ट्रेन हादसे के बाद अगर यात्री का टिकट नहीं मिल रहा है, तो सिर्फ इसी आधार पर उसके परिवार को रेलवे से मुआवजा देने से इनकार नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ किया है कि टिकट का न मिलना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि हादसे का शिकार व्यक्ति वैध यात्री नहीं था। खास तौर पर तब, जब परिवार दूसरे परिस्थितिजन्य सबूतों से यह बात साबित कर दे कि मृतक ट्रेन से यात्रा कर रहा था।
जस्टिस उज्ज्वल भुयान और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने मृतक यात्री के माता-पिता की अपील पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल की ओर से दिया गया मुआवजा खारिज कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिब्यूनल का फैसला बहाल करते हुए रेलवे को 30 दिनों के भीतर मुआवजे का भुगतान करने का निर्देश दिया।
ट्रेन में गिरकर घायल हुआ था यात्री, बाद में अस्पताल में मौत
मामला सितंबर 2017 का है। एक यात्री अहमदाबाद होते हुए सूरत की यात्रा कर रहा था। इसी दौरान ट्रेन में अचानक लगे झटके से वह गिर गया और गंभीर रूप से घायल हो गया। उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया। इलाज के दौरान अक्टूबर 2017 में उसकी मौत हो गई।
मौत के बाद उसके माता-पिता ने रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल के सामने मुआवजे के लिए दावा किया। ट्रिब्यूनल ने मामले को रेलवे एक्ट, 1989 के तहत ‘अनचाही घटना’ (untoward incident) माना और परिवार को 8 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया। इस रकम पर घटना की तारीख से 9 फीसदी सालाना ब्याज भी निर्धारित किया गया।
लेकिन रेलवे ने इस फैसले को चुनौती दी। मामला गुजरात हाईकोर्ट पहुंचा और वहां ट्रिब्यूनल का फैसला पलट दिया गया।
हाईकोर्ट ने टिकट और घटना के सबूत पर उठाए थे सवाल
गुजरात हाईकोर्ट का कहना था कि इस बात का पर्याप्त सबूत नहीं है कि मृतक ट्रेन से गिरा था। साथ ही उसके पास यात्रा का टिकट भी नहीं मिला था। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने घटना को रेलवे एक्ट के तहत मुआवजे योग्य ‘अनचाही घटना’ मानने से इनकार कर दिया।
इसके बाद मृतक के माता-पिता सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। उनकी ओर से सीनियर एडवोकेट नचिकेत जोशी ने दलील दी कि दावा याचिका में पहले ही स्पष्ट किया गया था कि मृतक का रेलवे टिकट और उसका कुछ निजी सामान हादसे के बाद खो गया था।
मृतक के पिता ने शपथ लेकर कहा था कि उनका बेटा यात्रा से पहले हमेशा टिकट खरीदता था। उन्होंने यह भी बताया कि हादसे में टिकट के साथ रुमाल, कलाई घड़ी, जेब में रखने वाली कंघी और करीब 800 से 900 रुपये नकद भी गायब हो गए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा- टिकट न मिलना अकेला निर्णायक सबूत नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में ‘यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रीना देवी’ के फैसले का हवाला दिया। कोर्ट ने दोहराया कि किसी यात्री के पास टिकट न मिलना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वह वास्तविक यात्री नहीं था।
कोर्ट के मुताबिक, दावेदार जरूरी तथ्यों को हलफनामे के जरिए सामने रखकर अपनी शुरुआती जिम्मेदारी पूरी कर सकता है। इसके बाद यह साबित करने की जिम्मेदारी रेलवे पर आ सकती है कि संबंधित व्यक्ति बिना वैध अधिकार के यात्रा कर रहा था।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि मृतक के पिता की गवाही ने शुरुआती जिम्मेदारी पूरी कर दी थी। वहीं, रेलवे की ओर से पेश किए गए दो गवाहों ने जिरह के दौरान माना कि उन्होंने मृतक की जेबों की तलाशी लेकर यह पता लगाने की कोशिश नहीं की थी कि टिकट मौजूद था या नहीं।
कोर्ट ने एक और महत्वपूर्ण परिस्थिति पर ध्यान दिया। मृतक हादसे के बाद एक महीने से ज्यादा समय तक अस्पताल में भर्ती रहा था। ऐसे में अदालत ने कहा कि यह उम्मीद करना मुश्किल है कि परिवार के पास टिकट सुरक्षित बचा रहता। कोर्ट ने माना कि इतने लंबे इलाज के दौरान टिकट के खो जाने की संभावना काफी अधिक थी।
रेलवे की जांच रिपोर्ट में सात महीने की देरी भी पड़ी भारी
सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे की जांच रिपोर्ट को लेकर भी सवाल उठाए। अदालत ने पाया कि 2003 के नियमों के तहत तैयार की जाने वाली जांच रिपोर्ट मई 2018 में बनी, जबकि हादसा सितंबर 2017 में हुआ था। यानी रिपोर्ट घटना के करीब सात महीने बाद तैयार की गई। इतना ही नहीं, रिपोर्ट दावा याचिका दाखिल होने के बाद तैयार हुई थी।
कोर्ट ने ‘कलंदी चरण साहू और अन्य बनाम जनरल मैनेजर, साउथ-ईस्ट सेंट्रल रेलवे, बिलासपुर’ मामले का हवाला देते हुए कहा कि ऐसी बिना वजह हुई देरी रेलवे के पक्ष में नहीं जाती। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने इस जांच रिपोर्ट को नजरअंदाज करने का फैसला किया।
रेलवे की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल कनकमेडाला रवींद्र कुमार ने हाईकोर्ट के फैसले का बचाव किया था। उनका कहना था कि कोई चश्मदीद गवाह सामने नहीं आया, टिकट नहीं मिला और स्टेशन सुपरिटेंडेंट के मुताबिक उस समय वहां कोई ट्रेन नहीं गुजरी थी। रेलवे ने इसे खुद को पहुंचाई गई चोट का मामला भी बताया।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने उपलब्ध परिस्थितियों को देखते हुए माना कि मृतक के वास्तविक यात्री होने की संभावना अधिक थी। कोर्ट ने रेलवे एक्ट की धारा 124-A के तहत सख्त दायित्व (strict liability) के सिद्धांत को भी लागू माना।
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया और रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल द्वारा दिए गए 8 लाख रुपये के मुआवजे को बहाल कर दिया। रेलवे को 30 दिनों के भीतर भुगतान करने का निर्देश दिया गया है।
यह फैसला Sukhabhai Nanjibhai Makwana & Anr v Union of India मामले में आया है और इसका सीधा संदेश यह है कि रेलवे मुआवजे के मामलों में केवल टिकट न मिलने को निर्णायक आधार मानकर दावे को खारिज नहीं किया जा सकता। मामले की पूरी परिस्थितियों और उपलब्ध सबूतों को भी देखा जाना जरूरी है।



