राजस्थान हाईकोर्ट ने नई पीढ़ी के भविष्य से जुड़े कई अहम सवालों पर सरकारों से जवाब मांगा है। कोर्ट ने Gen Z, Gen Alpha और Gen Beta की शिक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और रोजगार की चुनौतियों को गंभीरता से लेते हुए पेपर लीक रोकने से लेकर AI के इस्तेमाल तक पर ठोस व्यवस्था तैयार करने को कहा है। अदालत ने केंद्र और राज्य सरकार से मौजूदा कदमों की स्टेटस रिपोर्ट और एक्शन प्लान दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामला अब सिर्फ परीक्षा व्यवस्था तक सीमित नहीं है। इसमें बच्चों की पढ़ाई, डिजिटल स्क्रीन टाइम, पोषण, रोजगार और बदलती तकनीक के बीच उनकी बुनियादी क्षमताओं को बचाए रखने जैसे मुद्दे भी शामिल हो गए हैं।
पेपर लीक से लेकर नौकरी तक, नई पीढ़ी के सामने कई चुनौतियां
जस्टिस अनूप कुमार ढांड की बेंच ने इस मामले पर स्वत: संज्ञान लेते हुए इसे जनहित याचिका के तौर पर आगे बढ़ाने का फैसला किया। कोर्ट ने कहा कि आज की पीढ़ियां आने वाले वर्षों में देश की जिम्मेदारी संभालेंगी। ऐसे में उनकी शिक्षा और कौशल की नींव मजबूत होना जरूरी है।
अदालत ने पेपर लीक को लेकर भी गंभीर चिंता जताई। लगातार होने वाली ऐसी घटनाएं छात्रों की मेहनत और भरोसे दोनों को प्रभावित करती हैं। कोर्ट के मुताबिक, Gen Z इस तरह की परिस्थितियों का सामना कर रही है और इसका असर उनके शैक्षणिक प्रदर्शन के साथ-साथ भविष्य के अवसरों पर भी पड़ सकता है।
इसी वजह से सरकारों को परीक्षा व्यवस्था में ऐसा फुल-प्रूफ सिस्टम तैयार करने की दिशा में कदम उठाने को कहा गया है, जिससे प्रश्नपत्र लीक जैसी घटनाओं को रोका जा सके।
AI जरूरी है, लेकिन बच्चों की सोच उसकी जगह नहीं ले सकती
हाईकोर्ट ने शिक्षा व्यवस्था में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल टेक्नोलॉजी को शामिल करने की जरूरत को भी स्वीकार किया। अदालत का मानना है कि दुनिया तेजी से तकनीक आधारित हो रही है। ऐसे में स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय नई तकनीकों से दूर नहीं रह सकते।
लेकिन कोर्ट ने इसके साथ एक महत्वपूर्ण चेतावनी भी दी। बच्चों को सिर्फ नई तकनीक का इस्तेमाल सिखाना पर्याप्त नहीं है। पढ़ना, लिखना, तर्क करना और स्वतंत्र रूप से सोचना जैसी बुनियादी क्षमताएं भी उतनी ही जरूरी हैं।
अदालत ने चिंता जताई कि AI पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता से मौलिक लेखन, विश्लेषण और स्वतंत्र सोच प्रभावित हो सकती है। इसी तरह हाथ से लिखने और किताब पढ़ने जैसी पारंपरिक क्षमताएं भी धीरे-धीरे कमजोर पड़ सकती हैं।
कोर्ट ने साफ किया कि AI को मानवीय बुद्धि का विकल्प नहीं, बल्कि एक उपयोगी टूल के रूप में देखा जाना चाहिए। शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक तकनीक और बुनियादी कौशल के बीच संतुलन बनाना होगा।
सरकारी स्कूलों की हालत और बच्चों का स्वास्थ्य भी एजेंडे में
अदालत ने सरकारी स्कूलों की मौजूदा स्थिति को लेकर भी चिंता जताई। बेंच ने कहा कि समाज के कमजोर वर्गों के बच्चों के लिए सरकारी स्कूल शिक्षा की बुनियादी नींव तैयार करते हैं। लेकिन कई जगह बुनियादी ढांचे, मेडिकल सुविधाओं, प्रशिक्षण और नई तकनीक तक पहुंच जैसी कमियां मौजूद हैं।
कोर्ट ने शिक्षा के अधिकार का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य की जिम्मेदारी है कि आर्थिक या सामाजिक स्थिति की परवाह किए बिना बच्चों को शिक्षा का अवसर मिले। इसके साथ शिक्षा में वैज्ञानिक सोच और आधुनिक तकनीक को शामिल करते हुए देश की सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत को भी संतुलित तरीके से आगे बढ़ाना जरूरी है।
बच्चों के बढ़ते स्क्रीन टाइम को लेकर भी अदालत ने चिंता जताई। लंबे समय तक स्क्रीन के सामने बैठे रहने का असर उनके मानसिक और शारीरिक विकास पर पड़ सकता है।
कोर्ट ने बच्चों के स्वास्थ्य, पोषण और सुरक्षित भोजन को भी जीवन के अधिकार से जोड़ते हुए कहा कि इन पहलुओं की अनदेखी नहीं की जा सकती। बेंच ने FSSAI की 2020 की गाइडलाइंस का हवाला देते हुए कहा कि बच्चों के लिए सुरक्षित भोजन और संतुलित आहार से जुड़े प्रावधान मौजूद हैं, लेकिन उनके प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए।
2047 के भारत की जिम्मेदारी इन्हीं पीढ़ियों के कंधों पर होगी
राजस्थान हाईकोर्ट ने इन सभी मुद्दों को अलग-अलग समस्याओं के तौर पर देखने के बजाय नई पीढ़ी के भविष्य से जुड़ी एक बड़ी तस्वीर के रूप में देखा है। Gen Z, Gen Alpha और Gen Beta के लिए शिक्षा व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जिसमें तकनीक भी हो और बुनियादी मानवीय क्षमताएं भी मजबूत रहें।
इसी व्यापक चिंता के आधार पर कोर्ट ने इस मामले को जनहित याचिका के रूप में दर्ज किया है। अलग-अलग पीढ़ियों की ओर से वकीलों की नियुक्ति भी की गई है। Gen Z की ओर से सीनियर एडवोकेट रवि भंसाली, सचिन आचार्य और विकास बालिया को नियुक्त किया गया है। Gen Alpha की ओर से पंकज शर्मा, प्रियंका बोराना, नमन महनोट और अविन छंगानी को जिम्मेदारी दी गई है। वहीं Gen Beta की ओर से अदिति मोड, अक्षिति सिंघवी, निधि सिंघवी और अभिलाषा बोरा को नियुक्त किया गया है।
अब केंद्र और राजस्थान सरकार को अदालत के सामने यह बताना होगा कि पेपर लीक, शिक्षा और रोजगार के बीच बढ़ती दूरी, मानसिक स्वास्थ्य, डिजिटल बर्नआउट, AI और बच्चों के स्वास्थ्य जैसे मुद्दों से निपटने के लिए क्या व्यवस्था की जा रही है।
मामले की असली अहमियत यही है कि अदालत ने शिक्षा को केवल परीक्षा और डिग्री तक सीमित नहीं माना। सवाल उस पूरी व्यवस्था का है, जो आने वाली पीढ़ियों को 2047 के भारत की जिम्मेदारी संभालने के लिए तैयार करेगी।

