SC/ST Act पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की बड़ी टिप्पणी: सिर्फ जाति का नाम लेना अपराध नहीं, अपमान की मंशा साबित होना भी जरूरी

SC/ST Act पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की बड़ी टिप्पणी: सिर्फ जाति का नाम लेना अपराध नहीं, अपमान की मंशा साबित होना भी जरूरी

अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (SC/ST) अधिनियम की व्याख्या करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि सिर्फ किसी व्यक्ति की जाति का नाम लेने मात्र से अपने आप अपराध नहीं बन जाता। SC/ST एक्ट के तहत अपराध तभी माना जाएगा, जब यह साबित हो कि जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल व्यक्ति को उसकी जाति के आधार पर अपमानित करने की स्पष्ट मंशा से किया गया था।

जस्टिस संतोष राय की पीठ ने बरेली की एक अदालत द्वारा जारी समन आदेश को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की। हाई कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को मुकदमे में बीच में आरोपी के रूप में शामिल करने के लिए केवल आरोप पर्याप्त नहीं होते, बल्कि उसके समर्थन में मजबूत और विश्वसनीय साक्ष्य भी होने चाहिए।

यह फैसला SC/ST एक्ट से जुड़े मामलों में कानून की सीमाओं और उसके सही इस्तेमाल को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला बरेली के इज्जतनगर थाना क्षेत्र से जुड़ा है, जहां दुष्कर्म और धमकी के आरोपों में एक एफआईआर दर्ज की गई थी। पुलिस जांच के बाद मुख्य आरोपी हिम्मत सिंह के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया गया, जबकि उसके पिता वेगराज सिंह और बड़े भाई दौलत सिंह को जांच के दौरान आरोपों से बाहर रखा गया था।

हालांकि ट्रायल के दौरान पीड़िता ने अदालत में बयान दिया कि दोनों ने उसके लिए एक जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल किया था। इस बयान के आधार पर ट्रायल कोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 358 के तहत दोनों को मुकदमे का सामना करने के लिए समन जारी कर दिया।

इसी आदेश को चुनौती देते हुए दोनों आरोपियों ने इलाहाबाद हाई कोर्ट का रुख किया।

कोर्ट ने क्यों रद्द किया समन?

हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद पाया कि पीड़िता के शुरुआती बयानों में दोनों अपीलकर्ताओं की ऐसी कोई स्पष्ट भूमिका सामने नहीं आई थी।

अदालत ने ध्यान दिलाया कि:

  • धारा 161 के तहत दर्ज बयान में उनके खिलाफ ऐसा आरोप नहीं था।

  • धारा 164 के बयान में भी उनकी कथित जातिसूचक टिप्पणी का स्पष्ट उल्लेख नहीं था।

  • जांच के दौरान भी उन्हें आरोपों से बाहर रखा गया था।

इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने उन्हें मुकदमे में शामिल करने का फैसला कर लिया। हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसा करने के लिए पर्याप्त और ठोस सामग्री उपलब्ध नहीं थी।

सिर्फ शब्द नहीं, मंशा भी साबित करनी होगी

फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा अदालत की वह टिप्पणी रही, जिसमें SC/ST एक्ट की कानूनी कसौटी को स्पष्ट किया गया।

हाई कोर्ट ने कहा कि किसी जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल अपने आप यह साबित नहीं करता कि आरोपी ने पीड़ित को उसकी जाति के कारण अपमानित करने की मंशा रखी थी।

अदालत के अनुसार, यह देखना जरूरी है कि कथित शब्द किस परिस्थिति में बोले गए, उनका उद्देश्य क्या था और क्या वास्तव में उनका इस्तेमाल जाति के आधार पर अपमानित करने के लिए किया गया था। यही तत्व SC/ST एक्ट के तहत अपराध तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी लिया सहारा

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के चर्चित हरदीप सिंह बनाम पंजाब सरकार मामले का भी उल्लेख किया।

उस फैसले में सर्वोच्च अदालत ने कहा था कि किसी ऐसे व्यक्ति को, जो पहले आरोपी नहीं है, मुकदमे के दौरान आरोपी के रूप में शामिल करने की शक्ति असाधारण है और इसका इस्तेमाल केवल दुर्लभ परिस्थितियों में किया जाना चाहिए।

हाई कोर्ट ने इसी सिद्धांत को लागू करते हुए कहा कि केवल प्रथम दृष्टया आरोप पर्याप्त नहीं हैं। किसी व्यक्ति को अतिरिक्त आरोपी बनाने के लिए मजबूत और भरोसेमंद साक्ष्य होना आवश्यक है।

इसी आधार पर अदालत ने वेगराज सिंह और दौलत सिंह के खिलाफ जारी समन आदेश को रद्द कर दिया। यह फैसला SC/ST एक्ट के मामलों में जांच, साक्ष्य और न्यायिक प्रक्रिया की अहम कसौटियों को स्पष्ट करने वाला माना जा रहा है।