SIR पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी: “संशोधित Form-6 को हमने मंजूरी नहीं दी”, अब जांच होगी बदलाव किसने किया?

SIR पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी: “संशोधित Form-6 को हमने मंजूरी नहीं दी”, अब जांच होगी बदलाव किसने किया?

सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर चल रहे विवाद में सोमवार को एक अहम टिप्पणी की है। अदालत ने साफ कहा कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे संशोधित Form-6 को सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी नहीं दी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान यह भी कहा कि अदालत रिकॉर्ड सामने आने के बाद यह देखना चाहेगी कि आखिर इस फॉर्म में बदलाव किसने किया और किस आधार पर किया गया।

मामला सिर्फ एक फॉर्म में बदलाव का नहीं है। यह सीधे नए मतदाताओं के पंजीकरण और मतदाता सूची की प्रक्रिया से जुड़ा है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने निर्वाचन आयोग के उस दावे पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसमें कहा गया था कि नए घोषणा-पत्र को अदालत की मंजूरी हासिल है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा, जिस पर बढ़ा विवाद?

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई की मांग वाली याचिका पर सुनवाई हुई। इसी दौरान संशोधित Form-6 का मुद्दा उठा।

CJI सूर्यकांत ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “किसी भी संशोधित फॉर्म-6 को हमने मंजूरी नहीं दी है।” उन्होंने आगे कहा कि जब रिकॉर्ड अदालत के सामने आएगा तो यह देखा जाएगा कि फॉर्म को किसने संशोधित किया।

यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि निर्वाचन आयोग ने 26 सितंबर को जारी अपने बयान में मई 2026 के बिहार SIR मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया था। आयोग की ओर से यह संकेत दिया गया था कि ऑनलाइन Form-6 के साथ जोड़ा गया नया घोषणा-पत्र अदालत की मंजूरी के बाद लागू किया गया है।

लेकिन सोमवार की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने स्थिति स्पष्ट कर दी। अदालत के मुताबिक बिहार SIR मामले में इस नए घोषणा-पत्र पर विचार ही नहीं हुआ था, क्योंकि इसे उस फैसले के बाद लागू किया गया था।

नए Form-6 में आखिर बदला क्या है?

विवाद की जड़ नए घोषणा-पत्र में है। संशोधित Form-6 के तहत नए मतदाता के तौर पर पंजीकरण कराने वाले व्यक्ति से अब यह जानकारी मांगी जा रही है कि क्या वह खुद या उसके माता-पिता पिछली SIR में दर्ज या मैप किए गए थे।

पहले इस्तेमाल होने वाले Form-6 में ऐसी जानकारी शामिल नहीं थी।

यही बदलाव अब सवालों के घेरे में है। खबर के मुताबिक दो चुनाव आयुक्तों ने भी इस बदलाव को लेकर आपत्ति जताई थी। उनका तर्क था कि पंजीकरण से जुड़े नियमों में केंद्र सरकार की ओर से संशोधन किए बिना इस तरह का बदलाव नहीं किया जा सकता।

आम मतदाता के लिए इसका महत्व इसलिए है क्योंकि Form-6 नए मतदाता के पंजीकरण की प्रक्रिया से जुड़ा है। इसमें किसी भी अतिरिक्त जानकारी को शामिल करने का सीधा संबंध इस बात से है कि आवेदन करने वाले व्यक्ति से किस तरह के दस्तावेज या घोषणाएं मांगी जाएंगी।

14 कथित फैसलों पर भी उठे सवाल

सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका का दायरा केवल Form-6 तक सीमित नहीं है। एडवोकेट शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की ओर से दाखिल याचिका में SIR से जुड़े 14 कथित एकतरफा फैसलों को रद्द करने की मांग की गई है।

याचिका में मामले की स्वतंत्र जांच की मांग भी की गई है। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में न्यायिक जांच आयोग या विशेष जांच दल गठित करने की मांग रखी गई है। प्रस्तावित जांच व्यवस्था में साइबर सुरक्षा और सूचना प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों को शामिल करने की बात भी कही गई है।

याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग और महानिदेशक (सूचना प्रौद्योगिकी) सीमा खन्ना समेत संबंधित अधिकारियों के खिलाफ जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 32 के तहत कार्रवाई की मांग की गई है।

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका की मांगों को बताया व्यापक

सुनवाई के दौरान पीठ ने याचिका में की गई मांगों के दायरे पर भी सवाल उठाया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी से कहा कि याचिका में रखी गई प्रार्थनाएं काफी व्यापक और “उलझी हुई” लगती हैं।

हालांकि, गुरुस्वामी ने अदालत के सामने कहा कि वह याचिका में की गई सभी मांगों पर कायम हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने इसके बाद याचिका पर नोटिस जारी कर दिया। साथ ही इसे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से संबंधित एक अन्य मामले के साथ जोड़ दिया गया।

इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ कर रही है।

फिलहाल सबसे अहम सवाल यही है कि संशोधित Form-6 में बदलाव आखिर किस स्तर पर किया गया और उसके पीछे वैधानिक आधार क्या था। सुप्रीम कोर्ट की अगली कार्रवाई रिकॉर्ड और संबंधित दस्तावेजों के सामने आने के बाद इस सवाल को और स्पष्ट कर सकती है। हालांकि, अदालत ने अभी यह तय नहीं किया है कि बदलाव गैरकानूनी था या इसके लिए कौन जिम्मेदार है। फिलहाल अदालत ने केवल इतना साफ किया है कि संशोधित Form-6 को उसकी ओर से मंजूरी नहीं दी गई थी।