पश्चिम बंगाल की राजनीति में भारी उथल-पुथल मच गई है। सत्ता गंवाने के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) में बगावत का सिलसिला तेज हो गया है। पार्टी के 59 बागी विधायकों ने बुधवार को विधानसभा स्पीकर के चैंबर में पहुंचकर नया गुट बनाने और मुख्य विपक्षी दल का दर्जा देने की मांग कर दी है। यह घटनाक्रम महाराष्ट्र में शिवसेना-एनसीपी वाले फूट के मॉडल की याद दिला रहा है और राज्य की राजनीति को नया मोड़ दे सकता है।
बागी गुट का बड़ा दावा: ‘नई टीएमसी’ का गठन
शुभेंदु अधिकारी की अगुवाई वाली बीजेपी सरकार बनने के बाद TMC में बिखराव साफ नजर आने लगा था। पार्टी से निष्कासित नेता ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में 59 विधायकों ने स्पीकर के सामने अपना पक्ष रखा। उन्होंने ‘नई टीएमसी’ बनाने का ऐलान किया और इसकी जानकारी देते हुए हस्ताक्षरित पत्र भी सौंपा।
ये विधायक अब खुद को मूल पार्टी से अलग मानते हुए मुख्य विपक्षी दल के रूप में मान्यता चाहते हैं। इस कदम से पूरे राज्य में सियासी हलचल तेज हो गई है। आम नागरिकों के बीच सवाल उठने लगा है कि क्या यह विभाजन TMC को और कमजोर कर देगा या फिर नई राजनीतिक समीकरण बनेंगे।
दलबदल कानून का गणित: 59 विधायकों की मजबूत स्थिति
TMC के पास विधानसभा में कुल 80 विधायक हैं। दलबदल विरोधी कानून (10वीं अनुसूची) के अनुसार, अयोग्यता से बचने के लिए किसी गुट को कम से कम दो-तिहाई यानी 54 विधायकों का समर्थन चाहिए। बागी गुट के पास 59 विधायक होने के कारण वे इस कानूनी शर्त को पूरा कर रहे हैं।
इससे उन्हें न सिर्फ अयोग्य ठहराए जाने से बचाव मिलता है, बल्कि पार्टी के चुनाव चिन्ह पर भी दावा करने का रास्ता खुल सकता है। आम पाठक के लिए यह समझना जरूरी है कि यह कानूनी प्रावधान राजनीतिक दलों में अस्थिरता को कुछ हद तक रोकने के लिए बनाया गया था, लेकिन आज यह खुद बड़े विभाजनों का आधार बन रहा है।
स्पीकर की भूमिका और आगे की प्रक्रिया
दलबदल के मामलों में विधानसभा स्पीकर की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत स्पीकर को अयोग्यता तय करने का अधिकार है। वे शिकायत मिलने पर सुनवाई करते हैं और फैसला लेते हैं।
91वें संविधान संशोधन के अनुसार, अगर दो-तिहाई सदस्य किसी अन्य दल में विलय करते हैं तो उसे वैध माना जा सकता है। हालांकि, अंतिम फैसला स्पीकर पर ही निर्भर करता है। सुप्रीम कोर्ट के किहोतो होलोहान मामले (1992) के फैसले के मुताबिक, स्पीकर इस मामले में न्यायाधिकरण की तरह काम करते हैं और उनका फैसला अदालत में चुनौती दिया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने सलाह दी है कि ऐसे मामलों में तीन महीने के अंदर फैसला लिया जाए। इस दौरान स्पीकर संबंधित सदस्यों को नोटिस जारी कर अपना पक्ष रखने का मौका देते हैं।
बंगाल की राजनीति पर क्या पड़ेगा असर?
यह बगावत TMC के लिए बड़ी चुनौती है। सत्ता से बाहर होने के बाद पार्टी में पहले से ही असंतोष था, जो अब खुलकर सामने आ गया है। अगर बागी गुट को मुख्य विपक्ष का दर्जा मिल गया तो विपक्षी राजनीति में नया संतुलन बन सकता है।
दूसरी ओर, सत्तारूढ़ बीजेपी के लिए यह स्थिति फायदेमंद साबित हो सकती है। आम बंगालवासियों के लिए यह घटनाक्रम इसलिए अहम है क्योंकि राजनीतिक स्थिरता सीधे विकास, रोजगार और कानून-व्यवस्था से जुड़ी है। बार-बार होने वाले ऐसे विभाजन से राजनीतिक विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं।
TMC के इस आंतरिक संकट का नतीजा आने वाले दिनों में साफ दिखेगा। चाहे जो भी फैसला हो, यह तय है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति अब पहले जैसी नहीं रहेगी।


