NALSAR यूनिवर्सिटी विवाद अब देश के दूसरे बड़े लॉ कैंपस तक पहुंच गया है। बेंगलुरु स्थित नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (NLSIU) के 2026 बैच के छात्रों और 120 से अधिक पूर्व छात्रों ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के खिलाफ तीखा बयान जारी किया है। उन्होंने NALSAR के छात्रों के खिलाफ जारी और बाद में वापस लिए गए BCI के आदेश को लेकर बिना शर्त माफी की मांग की है। साथ ही BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा के विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में शामिल होने पर भी आपत्ति जताई है।
स्वतंत्रता दिवस के मौके पर जारी इस बयान ने NALSAR विवाद को और व्यापक बना दिया है। छात्रों का कहना है कि आदेश वापस लेने से विवाद खत्म नहीं हो जाता, बल्कि यह सवाल बना रहता है कि एक वैधानिक संस्था छात्रों के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई शुरू कैसे कर सकती है।
NLSIU छात्रों ने उठाईं ये चार बड़ी मांगें
जारी बयान पर 128 पूर्व छात्रों, 165 स्नातक छात्रों और BALLB, LLB, LLM तथा MPP जैसे विभिन्न कार्यक्रमों के 409 मौजूदा छात्रों ने हस्ताक्षर किए हैं।
बयान में छात्रों ने चार प्रमुख मांगें रखी हैं। उन्होंने NALSAR के छात्रों और शिक्षकों से बिना शर्त माफी की मांग की। BCI चेयरमैन द्वारा आधिकारिक लेटरहेड के इस्तेमाल पर स्पष्टीकरण मांगा। मनन कुमार मिश्रा के NLSIU दीक्षांत समारोह में शामिल होने पर कड़ी आपत्ति जताई। साथ ही NALSAR के दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के तौर पर CJI सूर्य कांत के चयन पर पुनर्विचार का समर्थन किया और NLSIU के समारोह में उनके शामिल होने पर भी असहमति दर्ज कराई।
छात्रों का कहना है कि इन मांगों का मकसद केवल किसी व्यक्ति का विरोध करना नहीं, बल्कि संस्थागत जवाबदेही और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े सवाल उठाना है।
पूरा विवाद कैसे शुरू हुआ?
यह पूरा मामला तब शुरू हुआ, जब BCI ने 13 अगस्त 2026 को राज्य बार काउंसिलों को निर्देश दिया था कि NALSAR के 2026 बैच के छात्रों का वकील के रूप में नामांकन अगले आदेश तक न किया जाए।
यह आदेश उस समय आया, जब NALSAR के कुछ छात्रों ने दीक्षांत समारोह में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत को मुख्य अतिथि बनाए जाने का विरोध किया था। यह विरोध उनकी उस मौखिक टिप्पणी के बाद शुरू हुआ था, जो दिल्ली में छात्र प्रदर्शनों से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान चर्चा में आई थी।
हालांकि भारी विरोध के बाद BCI ने कुछ ही घंटों में अपना आदेश वापस ले लिया और बाद में NALSAR से जुड़े सभी प्रस्तावित कदम भी वापस लेने की घोषणा कर दी।
छात्रों का आरोप, BCI ने कानून से बाहर जाकर कदम उठाया
NLSIU के छात्रों ने अपने बयान में कहा कि BCI का यह कदम Advocates Act, 1961 की सीमाओं से बाहर था।
उनका कहना है कि कानून BCI को पेशेवर मानकों और कानूनी शिक्षा से जुड़े नियम बनाने का अधिकार देता है, लेकिन किसी योग्य व्यक्ति के नामांकन पर मनमाने ढंग से रोक लगाने का अधिकार नहीं देता।
बयान में धारा 24A का भी उल्लेख किया गया है। छात्रों का तर्क है कि इसमें अयोग्यता केवल कुछ विशेष परिस्थितियों, जैसे आपराधिक दोषसिद्धि, तक सीमित है। किसी न्यायिक अधिकारी के प्रति कथित सम्मान की कमी को नामांकन रोकने का आधार नहीं बनाया जा सकता।
छात्रों ने यह सवाल भी उठाया कि BCI चेयरमैन को इस तरह के आदेश अकेले जारी करने का अधिकार किस आधार पर मिला, जबकि कानून के अनुसार परिषद सामूहिक संरचना वाली संस्था है।
अभिव्यक्ति की आजादी और जवाबदेही पर जोर
बयान में छात्रों ने कहा कि NALSAR के छात्रों और शिक्षकों की पहचान अलग से करने का निर्देश उन्हें “विच-हंट” जैसा लगा।
उन्होंने इसे संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मिले अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिकूल असर डालने वाला कदम बताया।
बयान में रवींद्रनाथ टैगोर की प्रसिद्ध पंक्ति “Where the Mind is Without Fear” का भी उल्लेख किया गया। छात्रों ने कहा कि विश्वविद्यालयों में छात्रों और शिक्षकों को अपने विवेक और संवैधानिक मूल्यों के आधार पर बिना डर अपनी बात रखने का माहौल मिलना चाहिए।
इसके साथ ही बयान में यह भी आरोप लगाया गया कि BCI चेयरमैन ने पहले भी आधिकारिक मंचों से राजनीतिक टिप्पणियां की हैं। छात्रों का कहना है कि वैधानिक संस्थाओं की प्राथमिक जिम्मेदारी कानूनी शिक्षा और पेशेवर विकास को मजबूत करना है, न कि छात्रों की अभिव्यक्ति पर दबाव बनाना।
फिलहाल BCI अपना विवादित आदेश वापस ले चुकी है, लेकिन NLSIU छात्रों के इस नए बयान ने संस्थागत जवाबदेही, कानूनी शिक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर बहस को एक नया आयाम दे दिया है।


