बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के एक आदेश पर उठे विवाद ने कुछ ही घंटों में नया मोड़ ले लिया। हैदराबाद की नेशनल एकेडमी ऑफ लीगल स्टडीज एंड रिसर्च (NALSAR) यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के 2026 बैच के छात्रों के नामांकन पर अस्थायी रोक लगाने वाला आदेश सोशल मीडिया पर भारी विरोध के बाद वापस ले लिया गया। आदेश वापस होने के बावजूद विवाद थमा नहीं। अब BCI के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा की कार्यशैली और फैसलों को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। इस मुद्दे पर CJP के सह-संयोजक और मुख्य प्रवक्ता सौरव दास ने सोशल मीडिया पर कई बयान जारी कर जवाबदेही की मांग की है।
इस पूरे घटनाक्रम ने कानून के छात्रों, वकीलों और सार्वजनिक संस्थाओं की जवाबदेही को लेकर नई बहस छेड़ दी है। विपक्षी नेताओं से लेकर छात्र संगठनों तक, कई पक्षों ने इस मामले पर अपनी-अपनी प्रतिक्रिया दी है।
NALSAR के आदेश से कैसे शुरू हुआ पूरा विवाद?
विवाद की शुरुआत तब हुई, जब BCI ने गुरुवार को एक आदेश जारी किया। इसमें कहा गया था कि NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के 2026 में स्नातक होने वाले छात्रों का एडवोकेट के रूप में नामांकन अगले आदेश तक नहीं किया जाएगा।
यह फैसला विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह से जुड़े विवाद के बीच आया। जानकारी के अनुसार, करीब 1,400 छात्रों में से लगभग 450 छात्रों ने एक अभियान चलाकर प्रस्तावित मुख्य अतिथि के रूप में CJI सूर्य कांत को आमंत्रित किए जाने का विरोध किया था।
इसी के साथ BCI ने उन लोगों की जानकारी भी मांगी थी, जो कथित रूप से इस अभियान में प्रमुख भूमिका निभा रहे थे। बाद में सोशल मीडिया पर इस आदेश का व्यापक विरोध शुरू हुआ और कुछ ही घंटों बाद परिषद ने अपना आदेश वापस ले लिया।
CJI की टिप्पणी के बाद छात्रों का विरोध बढ़ा
यह छात्र अभियान उस समय तेज हुआ, जब पिछले महीने दिल्ली में NEET विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी एक याचिका की सुनवाई के दौरान CJI सूर्य कांत की मौखिक टिप्पणी चर्चा का विषय बनी। उसी के बाद NALSAR के कुछ छात्रों ने दीक्षांत समारोह में उनके आमंत्रण का विरोध दर्ज कराया।
इस घटनाक्रम के बीच AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि छात्रों को इस तरह डराने-धमकाने जैसी कार्रवाई उचित नहीं मानी जा सकती।
BCI का आदेश वापस होने के बाद भी बहस का केंद्र अब परिषद की कार्यप्रणाली और उसके फैसलों पर आ गया है।
सौरव दास ने सोशल मीडिया पर उठाए कई सवाल
CJP के सह-संयोजक और मुख्य प्रवक्ता सौरव दास ने BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा को संबोधित करते हुए कई सोशल मीडिया पोस्ट किए। उन्होंने कहा कि NALSAR के छात्रों ने लोकतांत्रिक तरीके से अपना विरोध दर्ज कराया था और उनके अनुसार इस प्रक्रिया में छात्रों के अधिकारों का सम्मान होना चाहिए था।
दास ने यह भी मांग की कि BCI की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक फैसलों पर जवाबदेही तय होनी चाहिए। उन्होंने मनन कुमार मिश्रा के कार्यकाल, विभिन्न राज्य बार काउंसिलों से जुड़े मामलों और परिषद के प्रशासनिक निर्णयों को लेकर भी सवाल उठाए।
इन बयानों में उन्होंने यह दावा भी किया कि BCI के खर्चों को लेकर पारदर्शिता जरूरी है और बैठकों, सम्मेलनों तथा यात्रा संबंधी खर्चों का विस्तृत हिसाब सार्वजनिक किया जाना चाहिए। ये सभी आरोप और सवाल सौरव दास की ओर से सोशल मीडिया पर किए गए दावों के रूप में सामने आए हैं।
आदेश वापस, लेकिन जवाबदेही पर बहस जारी
BCI द्वारा आदेश वापस लेने की जानकारी सार्वजनिक होने के बाद सौरव दास ने इसे युवाओं की जीत बताते हुए कहा कि जवाबदेही की लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। उनका कहना है कि संस्थागत फैसलों की पारदर्शिता और जिम्मेदारी पर चर्चा जारी रहनी चाहिए।
फिलहाल उपलब्ध जानकारी के अनुसार, BCI ने विवादित आदेश वापस ले लिया है। वहीं इस मामले ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि पेशेवर नियामक संस्थाओं के फैसले, छात्र आंदोलनों और सार्वजनिक जवाबदेही के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि इस विवाद पर BCI की ओर से आगे कोई विस्तृत स्पष्टीकरण आता है या नहीं और कानून के छात्रों से जुड़े इस मुद्दे पर बहस किस दिशा में बढ़ती है।



