पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर जारी उथल-पुथल ने एक बार फिर भारतीय राजनीति में दलों के टूटने, विलय और दलबदल कानून को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। जब किसी पार्टी के विधायक या सांसद अपने मूल दल से अलग होने लगते हैं, तो सवाल सिर्फ राजनीति का नहीं रह जाता, बल्कि संविधान और कानून का भी बन जाता है। ऐसे मामलों में यह तय करना बेहद महत्वपूर्ण होता है कि अलग हुए जनप्रतिनिधियों की सदस्यता बचेगी या जाएगी, नया गुट वैध माना जाएगा या नहीं और विधानसभा अध्यक्ष या लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका क्या होगी। आइए समझते हैं कि भारत में राजनीतिक दलों के टूटने और विलय से जुड़े नियम वास्तव में क्या कहते हैं।
पार्टी टूटना और दलबदल एक ही बात नहीं
आम बोलचाल में जब किसी पार्टी के नेता, विधायक या सांसद अलग होकर नया समूह बना लेते हैं तो उसे पार्टी टूटना कहा जाता है। लेकिन कानूनी रूप से हर राजनीतिक बगावत को वैध विभाजन नहीं माना जाता।
भारत में ऐसे मामलों को संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत देखा जाता है, जिसे आमतौर पर एंटी-डिफेक्शन लॉ (दलबदल विरोधी कानून) कहा जाता है। इस कानून का मकसद राजनीतिक स्थिरता बनाए रखना और निर्वाचित प्रतिनिधियों को बार-बार दल बदलने से रोकना है।
यदि कोई सांसद या विधायक स्वेच्छा से अपनी पार्टी छोड़ देता है या पार्टी के आधिकारिक निर्देश के खिलाफ मतदान करता है, तो उसकी सदस्यता खतरे में पड़ सकती है।
पहले था स्प्लिट का नियम, अब नहीं
एक समय ऐसा था जब कानून में स्प्लिट (विभाजन) की व्यवस्था मौजूद थी। यदि किसी दल के कम से कम एक-तिहाई विधायक या सांसद अलग हो जाते थे, तो इसे वैध विभाजन माना जा सकता था और उन्हें दलबदल कानून से सुरक्षा मिल जाती थी।
लेकिन समय के साथ इस प्रावधान का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग होने लगा। इसी वजह से वर्ष 2003 में संविधान संशोधन के जरिए स्प्लिट की व्यवस्था समाप्त कर दी गई।
आज केवल यह कह देना कि पार्टी का एक हिस्सा अलग हो गया है, पर्याप्त नहीं माना जाता। अब कानूनी सुरक्षा पाने के लिए दूसरी शर्तें पूरी करनी होती हैं।
दो-तिहाई संख्या क्यों बन जाती है सबसे अहम?
मौजूदा कानून में सबसे महत्वपूर्ण शब्द है मर्जर यानी विलय। यदि किसी राजनीतिक दल के कम से कम दो-तिहाई विधायक या सांसद किसी दूसरे दल में शामिल होने या विलय का फैसला करते हैं, तो उसे वैध माना जा सकता है।
उदाहरण के तौर पर यदि किसी पार्टी के 30 विधायक हैं, तो कम से कम 20 विधायकों का समर्थन आवश्यक होगा। यदि संख्या दो-तिहाई से कम रहती है, तो अलग हुए सदस्यों की सदस्यता पर खतरा पैदा हो सकता है।
इसी वजह से राजनीतिक संकट के समय संख्या बल सबसे बड़ा हथियार बन जाता है। दल अक्सर यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि उनके पास दो-तिहाई समर्थन मौजूद है।
स्पीकर और अदालत की भूमिका क्यों अहम होती है?
जब किसी विधायक या सांसद की सदस्यता को लेकर विवाद खड़ा होता है, तो मामला विधानसभा अध्यक्ष या लोकसभा अध्यक्ष के पास पहुंचता है। अध्यक्ष यह जांच करते हैं कि कितने सदस्य अलग हुए हैं, क्या दो-तिहाई संख्या पूरी हुई है और क्या विलय का दावा वैध है।
हालांकि अब अध्यक्ष का फैसला पूरी तरह अंतिम नहीं माना जाता। यदि किसी पक्ष को निर्णय पर आपत्ति होती है, तो वह हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है। पिछले कई राजनीतिक मामलों में अदालतों ने हस्तक्षेप भी किया है।
हाल के वर्षों में कई बड़े राजनीतिक घटनाक्रम
पिछले कुछ वर्षों में भारत की राजनीति में कई बड़े दलबदल और विभाजन देखने को मिले हैं। 2019 में कर्नाटक में विधायकों के इस्तीफों के बाद कांग्रेस-जेडीएस सरकार गिर गई। 2020 में मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ 22 विधायकों के अलग होने से कमलनाथ सरकार सत्ता से बाहर हो गई।
महाराष्ट्र में 2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना के विधायकों के अलग होने से उद्धव ठाकरे सरकार गिर गई। इसके बाद 2023 में अजित पवार के नेतृत्व में एनसीपी में भी बड़ा राजनीतिक विभाजन देखने को मिला।
इन घटनाओं ने साफ कर दिया कि भारतीय राजनीति में केवल राजनीतिक शक्ति ही नहीं, बल्कि संविधान की दसवीं अनुसूची और दलबदल कानून भी सत्ता के समीकरण तय करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं।
यही वजह है कि किसी भी राजनीतिक दल के भीतर उठने वाली बगावत केवल एक राजनीतिक खबर नहीं होती, बल्कि उसके पीछे संविधान, कानून, संख्या बल और न्यायिक प्रक्रिया का पूरा ढांचा काम करता है।



