दतिया में BJP क्यों हारी? क्या नरोत्तम मिश्रा जिम्मेदार हैं या इसके पीछे थीं ये 5 बड़ी वजहें

दतिया में BJP क्यों हारी? क्या नरोत्तम मिश्रा जिम्मेदार हैं या इसके पीछे थीं ये 5 बड़ी वजहें

मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव का परिणाम भारतीय जनता पार्टी के लिए बड़ा झटका साबित हुआ। कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह ने बीजेपी प्रत्याशी आशुतोष तिवारी को हराकर सीट अपने नाम कर ली। मतगणना के दौरान ही कांग्रेस ने बढ़त बना ली थी और आखिर तक उसे बरकरार रखा। नतीजा सामने आने के बाद राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की होने लगी कि क्या पूर्व गृह मंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता नरोत्तम मिश्रा की नाराजगी या उनकी भूमिका पार्टी की हार की वजह बनी?

हालांकि उपलब्ध राजनीतिक घटनाक्रम और चुनावी परिस्थितियों पर नजर डालें तो तस्वीर इससे कहीं ज्यादा व्यापक दिखाई देती है। चुनाव के दौरान नरोत्तम मिश्रा लगातार पार्टी उम्मीदवार के साथ प्रचार करते नजर आए। उन्होंने सार्वजनिक मंचों से कार्यकर्ताओं से बीजेपी के पक्ष में मतदान की अपील भी की। ऐसे में हार का पूरा ठीकरा सिर्फ एक नेता पर फोड़ना राजनीतिक विश्लेषण को बेहद सरल बना देना होगा। इस चुनाव में कई ऐसे कारक रहे, जिन्होंने मिलकर मुकाबले का रुख बदल दिया।

चुनावी इतिहास बताता है, नरोत्तम मिश्रा की जीत का अंतर भी हमेशा बड़ा नहीं रहा

दतिया विधानसभा सीट 2008 के परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई। इसके बाद नरोत्तम मिश्रा ने लगातार तीन चुनाव जीते, लेकिन उनकी जीत का अंतर कभी बहुत बड़ा नहीं रहा।

2008 में उन्होंने बसपा के राजेंद्र भारती को करीब 11 हजार वोटों से हराया। 2013 में भी जीत का अंतर लगभग 11 हजार वोट रहा। जबकि 2018 में यह अंतर घटकर सिर्फ 2,656 वोट रह गया। इसके बाद 2023 के विधानसभा चुनाव में नरोत्तम मिश्रा खुद करीब 7,700 से अधिक वोटों से हार गए।

यानी दतिया की सीट लंबे समय से बेहद करीबी मुकाबलों वाली रही है। ऐसे में यह कहना कि केवल नरोत्तम मिश्रा के कारण उपचुनाव का परिणाम बदला, उपलब्ध चुनावी आंकड़ों से पूरी तरह मेल नहीं खाता।

राजेंद्र भारती की बगावत बनी बड़ा चुनावी फैक्टर

इस उपचुनाव में पूर्व कांग्रेस नेता राजेंद्र भारती का नाम भी लगातार चर्चा में रहा। कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह ने मतदान के बाद दावा किया कि भारती की गतिविधियों से पार्टी को नुकसान पहुंचाने की कोशिश हुई।

चुनाव परिणाम आने से पहले ही कांग्रेस ने राजेंद्र भारती को पार्टी से निलंबित कर दिया था। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भारती का अपना अलग जनाधार रहा है और उनके समर्थकों के वोटों का असर चुनावी समीकरण पर पड़ सकता है। ऐसे में यह फैक्टर भी परिणाम को प्रभावित करने वाले अहम कारणों में शामिल माना जा रहा है।

कांग्रेस उम्मीदवार का मजबूत स्थानीय आधार भी बना जीत की वजह

बीजेपी के सामने कांग्रेस ने ऐसे उम्मीदवार को मैदान में उतारा, जिसकी स्थानीय राजनीति में मजबूत पकड़ रही है। घनश्याम सिंह पहले भी दो बार विधायक रह चुके हैं और क्षेत्र में उनकी पहचान लंबे समय से बनी हुई है।

इसके अलावा 2023 के विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस इस सीट पर जीत दर्ज कर चुकी थी। यानी उपचुनाव में कांग्रेस पहले से मजबूत राजनीतिक जमीन पर चुनाव लड़ रही थी। इसका फायदा पार्टी को मतदान के दौरान मिला।

टिकट कटने के बावजूद नरोत्तम मिश्रा ने किया खुलकर प्रचार

टिकट नहीं मिलने के बाद यह माना जा रहा था कि पार्टी के भीतर असंतोष देखने को मिल सकता है। लेकिन नरोत्तम मिश्रा ने सार्वजनिक रूप से पार्टी उम्मीदवार का समर्थन किया।

उन्होंने कई चुनावी सभाओं में हिस्सा लिया और कार्यकर्ताओं से कहा कि टिकट वितरण को लेकर किसी तरह की नाराजगी नहीं रखनी चाहिए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उम्मीदवार के खिलाफ किसी तरह की व्यक्तिगत नाराजगी नहीं है। इससे यह संकेत मिला कि उन्होंने चुनाव में संगठन के साथ मिलकर काम करने की कोशिश की।

बीजेपी का प्रचार दमदार रहा, लेकिन वोटों में तब्दील नहीं हो सका

उपचुनाव में बीजेपी ने प्रचार के लिए पूरी ताकत झोंक दी थी। कई वरिष्ठ नेताओं ने चुनाव प्रचार किया और संगठन ने भी पूरी सक्रियता दिखाई। इसके बावजूद पार्टी प्रचार अभियान को मतदान में अपेक्षित बढ़त में नहीं बदल सकी।

दूसरी ओर कांग्रेस ने स्थानीय मुद्दों और अपने उम्मीदवार की क्षेत्रीय पकड़ के सहारे चुनावी बढ़त बनाए रखी। यही कारण रहा कि अंतिम नतीजे में कांग्रेस ने बढ़त कायम रखी और सीट जीतने में सफल रही।

दतिया उपचुनाव का परिणाम यह संकेत देता है कि किसी भी चुनाव में हार या जीत केवल एक नेता के प्रभाव से तय नहीं होती। स्थानीय समीकरण, उम्मीदवार की स्वीकार्यता, संगठन की स्थिति, बागी नेताओं की भूमिका और पिछले चुनावों का राजनीतिक आधार—ये सभी मिलकर परिणाम तय करते हैं। दतिया में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला। ऐसे में बीजेपी की हार को केवल नरोत्तम मिश्रा से जोड़कर देखना पूरे चुनावी परिदृश्य की अधूरी तस्वीर पेश करेगा।