‘मैं इस पद के लायक हूं या नहीं…’ विधानसभा में भावुक हुए स्पीकर सतीश महाना, हंगामे के बीच दिया बड़ा संकेत

‘मैं इस पद के लायक हूं या नहीं…’ विधानसभा में भावुक हुए स्पीकर सतीश महाना, हंगामे के बीच दिया बड़ा संकेत

उत्तर प्रदेश विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान बुधवार को एक ऐसा क्षण आया जिसने पूरे सदन का माहौल बदल दिया। लगातार कई दिनों से जारी हंगामे और राजनीतिक टकराव के बीच विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना भावुक हो गए। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि यह उनके राजनीतिक जीवन का अंतिम विधानसभा सत्र है और अब वे सार्वजनिक जीवन के आखिरी दौर में हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी कहा कि वह इस बात पर विचार करेंगे कि क्या वह विधानसभा अध्यक्ष के पद पर बने रहने के योग्य हैं या नहीं। उनके इस बयान के बाद सदन में कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया और सत्ता पक्ष व विपक्ष दोनों के सदस्य उनकी बात गंभीरता से सुनते नजर आए।

लगातार हंगामे के बीच स्पीकर की भावुक अपील

मानसून सत्र के पहले दिन से ही समाजवादी पार्टी राम मंदिर से जुड़े चंदे और चढ़ावे के कथित गड़बड़ी के मुद्दे को लेकर सरकार को घेर रही है। विपक्ष लगातार सदन के भीतर और बाहर प्रदर्शन कर रहा है और इस विषय पर विस्तृत चर्चा की मांग कर रहा है। इसी बीच बुधवार को कार्यवाही शुरू होते ही विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना ने पिछले दिनों हुए घटनाक्रम का उल्लेख किया।

उन्होंने कहा कि पिछले चार वर्षों से उनकी कोशिश रही है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा की कार्यवाही गरिमा और अनुशासन के साथ चले, ताकि पूरे देश के सामने विधानसभा की सकारात्मक तस्वीर पेश हो। लेकिन हाल के घटनाक्रमों ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से आहत किया है। उन्होंने सभी दलों से आग्रह किया कि लोकतंत्र की सर्वोच्च संस्थाओं की मर्यादा बनाए रखना सभी जनप्रतिनिधियों की साझा जिम्मेदारी है।

‘अगर किसी को ठेस पहुंची हो तो मैं क्षमा चाहता हूं’

अपने संबोधन में सतीश महाना ने विनम्रता दिखाते हुए कहा कि यदि उनके किसी निर्णय या व्यवहार से किसी भी सदस्य को ठेस पहुंची हो तो वह उसके लिए क्षमा चाहते हैं। उन्होंने कहा कि सदन का संचालन करते समय उनका उद्देश्य हमेशा निष्पक्ष रहना और सभी पक्षों को बराबर अवसर देना रहा है।

उन्होंने दोहराया कि यह उनके राजनीतिक जीवन का अंतिम विधानसभा सत्र है। इसलिए वह चाहते हैं कि इस सत्र की पहचान हंगामे से नहीं, बल्कि स्वस्थ लोकतांत्रिक संवाद से हो। उन्होंने विधायकों से अपील की कि वे राजनीतिक मतभेद अपनी जगह रखें, लेकिन सदन की गरिमा हर परिस्थिति में बनाए रखें।

लोकतंत्र में विपक्ष भी जरूरी, सरकार की भी जिम्मेदारी

विधानसभा अध्यक्ष ने अपने संबोधन में लोकतंत्र की मूल भावना पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि विपक्ष का काम सरकार से सवाल पूछना है और सरकार का दायित्व उन सवालों का जवाब देना है। लोकतांत्रिक व्यवस्था इसी संतुलन पर चलती है।

उन्होंने कहा कि पहले भी विपक्षी सदस्य अपनी बात रखने के लिए वेल तक आते थे, लेकिन अपनी बात रखने के बाद वापस अपनी सीटों पर लौट जाते थे। उनका मानना है कि बहस और विरोध लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन सदन की कार्यवाही बाधित करना किसी भी पक्ष के हित में नहीं है।

महाना ने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री केवल किसी एक राजनीतिक दल के नेता नहीं होते, बल्कि पूरे प्रदेश के मुख्यमंत्री होते हैं। इसलिए उनके पद का सम्मान करना सभी सदस्यों का दायित्व है।

सोशल मीडिया पोस्ट पर भी जताई नाराजगी, पुरानी घटना का किया जिक्र

स्पीकर सतीश महाना ने विधानसभा की कार्यवाही के वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा किए जाने पर भी असंतोष जताया। उन्होंने कहा कि पहले ही स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि कार्यवाही के दौरान रिकॉर्डिंग या तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा न की जाएं, लेकिन इसके बावजूद ऐसा हुआ। उनके अनुसार यह सदन की गरिमा के अनुरूप नहीं है।

अपने संबोधन के दौरान उन्होंने एक पुरानी घटना का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जब अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे, तब भी विधानसभा में कुछ सदस्यों के व्यवहार से सदन की प्रतिष्ठा प्रभावित हुई थी। उस समय भी उन्होंने स्पष्ट कहा था कि किसी एक सदस्य का अनुचित आचरण पूरे सदन की छवि को नुकसान पहुंचाता है।

अपने संबोधन के अंत में उन्होंने सबसे भावुक टिप्पणी करते हुए कहा कि वह जल्द ही इस बात पर गंभीरता से विचार करेंगे कि क्या वह विधानसभा अध्यक्ष के इस महत्वपूर्ण पद के योग्य हैं या नहीं। उनके इस बयान ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा शुरू कर दी है। ऐसे समय में जब राम मंदिर से जुड़े मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने हैं, विधानसभा अध्यक्ष की यह भावुक अपील पूरे सत्र की सबसे चर्चित घटनाओं में शामिल हो गई है।