सुप्रीम कोर्ट जज की अनोखी सलाह: वकीलों को ‘दीवार’ और ‘काला पत्थर’ देखने को क्यों कहा?

सुप्रीम कोर्ट जज की अनोखी सलाह: वकीलों को ‘दीवार’ और ‘काला पत्थर’ देखने को क्यों कहा?

देश की श्रम व्यवस्था में बड़े बदलावों के बीच सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जज जस्टिस संजय करोल का एक अलग ही संदेश चर्चा में है। उन्होंने न सिर्फ नए श्रम कानूनों को ऐतिहासिक कदम बताया, बल्कि वकीलों को हिंदी सिनेमा की कुछ क्लासिक फिल्में देखने की सलाह भी दी। उनका मानना है कि इन फिल्मों के जरिए मजदूर वर्ग के संघर्ष और वास्तविक समस्याओं को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है।

अंबेडकर जयंती के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए जस्टिस करोल ने श्रम सुधारों, सामाजिक न्याय और कानून की भूमिका पर विस्तार से अपनी बात रखी। यह कार्यक्रम सुप्रीम कोर्ट की इकाई अधिवक्ता परिषद द्वारा आयोजित किया गया था।

श्रम संहिताएं: व्यवस्था को सरल और प्रभावी बनाने की कोशिश

जस्टिस करोल ने केंद्र सरकार द्वारा लागू चार नई श्रम संहिताओं को भारत के लिए एक बड़ा सुधार बताया। उन्होंने कहा कि इन कानूनों का उद्देश्य बिखरी हुई श्रम व्यवस्था को एकीकृत करना और कामगारों के लिए बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

गौरतलब है कि नवंबर 2025 से लागू इन संहिताओं में 29 पुराने श्रम कानूनों को समाहित किया गया है। इसका मकसद नियमों को आसान बनाना, अनुपालन में सुधार करना और कामकाजी परिस्थितियों को बेहतर बनाना है।

उन्होंने यह भी कहा कि इन कानूनों की सफलता केवल कागजों पर नहीं, बल्कि उनके सही क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी। इसके लिए सरकार, उद्योग और कानूनी व्यवस्था सभी की जिम्मेदारी अहम होगी।

फिल्मों के जरिए समझें मजदूरों की असल कहानी

अपने संबोधन में जस्टिस करोल ने एक दिलचस्प उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि हिंदी सिनेमा ने लंबे समय तक मजदूरों और श्रमिकों की समस्याओं को सामने लाने का काम किया है।

उन्होंने ‘दो बीघा जमीन’ और ‘नया दौर’ जैसी फिल्मों का जिक्र किया, जो औद्योगिकीकरण और उसके प्रभाव को दर्शाती हैं। वहीं, ‘दीवार’ में ट्रेड यूनियन से जुड़े संघर्ष और ‘काला पत्थर’ में खदान मजदूरों की कठिन परिस्थितियों को दिखाया गया है।

जस्टिस करोल के अनुसार, इन फिल्मों को देखने से वकीलों को यह समझने में मदद मिलेगी कि कानून सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं है, बल्कि उसका सीधा संबंध आम लोगों के जीवन से है।

सिनेमा में बदला रुझान, श्रमिक मुद्दे पीछे

उन्होंने यह चिंता भी जताई कि हाल के वर्षों में फिल्मों का फोकस बदल गया है। अब कहानियां अधिकतर उपभोक्तावाद और बड़े आर्थिक वर्गों के इर्द-गिर्द घूमती हैं, जिससे मजदूर वर्ग की समस्याएं पर्दे से लगभग गायब हो गई हैं।

यह बदलाव समाज में प्राथमिकताओं के बदलते स्वरूप को भी दर्शाता है, जहां श्रमिक मुद्दे पहले जितनी प्रमुखता से सामने नहीं आ रहे।

युवा वकीलों से अपील और अंबेडकर को याद

जस्टिस करोल ने खास तौर पर युवा वकीलों से अपील की कि वे श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए सक्रिय भूमिका निभाएं। उनका कहना था कि कानून का असली उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों को न्याय दिलाना है।

डॉ. बी.आर. अंबेडकर को याद करते हुए उन्होंने कहा कि उनकी सोच जमीनी वास्तविकताओं पर आधारित थी। उन्होंने समाज के वंचित वर्गों की समस्याओं को समझकर उन्हें ठोस नीतियों में बदलने का काम किया।

जस्टिस करोल का यह संदेश केवल वकीलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आम समाज के लिए भी एक संकेत है कि विकास और न्याय के बीच संतुलन बनाए रखना कितना जरूरी है। कानून, सिनेमा और समाज—तीनों मिलकर ही एक बेहतर और न्यायपूर्ण व्यवस्था का निर्माण कर सकते हैं।