पश्चिम बंगाल के बाद अब पड़ोसी नेपाल की राजनीति में हलचल मची हुई है। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह को भारत के साथ लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवाद में ब्रिटेन से उम्मीद थी, लेकिन लंदन ने साफ मना कर दिया। यह फैसला बालेन शाह के लिए बड़ा झटका साबित हुआ है, खासकर जब उनके अपने देश में भी विपक्ष उन्हें घेर रहा है। आम भारतीयों और नेपाल के नागरिकों के लिए यह घटनाक्रम दिखाता है कि सीमा से जुड़े मुद्दे कितने संवेदनशील होते हैं और इनका सीधा असर दोनों देशों के रिश्तों और स्थानीय जीवन पर पड़ता है।
ब्रिटेन से अपील, लेकिन मिला साफ इनकार
कुछ दिन पहले नेपाल के प्रधानमंत्री कार्यालय के मुख्य सलाहकार कुमार ब्यांजंकर ने काठमांडू में ब्रिटिश राजदूत रॉब फेन से मुलाकात की। उन्होंने 1816 की सुगौली संधि का हवाला देते हुए ब्रिटेन से मदद मांगी। सलाहकार का तर्क था कि उस समय ब्रिटेन (तत्कालीन ईस्ट इंडिया कंपनी) भी पक्षकार था, इसलिए सीमा विवाद सुलझाने में लंदन को भूमिका निभानी चाहिए।
खासकर कालापानी जैसे क्षेत्रों को लेकर नेपाल का दावा है कि सुगौली संधि के तहत उसकी कुछ जमीन भारत को चली गई। लेकिन ब्रिटिश राजदूत ने स्पष्ट जवाब दिया कि यह पूरी तरह द्विपक्षीय मामला है। ब्रिटेन इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा। इस जवाब के बाद सलाहकार खाली हाथ लौट गए।
यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नेपाल सरकार ने पहली बार किसी तीसरे देश से औपचारिक मदद मांगी थी। ब्रिटेन के इनकार से बालेन शाह की रणनीति को झटका लगा है।
संसद में बयान ने बढ़ाई मुश्किलें
रविवार 31 मई को नेपाल की संसद में प्रधानमंत्री बालेन शाह ने एक विवादित बयान दिया। उन्होंने कहा कि जब वह प्रधानमंत्री बने तो उन्हें पता चला कि नेपाल ने भी भारत की कुछ जमीनों पर कब्जा कर रखा है। इस बयान पर विपक्षी कम्युनिस्ट पार्टियों ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्हें राष्ट्रद्रोह तक का आरोप लगाया गया।
नेपाल के विदेश मंत्रालय ने भी अलग बयान जारी कर कहा कि प्रधानमंत्री का बयान गलत है। मंत्रालय के अनुसार कुछ नेपाली किसान भारत में खेती करते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि नेपाल ने भारतीय जमीन पर कब्जा किया है। विपक्षी दलों ने बालेन शाह से माफी की मांग भी की है।
द्विपक्षीय रिश्तों पर क्या असर पड़ेगा?
सुगौली संधि को लेकर लंबे समय से दोनों देशों के बीच मतभेद चल रहा है। नेपाल इसे लेकर अपनी दलीलें रखता रहा है, जबकि भारत इसे द्विपक्षीय बातचीत से सुलझाने पर जोर देता है। ब्रिटेन के इनकार से अब नेपाल की स्थिति कमजोर हुई है।
आम पाठक के नजरिए से देखें तो ऐसे विवाद सीमा क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करते हैं। व्यापार, आवागमन और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर इसका असर पड़ता है। दोनों देशों के बीच अच्छे संबंध रहें तो सीमा पर शांति बनी रहती है और विकास के काम आसान होते हैं।
बालेन शाह वर्तमान में घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों मोर्चों पर दबाव में दिख रहे हैं। ब्रिटेन जैसे पुराने सहयोगी देश के इनकार के बाद अब नेपाल को भारत के साथ सीधे बातचीत का रास्ता अपनाना पड़ सकता है।
यह पूरा मामला दर्शाता है कि अंतरराष्ट्रीय विवादों में बाहरी हस्तक्षेप की गुंजाइश कम होती जा रही है। अब देखना होगा कि बालेन शाह इस चुनौती से कैसे निपटते हैं और दोनों पड़ोसी देश इस मुद्दे को किस तरह आगे बढ़ाते हैं।


