दिल्ली के 2020 दंगों से जुड़े बड़ी साजिश के मामले में शरजील इमाम और उमर खालिद की जमानत का रास्ता फिलहाल आसान होता नहीं दिख रहा है। दोनों की नई जमानत याचिकाओं का दिल्ली पुलिस ने दिल्ली हाईकोर्ट में जोरदार विरोध किया है। पुलिस का कहना है कि इन याचिकाओं के पीछे ऐसा कोई नया आधार नहीं है, जिससे पहले के फैसले पर दोबारा विचार किया जा सके। पुलिस ने इन याचिकाओं को कानूनी तौर पर गलत बताते हुए यह भी आरोप लगाया कि अदालत के सामने मौजूदा स्थिति को अलग तरीके से पेश करने की कोशिश की जा रही है।
तीसरी बार जमानत की कोशिश, हाईकोर्ट में पहुंचा मामला
उमर खालिद और शरजील इमाम दोनों पर 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों की कथित बड़ी साजिश से जुड़े मामले में UAPA के तहत मुकदमा दर्ज है। ट्रायल कोर्ट से तीसरी बार जमानत याचिका खारिज होने के बाद दोनों ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया है।
पिछले महीने हाईकोर्ट ने दोनों की याचिकाओं पर नोटिस जारी किया था। अब दिल्ली पुलिस ने अपना जवाब दाखिल करते हुए जमानत दिए जाने का विरोध किया है।
पुलिस का तर्क है कि सिर्फ किसी दूसरे मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि इन दोनों के मामले में परिस्थितियां बदल गई हैं। यानी पुलिस के मुताबिक, जमानत पर दोबारा सुनवाई के लिए जिस ‘बदली हुई परिस्थिति’ की जरूरत होती है, वह यहां मौजूद नहीं है।
पुलिस ने बताया- दोनों ‘मास्टरमाइंड’ में शामिल
दिल्ली पुलिस ने अपने जवाब में उमर खालिद और शरजील इमाम को 2020 के दंगों की कथित साजिश के ‘मास्टरमाइंड’ में शामिल बताया है। पुलिस ने गुलफिशा फातिमा से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का भी हवाला दिया।
पुलिस के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने उस मामले में आरोपियों के जोखिम के स्तर यानी ‘रिस्क प्रोफाइल’ को अलग-अलग माना था। इसी आधार पर पुलिस का कहना है कि सभी आरोपियों के मामलों को एक जैसा नहीं देखा जा सकता। उसके मुताबिक, खालिद और इमाम की हिरासत को लेकर सुप्रीम कोर्ट के पहले के निष्कर्ष अभी भी महत्वपूर्ण हैं।
सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले को लेकर क्या है पुलिस की दलील?
दोनों की ओर से ‘सैयद इफ्तिखार अंद्राबी बनाम NIA’ मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिए जाने की बात सामने आई है। उनका तर्क है कि इस फैसले को देखते हुए परिस्थितियों में बदलाव माना जा सकता है और इसी आधार पर जमानत पर फिर से विचार होना चाहिए।
दिल्ली पुलिस इससे सहमत नहीं है। उसका कहना है कि अंद्राबी मामले का फैसला दिल्ली दंगों के मामले से संबंधित नहीं है। पुलिस के अनुसार, उस फैसले में गुलफिशा फातिमा मामले में सुप्रीम कोर्ट की दूसरी पीठ द्वारा दर्ज किए गए तथ्यात्मक निष्कर्षों पर कोई सवाल नहीं उठाया गया।
इसलिए पुलिस का कहना है कि अंद्राबी फैसले को आधार बनाकर पहले से दिए गए निष्कर्षों को अप्रभावी नहीं किया जा सकता।
आगे की लड़ाई अब हाईकोर्ट में, जमानत पर नजर
इस मामले में एक अहम बात यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले गुलफिशा फातिमा और कुछ अन्य सह-आरोपियों को जमानत देते समय उमर खालिद और शरजील इमाम के लिए आगे जमानत मांगने की गुंजाइश रखी थी। अदालत ने कहा था कि सुरक्षित गवाहों के बयान दर्ज होने के बाद या सुप्रीम कोर्ट के फैसले के एक साल बाद वे दोबारा जमानत याचिका दाखिल कर सकते हैं।
अब दोनों उसी प्रक्रिया के तहत हाईकोर्ट पहुंचे हैं। लेकिन दिल्ली पुलिस का ताजा जवाब साफ संकेत देता है कि वह जमानत के रास्ते में मजबूती से आपत्ति दर्ज करा रही है।
आम पाठक के लिए इस मामले का महत्व इसलिए भी है क्योंकि यह सिर्फ दो आरोपियों की जमानत का सवाल नहीं है। अदालत में होने वाली यह कानूनी बहस UAPA जैसे कड़े कानून में जमानत के मानदंड और ‘परिस्थितियों में बदलाव’ की व्याख्या से भी जुड़ी है। फिलहाल अंतिम फैसला दिल्ली हाईकोर्ट को करना है।



)