सुप्रीम कोर्ट ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी रेगुलेशन 2026’ पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। देश की सबसे बड़ी अदालत ने इन नियमों की भाषा पर गंभीर सवाल उठाए हैं। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने माना कि पहली नजर में ये नियम स्पष्ट नहीं लग रहे हैं और इनके दुरुपयोग की पूरी आशंका है। अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह विशेषज्ञों की एक कमेटी बनाकर इन नियमों की समीक्षा करे। जब तक नए नियमों में सुधार नहीं हो जाता, तब तक देशभर के उच्च शिक्षण संस्थानों में 2012 वाले पुराने नियम ही प्रभावी रहेंगे। इस फैसले से उन छात्रों को बड़ी राहत मिली है जो नए नियमों को भेदभावपूर्ण मान रहे थे।
क्या है विवाद और क्यों भड़के छात्र?
UGC के नए इक्विटी नियमों को लेकर पिछले कुछ समय से देशभर के शैक्षणिक हलकों में तीखी बहस छिड़ी हुई थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि नियमों की धारा 3C में दी गई परिभाषा जाति आधारित भेदभाव को बढ़ावा देती है और यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 19 का उल्लंघन है। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान यह मुद्दा उठा कि ये नियम समावेशी होने के बजाय समाज में खाई पैदा कर सकते हैं। न्यायमूर्ति बागची ने अमेरिका के पुराने ‘सेग्रिगेटेड स्कूलों’ का उदाहरण देते हुए चिंता जताई कि कहीं भारत में भी श्वेत-अश्वेत जैसी स्थिति न पैदा हो जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि शिक्षा के क्षेत्र में किसी भी तरह का प्रतिगामी रुख स्वीकार्य नहीं होगा।
कोर्ट की कमेटी से क्या निकलेगा समाधान?
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल से कहा गया कि वे प्रतिष्ठित व्यक्तियों की एक समिति गठित करने पर विचार करें। इस कमेटी का मुख्य काम नियमों की भाषा को सरल और स्पष्ट बनाना होगा ताकि किसी भी वर्ग के छात्र के साथ अन्याय न हो। कोर्ट में यह भी दलील दी गई कि नए नियमों में सामान्य वर्ग के छात्रों के हितों की अनदेखी की गई है। एक वकील ने कोर्ट को बताया कि यदि सामान्य वर्ग का कोई छात्र रैगिंग या भेदभाव का शिकार होता है, तो नए नियमों में उसके लिए कोई स्पष्ट उपचार नहीं दिखता। इन्ही विसंगतियों को दूर करने के लिए अब विशेषज्ञों की राय ली जाएगी।
19 मार्च को होगी अगली बड़ी सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च को करेगा। तब तक केंद्र सरकार को नियमों में संशोधन और कमेटी की रिपोर्ट पर अपना पक्ष रखना होगा। अदालत ने यह भी साफ कर दिया है कि वह समानता के अधिकार की कसौटी पर इन नियमों को परखेगी। फिलहाल, पुराने नियमों की वापसी से कॉलेजों में चल रही अनिश्चितता पर विराम लग गया है। छात्रों और अभिभावकों के लिए यह खबर इसलिए अहम है क्योंकि कॉलेज प्रशासन अब पुराने ढर्रे पर ही काम करेगा, जिससे किसी भी आकस्मिक बदलाव का डर खत्म हो गया है।



