उत्तर प्रदेश सरकार जल्द ही नई एग्रीगेटर पॉलिसी लागू करने की तैयारी में है। इस नीति का उद्देश्य ऐप आधारित कैब सेवाओं को अधिक पारदर्शी, सुरक्षित और जवाबदेह बनाना है। पॉलिसी का प्रस्ताव सरकार के पास भेजा जा चुका है और मंजूरी के बाद इसे लागू किया जाएगा।
नई नीति के तहत कैब कंपनियों की मनमानी पर रोक लगाने के लिए किराया निर्धारण, ड्राइवरों की जवाबदेही, यात्री सुरक्षा और बीमा जैसी कई महत्वपूर्ण व्यवस्थाएं की गई हैं। खासतौर पर पीक ऑवर में अत्यधिक किराया वसूले जाने की शिकायतों को ध्यान में रखते हुए नए नियम तैयार किए गए हैं।
नई एग्रीगेटर पॉलिसी में क्या-क्या बदलेगा?
- पीक ऑवर में बेस फेयर से 50% से अधिक किराया नहीं बढ़ाया जा सकेगा।
- न्यूनतम किराया बेस फेयर का कम से कम 50% रखना होगा।
- ड्राइवर द्वारा बुकिंग रद्द करने पर संबंधित ट्रिप का शुल्क ड्राइवर को वहन करना होगा।
- यात्री द्वारा बुकिंग रद्द करने पर 100 रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकेगा।
- तय समय पर कैब लेकर नहीं पहुंचने वाले ड्राइवर पर न्यूनतम 100 रुपये का जुर्माना लगेगा।
- सभी एग्रीगेटर कंपनियों को राज्य सरकार से लाइसेंस लेना अनिवार्य होगा।
- ड्राइवरों को 5 लाख रुपये का स्वास्थ्य बीमा और 10 लाख रुपये का टर्म इंश्योरेंस उपलब्ध कराया जाएगा।
- ड्यूटी के दौरान नशे की हालत में पाए जाने पर जीरो टॉलरेंस नीति के तहत कार्रवाई होगी।
यात्रियों की सुरक्षा पर विशेष जोर
नई नीति लागू होने के बाद सभी ऐप आधारित कैब में GPS, पैनिक बटन, फर्स्ट एड किट और अग्निशमन यंत्र लगाना अनिवार्य होगा। किसी भी आपात स्थिति में पैनिक बटन दबाते ही पुलिस और संबंधित कंपनी को तत्काल सूचना मिलेगी, जबकि GPS की मदद से वाहन की लोकेशन ट्रैक की जा सकेगी।
कंपनियों के लिए भी होंगे नए नियम
नई पॉलिसी के तहत एग्रीगेटर कंपनियों को राज्य सरकार से लाइसेंस लेना होगा। लाइसेंस शुल्क 5 लाख रुपये, नवीनीकरण शुल्क 25 हजार रुपयेतथा 50 लाख रुपये तक की सिक्योरिटी डिपॉजिट का प्रावधान किया गया है। नियमों के उल्लंघन पर जुर्माना लगाने के साथ लाइसेंस रद्द करने की कार्रवाई भी की जा सकेगी।
सरकार और ड्राइवरों को क्या होगा फायदा?
नई नीति से यात्रियों को अधिक सुरक्षित और पारदर्शी सेवा मिलने की उम्मीद है, वहीं ड्राइवरों को पहली बार स्वास्थ्य बीमा और टर्म इंश्योरेंस जैसी सामाजिक सुरक्षा मिलेगी। सरकार को भी ऐप आधारित परिवहन सेवाओं पर बेहतर निगरानी, टैक्स संग्रह और शिकायतों के प्रभावी निस्तारण में सुविधा होगी।
हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि नए नियमों के कारण कंपनियों की परिचालन लागत बढ़ सकती है, जिसका असर भविष्य में बेस फेयर या कमीशन मॉडल पर देखने को मिल सकता है।



