पश्चिम बंगाल में SIR यानी Special Intensive Revision के तहत मतदाता सूची से हटाए गए नाम अब सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के केंद्र में हैं। मंगलवार को हुई सुनवाई में मामला उस मोड़ पर पहुंच गया, जहां यह सवाल उठा कि अगर बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए गए साबित होते हैं और इसका असर चुनावी नतीजों पर पड़ता है, तो क्या दोबारा चुनाव कराने का सवाल उठ सकता है? याचिकाकर्ता की ओर से पेश आंकड़ों के मुताबिक, अब तक ट्रिब्यूनल ने जिन करीब 83 हजार मामलों पर फैसला दिया है, उनमें लगभग 75 हजार मामलों में नाम हटाने को गलत माना गया है। यानी करीब 90 फीसदी मामलों में मतदाताओं के पक्ष में फैसला आया है।
सुप्रीम कोर्ट में उठा सबसे बड़ा सवाल- क्या फिर हो सकता है चुनाव?
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने चुनावी नतीजों पर SIR के संभावित असर का मुद्दा उठा। चीफ जस्टिस ने पूछा कि क्या सुप्रीम कोर्ट नए सिरे से चुनाव कराने का निर्देश दे सकता है। उन्होंने इस संभावना पर विचार की जरूरत बताई और याचिकाकर्ता से इस संबंध में आवेदन दाखिल करने को कहा।
पीठ में शामिल जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने एक उदाहरण देकर मामले की गंभीरता समझाई। उन्होंने कहा कि अगर किसी सीट पर जीत का अंतर 50 वोट है और SIR के दौरान 100 मतदाताओं के नाम काटे गए हैं, तो स्थिति महत्वपूर्ण हो जाती है। अगर ट्रिब्यूनल बाद में इनमें से 70 नामों को गलत तरीके से हटाया गया मानता है, तो चुनावी नतीजे पर सवाल खड़ा हो सकता है।
यानी अदालत के सामने सिर्फ मतदाता सूची का सवाल नहीं है। मुद्दा यह भी है कि अगर गलत तरीके से नाम हटने का चुनावी नतीजे पर वास्तविक असर पड़ा हो, तो उसके कानूनी समाधान का रास्ता क्या होगा।
83 हजार मामलों में 75 हजार नामों पर राहत का दावा
वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने सुनवाई के दौरान एक डेटा रिपोर्ट अदालत के सामने रखी। उनके मुताबिक, SIR से जुड़े अब तक करीब 83 हजार मामलों में ट्रिब्यूनल फैसला सुना चुका है। इनमें लगभग 75 हजार मामलों में नाम काटे जाने को गलत पाया गया।
यह आंकड़ा करीब 90 फीसदी बैठता है। हालांकि, इसे पूरे राज्य की तस्वीर मानने से पहले यह समझना जरूरी है कि SIR से जुड़े कुल मामलों की संख्या इससे कहीं ज्यादा है। वकील के मुताबिक, बंगाल में SIR से संबंधित करीब 38 लाख मामले दाखिल किए गए हैं। इनमें लगभग 31 लाख मामले उन लोगों की ओर से हैं, जिनके नाम मतदाता सूची से हटाए गए, जबकि करीब 7 लाख मामले नाम बचाने से जुड़े हैं।
अभी तक सिर्फ 83 हजार मामलों पर फैसला हुआ है। ऐसे में बाकी मामलों की सुनवाई और उसके नतीजे आगे की तस्वीर तय करने में अहम होंगे।
31 विधानसभा सीटों पर क्यों हो रही सबसे ज्यादा चर्चा?
मामले का राजनीतिक असर समझने के लिए चुनावी आंकड़े भी महत्वपूर्ण हैं। तृणमूल कांग्रेस के मुताबिक, विधानसभा चुनाव में बीजेपी को करीब 2.93 करोड़ वोट, जबकि TMC को करीब 2.60 करोड़ वोट मिले। यानी दोनों दलों के बीच वोटों का अंतर करीब 30 लाख रहा।
TMC सांसद और वरिष्ठ वकील कल्याण बनर्जी का दावा है कि राज्य की 31 विधानसभा सीटों पर जीत का अंतर SIR के तहत हटाए गए मतदाताओं की संख्या से कम है। उन्होंने बाली, हेमताबाद और सतगछिया जैसी सीटों का भी जिक्र किया।
TMC का आरोप है कि हटाए गए मतदाताओं में उसके समर्थकों की बड़ी संख्या थी। हालांकि, यह एक राजनीतिक दल का दावा है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है।
इससे पहले 23 अप्रैल की सुनवाई में भी जस्टिस बागची ने चुनावी नतीजों पर संभावित प्रभाव का उदाहरण देते हुए सवाल उठाया था कि अगर किसी सीट पर जीत का अंतर 2 फीसदी हो और 15 फीसदी मतदाता वोट न डाल पाएं, तो इसका क्या असर होगा।
क्या सुप्रीम कोर्ट खुद दोबारा चुनाव करा सकता है?
यह सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि चुनाव कराने की संवैधानिक जिम्मेदारी मुख्य रूप से निर्वाचन आयोग के पास है। संविधान का अनुच्छेद 324 चुनावों के संचालन की जिम्मेदारी चुनाव आयोग को देता है। वहीं किसी निर्वाचित राज्य सरकार को हटाने से जुड़ी प्रक्रिया अलग संवैधानिक प्रावधानों के तहत आती है।
दूसरी तरफ, सुप्रीम कोर्ट के पास अनुच्छेद 142 के तहत संपूर्ण न्याय करने की व्यापक शक्ति है। हालांकि, इस मामले में अदालत ने अभी दोबारा चुनाव कराने का कोई आदेश नहीं दिया है।
पश्चिम बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग ने मतदाता सूची के पुनरीक्षण के लिए SIR अभियान चलाया था। TMC ने आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया में उसके समर्थकों के नाम काटे गए। चुनाव परिणाम आने के बाद भी यह मुद्दा राजनीतिक विवाद का हिस्सा बना रहा।
2026 के चुनाव में बीजेपी ने 294 में से 207 सीटें जीतने का दावा किया गया है, जबकि TMC 80 सीटों पर रही। सरकार बनाने के लिए 148 सीटों की जरूरत होती है।
अब सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से संबंधित डेटा दाखिल करने को कहा है। आगे की सुनवाई में यही आंकड़े यह समझने में अहम होंगे कि SIR के तहत नाम हटाने का असर सिर्फ मतदाता सूची तक सीमित रहा या वास्तव में चुनावी नतीजों पर भी उसका कोई निर्णायक प्रभाव पड़ा।


