अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते की चर्चाओं के बीच पश्चिम एशिया की राजनीति एक बार फिर गर्म हो गई है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो इन दिनों खाड़ी देशों के दौरे पर हैं, जहां उनकी बैठकों का सबसे अहम मुद्दा सुरक्षा नहीं बल्कि पैसा बन गया है। खाड़ी देशों के नेताओं ने अमेरिका से उन 300 अरब डॉलर के पैकेज और फ्रीज किए गए फंड्स को लेकर स्पष्ट जवाब मांगा है, जिन पर लंबे समय से चर्चा चल रही है।
दरअसल, ईरान के साथ किसी भी तरह की नई डील को लेकर खाड़ी देशों के मन में कई सवाल हैं। उन्हें आशंका है कि अगर ईरान को आर्थिक राहत दी गई या उसके फ्रीज किए गए फंड्स तक पहुंच आसान बनाई गई, तो क्षेत्रीय शक्ति संतुलन प्रभावित हो सकता है।
ईरान डील से क्यों बढ़ी खाड़ी देशों की बेचैनी?
खाड़ी देशों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि ईरान को मिलने वाली आर्थिक राहत का असर केवल उसकी अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं रहेगा। इन देशों का मानना है कि अतिरिक्त वित्तीय संसाधनों से ईरान क्षेत्र में अपनी रणनीतिक और राजनीतिक पकड़ मजबूत कर सकता है।
यही वजह है कि सऊदी अरब, यूएई, कतर और अन्य सहयोगी देशों ने अमेरिका से स्पष्ट जानकारी मांगी है कि प्रस्तावित आर्थिक पैकेज का स्वरूप क्या होगा और फ्रीज फंड्स के उपयोग पर क्या शर्तें लागू होंगी।
300 अरब डॉलर के पैकेज पर उठ रहे सवाल
सूत्रों के मुताबिक, खाड़ी देशों की बातचीत में बार-बार 300 अरब डॉलर के पैकेज का मुद्दा उठ रहा है। सहयोगी देशों का कहना है कि अगर क्षेत्रीय स्थिरता को बनाए रखना है तो उन्हें भी फैसलों की प्रक्रिया में भरोसे में लिया जाना चाहिए।
इन देशों को यह भी चिंता है कि अमेरिका और ईरान के बीच किसी बड़े समझौते का आर्थिक और सुरक्षा प्रभाव पूरे मध्य पूर्व पर पड़ेगा। ऐसे में केवल द्विपक्षीय बातचीत पर्याप्त नहीं मानी जा रही।
मार्को रुबियो के सामने सबसे बड़ी चुनौती
मार्को रुबियो के इस दौरे का मकसद केवल कूटनीतिक संवाद नहीं है, बल्कि सहयोगी देशों को भरोसा दिलाना भी है। अमेरिका की कोशिश है कि ईरान को लेकर चल रही बातचीत के बीच उसके पारंपरिक साझेदार असहज महसूस न करें।
विशेषज्ञों का मानना है कि वॉशिंगटन के लिए सबसे बड़ी चुनौती ईरान के साथ संभावित समझौते और खाड़ी देशों की सुरक्षा चिंताओं के बीच संतुलन बनाना है।
आगे क्या?
फिलहाल खाड़ी देशों की नजर इस बात पर है कि अमेरिका ईरान से जुड़े फंड्स, प्रतिबंधों और आर्थिक राहत के मुद्दे पर क्या अंतिम रुख अपनाता है। आने वाले दिनों में होने वाली बैठकों से यह साफ हो सकता है कि अमेरिका अपने क्षेत्रीय सहयोगियों की चिंताओं को किस हद तक संबोधित करने को तैयार है।
मध्य पूर्व की राजनीति में यह मामला सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक और सुरक्षा दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

