सुबह लड्डू तैयार, शाम तक बदला पूरा खेल! बांकीपुर में प्रशांत किशोर ने BJP के गढ़ में कैसे बनाई बढ़त?

सुबह लड्डू तैयार, शाम तक बदला पूरा खेल! बांकीपुर में प्रशांत किशोर ने BJP के गढ़ में कैसे बनाई बढ़त?

उत्तर प्रदेश नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति में सोमवार का दिन बेहद दिलचस्प रहा। पटना की हाई-प्रोफाइल बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में शुरुआती रुझानों ने ऐसा सियासी संदेश दिया, जिसकी उम्मीद शायद भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने भी नहीं की थी। सुबह से भाजपा समर्थक जीत का भरोसा जताते हुए लड्डू तैयार कर रहे थे, लेकिन जैसे-जैसे मतगणना आगे बढ़ी, तस्वीर बदलती चली गई। कई राउंड की गिनती के बाद जन सुराज पार्टी (JSP) के संस्थापक प्रशांत किशोर ने भाजपा उम्मीदवार नीरज कुमार सिन्हा पर मजबूत बढ़त बना ली और जीत की ओर बढ़ते दिखाई दिए।

यह उपचुनाव इसलिए भी खास माना जा रहा है क्योंकि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के राज्यसभा सदस्य बनने के बाद यह सीट खाली हुई थी। लंबे समय से भाजपा का मजबूत गढ़ मानी जाने वाली बांकीपुर सीट पर पहली बार खुद प्रशांत किशोर चुनाव मैदान में उतरे और उन्होंने मुकाबले को पूरी तरह बदल दिया।

कम मतदान ने बदली चुनाव की दिशा?

बांकीपुर उपचुनाव में महज 34.30 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया, जो काफी कम माना जा रहा है। मतदान के तुरंत बाद ही राजनीतिक विश्लेषकों के बीच चर्चा शुरू हो गई थी कि कम वोटिंग का असर चुनाव परिणाम पर पड़ सकता है।

ऐसा माना गया कि भाजपा का परंपरागत वोटर बड़ी संख्या में मतदान केंद्र तक नहीं पहुंचा। यदि ऐसा हुआ, तो इसका सीधा असर पार्टी के प्रदर्शन पर पड़ना तय था। मतगणना के शुरुआती रुझानों ने भी इसी संभावना को मजबूत किया। कम मतदान ने मुकाबले को पूरी तरह खुला बना दिया और विपक्ष को अवसर मिला।

खुद मैदान में उतरने का फैसला बना गेमचेंजर

प्रशांत किशोर के लिए यह चुनाव केवल एक सीट का चुनाव नहीं था, बल्कि उनकी राजनीतिक विश्वसनीयता की भी परीक्षा थी। 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में जन सुराज पार्टी राज्य की अधिकांश सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद कोई सीट नहीं जीत सकी थी।

इस बार उन्होंने किसी दूसरे उम्मीदवार पर दांव लगाने के बजाय खुद बांकीपुर से चुनाव लड़ने का फैसला किया। इस रणनीति का असर चुनाव प्रचार में भी दिखाई दिया। उन्होंने लगातार स्थानीय लोगों से संवाद किया और अपने अभियान को पूरी तरह क्षेत्रीय मुद्दों पर केंद्रित रखा।

दूसरी ओर भाजपा ने नीरज कुमार सिन्हा को उम्मीदवार बनाया। हालांकि यह सीट वर्षों तक नितिन नवीन के पास रही, लेकिन इस बार स्थानीय समीकरण पहले जैसे नहीं दिखे।

जातीय समीकरण और स्थानीय रणनीति ने बदला माहौल

बांकीपुर के चुनाव में सामाजिक समीकरण भी अहम भूमिका निभाते नजर आए। राजनीतिक चर्चा के अनुसार भाजपा का पारंपरिक समर्थन पूरी तरह एकजुट नहीं दिखा। वहीं दूसरी ओर कुछ अन्य सवर्ण और पिछड़े वर्ग के मतदाताओं का झुकाव प्रशांत किशोर की ओर देखने को मिला।

साथ ही ऐसी चर्चा भी रही कि राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के पारंपरिक मुस्लिम-यादव वोट बैंक का एक हिस्सा भी इस चुनाव में प्रशांत किशोर के पक्ष में गया। माना गया कि कुछ मतदाताओं ने उन्हें भाजपा के खिलाफ अधिक मजबूत चुनौती देने वाला उम्मीदवार समझा।

हालांकि इन राजनीतिक आकलनों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन चुनावी रुझानों के बाद यह चर्चा लगातार तेज हो गई है।

स्थानीय मुद्दों पर फोकस, BJP को मिली कड़ी चुनौती

चुनाव प्रचार के दौरान प्रशांत किशोर ने जाति और धर्म की बहस से दूरी बनाए रखी। उन्होंने शिक्षा, रोजगार, नागरिक सुविधाओं और स्थानीय विकास जैसे मुद्दों को अपनी प्राथमिकता बनाया। इसके लिए उन्होंने बड़े रोड शो की बजाय मोहल्ला बैठकों और सीधे जनसंवाद पर ज्यादा जोर दिया।

वहीं भाजपा ने नितिन नवीन और बांकीपुर के लंबे राजनीतिक संबंधों को प्रमुखता से जनता के सामने रखा। लेकिन चुनावी मुकाबले में स्थानीय रणनीति और लगातार जनसंपर्क का असर ज्यादा दिखाई देता नजर आया।

अगर अंतिम नतीजे भी शुरुआती रुझानों के अनुरूप रहते हैं, तो यह परिणाम सिर्फ एक उपचुनाव की जीत नहीं माना जाएगा। इसे बिहार की राजनीति में जन सुराज पार्टी के लिए एक बड़ी राजनीतिक उपलब्धि और भाजपा के लिए आत्ममंथन का संकेत भी माना जा सकता है। अब सभी की निगाहें अंतिम परिणाम पर टिकी हैं, जो बिहार की आगामी राजनीति की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।