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने धारा 98(2) को कैसे समझा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 98(2) की भाषा और कानून की पूरी व्यवस्था को साथ पढ़ना जरूरी है। अदालत ने अपने पुराने फैसले ‘खेंगरभाई लखाभाई डंभाला बनाम गुजरात राज्य’ का भी उल्लेख किया। इसमें इस प्रावधान के दूसरे हिस्से की भाषा को पूरी तरह स्पष्ट नहीं माना गया था।
बेंच ने कहा कि प्रोहिबिशन एक्ट की धारा 98 और 132 का अपना अलग क्षेत्र है, जबकि CrPC की धारा 451, जो अब BNSS की धारा 497 है, अदालत के सामने पेश की गई जब्त संपत्ति की अंतरिम कस्टडी से जुड़ी है।
यानी किसी वाहन की जब्ती हो जाने का मतलब यह नहीं है कि ट्रायल खत्म होने तक उसे हर हाल में पुलिस स्टेशन में ही रखा जाए। ट्रायल कोर्ट को परिस्थितियों को देखते हुए उचित आदेश देने की शक्ति है।
कोर्ट ने ‘सुंदरभाई अंबालाल देसाई बनाम गुजरात राज्य’ के फैसले का भी हवाला दिया। इसमें कहा गया था कि जब्त वाहन लंबे समय तक पुलिस स्टेशन या कोर्ट परिसर में पड़े रहने से खराब हो जाते हैं। इससे मालिक को नुकसान होता है और किसी को वास्तविक फायदा नहीं मिलता।
इसके अलावा ‘बसव्वा कॉम द्यमंगौडा पाटिल बनाम मैसूर राज्य’ और ‘जनरल इंश्योरेंस काउंसिल बनाम आंध्र प्रदेश राज्य’ जैसे मामलों का भी संदर्भ दिया गया। अदालत ने माना कि लंबे समय तक जब्त वाहनों को खड़ा रखने से उनके खराब होने के साथ चोरी या पुर्जे निकाले जाने का जोखिम भी रहता है।
₹15 लाख की सिक्योरिटी पर ट्रक मालिक को मिली राहत
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अंतरिम कस्टडी तय करते समय कई पहलुओं के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। इसमें वाहन मालिक का नुकसान, वाहन के लंबे समय तक बेकार पड़े रहने से होने वाली परेशानी, सबूत सुरक्षित रखने की जरूरत और निष्पक्ष ट्रायल—सभी को देखा जाना चाहिए।
अदालत ने माना कि इस मामले में चार्जशीट पहले ही दाखिल हो चुकी है। बरामदगी से जुड़े सबूत पंचनामा, फोटो और वीडियोग्राफी के जरिए सुरक्षित किए जा सकते हैं। ऐसे में ट्रक को अनिश्चित समय तक पुलिस स्टेशन में रखना उचित नहीं होगा।
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत और हाईकोर्ट के आदेश रद्द कर दिए और ट्रक की अंतरिम कस्टडी देने का निर्देश दिया।
हालांकि इसके साथ कई शर्तें भी लगाई गई हैं। ट्रक मालिक को ट्रायल कोर्ट की संतुष्टि के लिए ₹15 लाख की सिक्योरिटी और पर्सनल बॉन्ड देना होगा। जब भी जांच अधिकारी या ट्रायल कोर्ट वाहन पेश करने को कहेगा, उसे गाड़ी उपलब्ध करानी होगी। ट्रायल के दौरान ट्रक को बेचने या उस पर किसी तीसरे पक्ष का अधिकार बनाने की भी अनुमति नहीं होगी।
गाड़ी सौंपने से पहले मालिक के प्रतिनिधि और दो स्वतंत्र गवाहों की मौजूदगी में उसका विस्तृत पंचनामा तैयार किया जाएगा। वाहन की स्थिति को फोटो और वीडियो के जरिए रिकॉर्ड किया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने साथ ही स्पष्ट किया कि यह आदेश केवल वाहन की अंतरिम कस्टडी के सवाल तक सीमित है। इससे शराब बरामदगी के मामले में आरोपियों के खिलाफ चल रहे ट्रायल के गुण-दोष पर कोई असर नहीं पड़ेगा। मुकदमा कानून के मुताबिक स्वतंत्र रूप से आगे चलेगा।
Case Title: M/s ABC Express v State of Gujarat


