उमर खालिद ने फिर खटखटाया सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा, दिल्ली दंगा UAPA केस में मांगी जमानत, एक साल की रोक खत्म होने का दिया हवाला

उमर खालिद ने फिर खटखटाया सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा, दिल्ली दंगा UAPA केस में मांगी जमानत, एक साल की रोक खत्म होने का दिया हवाला

2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े कथित बड़ी साजिश के मामले में जेल में बंद JNU के पूर्व छात्र उमर खालिद ने एक बार फिर जमानत के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। दिल्ली हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद अब उन्होंने शीर्ष अदालत में याचिका दाखिल की है। खालिद ने अपनी नई याचिका में दलील दी है कि जमानत मांगने पर लगी एक साल की रोक जल्द खत्म होने वाली है। साथ ही, अभियोजन पक्ष की ओर से संरक्षित गवाहों से पूछताछ की प्रक्रिया भी तय समय में पूरी होती नहीं दिख रही है। ऐसे में लंबे समय से जेल में बंद रहने और मुकदमे की सुनवाई में देरी को आधार बनाकर उन्होंने जमानत की मांग की है। इस मामले में अब सुप्रीम कोर्ट का अगला रुख अहम होगा, क्योंकि इससे UAPA जैसे सख्त कानून के तहत लंबे समय तक जेल में रहने और त्वरित सुनवाई के अधिकार से जुड़े सवाल भी जुड़े हैं।

जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की थी जमानत, एक साल की लगाई थी रोक

उमर खालिद की जमानत याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 5 जनवरी 2026 को सुनवाई की थी। उस समय जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने उन्हें और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया था।

अदालत ने अपने फैसले में दोनों को कथित बड़ी साजिश का वैचारिक संचालक बताया था। हालांकि, इसी मामले में गुलफिशा फातिमा समेत पांच अन्य आरोपियों को जमानत दे दी गई थी। कोर्ट ने कहा था कि सभी आरोपियों की कथित भूमिका एक जैसी नहीं है। इसलिए उनकी जमानत याचिकाओं पर अलग-अलग तरीके से विचार करना जरूरी है।

जमानत खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम के लिए एक साल की रोक भी लगाई थी। अदालत ने स्पष्ट किया था कि वे संरक्षित गवाहों से पूछताछ पूरी होने के बाद या आदेश पारित होने के एक साल बाद, दोनों में से जो भी स्थिति पहले आए, उसके आधार पर दोबारा जमानत मांग सकते हैं।

खालिद ने अब इसी शर्त को अपनी नई याचिका का प्रमुख आधार बनाया है।

दिल्ली हाईकोर्ट से भी नहीं मिली राहत, अब सुप्रीम कोर्ट में नई दलील

उमर खालिद ने इससे पहले दिल्ली हाईकोर्ट में भी जमानत की मांग की थी। लेकिन 30 सितंबर को जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस दिनेश भट्ट की खंडपीठ ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी।

हाईकोर्ट ने कहा था कि वह सुप्रीम कोर्ट के पहले से दिए गए आदेश में बदलाव नहीं कर सकता।

अब सुप्रीम कोर्ट में दाखिल नई याचिका में खालिद ने दलील दी है कि मामले में अभी तक आरोप तय नहीं हुए हैं। अभियोजन पक्ष संरक्षित गवाहों से पूछताछ की प्रक्रिया भी पूरी नहीं कर पाया है।

उनका कहना है कि 5 जनवरी 2027 तक यह प्रक्रिया पूरी होने की संभावना नहीं दिखती। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेश में दी गई ‘जो भी पहले हो’ वाली शर्त के तहत उन्हें दोबारा जमानत मांगने का अधिकार मिलना चाहिए।

खालिद ने यह भी कहा है कि वह लंबे समय से जेल में हैं और निकट भविष्य में मुकदमे की सुनवाई पूरी होने की उम्मीद नहीं है। उनके मुताबिक, यह स्थिति संविधान के तहत मिलने वाले त्वरित सुनवाई के अधिकार से जुड़ा गंभीर सवाल खड़ा करती है।

UAPA में जमानत को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी सामने आया मतभेद

इस मामले में जमानत का सवाल केवल उमर खालिद तक सीमित नहीं है। UAPA के तहत लंबे समय तक जेल में रहने वाले आरोपियों को राहत देने के कानूनी आधार पर सुप्रीम कोर्ट की अलग-अलग पीठों के बीच भी मतभेद सामने आए हैं।

खालिद ने अपनी याचिका में जस्टिस अरविंद कुमार के 22 मई के आदेश का भी उल्लेख किया है। इस आदेश में UAPA के तहत जमानत से जुड़े कानूनी सवालों को बड़ी पीठ के पास भेजा गया था।

विवाद की मुख्य वजह ‘के.ए. नजीब’ फैसले की व्याख्या है। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि यदि किसी आरोपी को लंबे समय तक जेल में रखा जाता है और मुकदमा जल्द पूरा होने की संभावना नहीं है, तो कुछ परिस्थितियों में UAPA के तहत जमानत पर लगी सख्त पाबंदियों के बावजूद राहत दी जा सकती है।

यह कानूनी बहस तब और महत्वपूर्ण हो गई, जब जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने ‘सैयद इफ्तिखार अंद्राबी’ मामले में गुलफिशा फातिमा के जमानत फैसले पर सवाल उठाए थे।

पीठ ने टिप्पणी की थी कि गुलफिशा फातिमा के मामले में UAPA के तहत जमानत को लेकर काफी संकीर्ण दृष्टिकोण अपनाया गया, जिससे के.ए. नजीब फैसले के सिद्धांतों का प्रभाव कम हो सकता है।

इन्हीं कानूनी सवालों को देखते हुए जस्टिस अरविंद कुमार की पीठ ने मामला बड़ी बेंच को भेज दिया था। इसी दौरान सह-आरोपी तस्लीम अहमद और खालिद सैफी को छह महीने की अंतरिम जमानत भी दी गई थी।

अदालत ने कहा था कि आरोपियों ने लंबा समय जेल में बिताया है और मुकदमा जल्द खत्म होने की संभावना नहीं है। केवल इसलिए कि कानून का एक महत्वपूर्ण सवाल अभी सुलझना बाकी है, आरोपियों को लगातार जेल में नहीं रखा जा सकता। हालांकि, यह राहत मामले के गुण-दोष पर कोई राय दिए बिना और सख्त शर्तों के साथ दी गई थी।

2020 के दिल्ली दंगों की FIR 59 में कई आरोपी, अब फैसले पर नजर

यह पूरा मामला 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़ी FIR नंबर 59 का है। इसकी जांच दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल कर रही है। मामले में भारतीय दंड संहिता, 1860 और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA के तहत कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

इस मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम के अलावा ताहिर हुसैन, खालिद सैफी, इशरत जहां, मीरान हैदर, गुलफिशा फातिमा, शिफा-उर-रहमान, आसिफ इकबाल तन्हा, शादाब अहमद, तस्लीम अहमद, सलीम मलिक, मोहम्मद सलीम खान, अतहर खान, सफूरा जरगर, फैजान खान और नताशा नरवाल भी आरोपी हैं।

फिलहाल उमर खालिद की नई याचिका पर सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलने का इंतजार है। इस सुनवाई का महत्व इसलिए भी है, क्योंकि इसमें लंबे समय तक हिरासत, मुकदमे में देरी और UAPA के तहत जमानत के कानूनी सिद्धांतों पर विचार हो सकता है।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने या न मिलने पर अभी कोई निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। अदालत का अगला फैसला ही तय करेगा कि खालिद को इस मामले में राहत मिलती है या उन्हें फिलहाल जेल में ही रहना होगा।