सुप्रीम कोर्ट ने 70 साल पुराने अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम 1956 को लेकर एक महत्वपूर्ण व्याख्या की है। कोर्ट ने साफ किया कि यह कानून वेश्यावृत्ति को पूरी तरह खत्म करने या उसमें शामिल महिलाओं को स्वतः अपराधी करार देने के लिए नहीं बना है। इसका मुख्य उद्देश्य व्यावसायिक शोषण, तस्करी और संगठित नेटवर्क पर रोक लगाना है। आम नागरिकों के लिए यह फैसला इसलिए अहम है क्योंकि यह महिलाओं के शोषण को रोकने के साथ-साथ कानून की सही समझ विकसित करता है, जो समाज में लंबे समय से चली आ रही बहस को नई दिशा दे सकता है।
कानून का असली मकसद क्या है?
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की दो सदस्यीय बेंच ने 298 पृष्ठों के विस्तृत फैसले में कहा कि Immoral Traffic Prevention Act 1956 का उद्देश्य वेश्यावृत्ति को संगठित व्यवसाय के रूप में चलाने और उससे जुड़े शोषण पर नियंत्रण रखना है।
कोर्ट ने जोर देकर कहा कि यह कानून उन लोगों के खिलाफ है जो इस गतिविधि से मुनाफा कमाते हैं — जैसे दलाल, तस्कर और व्यावसायिक शोषक। यह महिलाओं को दंडित करने का हथियार नहीं है। 20वीं सदी की शुरुआत में महिलाओं और लड़कियों की तस्करी एक बड़ी समस्या थी, इसी पृष्ठभूमि में कानून बना था।
वेश्यागृह की नई परिभाषा, अकेली महिला पर लागू नहीं
फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वेश्यागृह की परिभाषा से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर कोई महिला अकेले अपने घर में आजीविका के लिए वेश्यावृत्ति करती है, वहां कोई दूसरी महिला नहीं है और न ही कोई दलाल या बिचौलिए की भूमिका है, तो उस घर को कानून की नजर में वेश्यालय नहीं माना जाएगा।
कोर्ट ने कहा कि केवल इसलिए कि कोई महिला घर से अपनी जीविका चला रही है, उसे वेश्यागृह नहीं ठहराया जा सकता। यह व्याख्या कानून की सीमाओं को साफ करती है और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ शोषण की रोकथाम के बीच संतुलन बनाती है।
सार्वजनिक स्थानों पर सख्ती बरकरार
बेंच ने धारा 7 और 8 को विशेष अपवाद बताया। धारा 7 के तहत स्कूल, शैक्षणिक संस्थान या अधिसूचित क्षेत्रों के पास वेश्यावृत्ति दंडनीय है। धारा 8 सार्वजनिक स्थानों पर ग्राहकों को आकर्षित करने को अपराध मानती है।
इन प्रावधानों का मकसद सार्वजनिक शालीनता, सामाजिक व्यवस्था और आम लोगों की सुविधा बनाए रखना है। कोर्ट ने कहा कि कानून पूरी तरह वेश्यावृत्ति को अपराध घोषित नहीं करता, न ही इसे पूरी तरह अनियंत्रित छोड़ने की वकालत करता है। इसका फोकस शोषण और व्यावसायिक दोहन रोकने पर है।
समाज और कानून के लिए मायने
यह फैसला वेश्यावृत्ति से जुड़े पुराने सामाजिक नजरिए को चुनौती देता है। सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक संदर्भों का जिक्र करते हुए कहा कि कानून का नाम में ‘अनैतिक’ शब्द इसलिए शामिल किया गया क्योंकि समाज इस गतिविधि को उस समय अनैतिक मानता था।
आम पाठक के नजरिए से देखें तो यह फैसला महिलाओं के शोषण के खिलाफ मजबूत दीवार खड़ा करता है, लेकिन साथ ही निर्दोष महिलाओं को अनावश्यक उत्पीड़न से बचाता है। लंबे समय से चले आ रहे पुनर्वास कार्यक्रमों और कानूनी लड़ाइयों के बीच यह फैसला संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।
अब उम्मीद की जा रही है कि इस व्याख्या से पुलिस और प्रशासन कानून का इस्तेमाल ज्यादा सही और लक्षित तरीके से करेंगे। इससे समाज में महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान दोनों को मजबूती मिलेगी।


