जमीन पर मालिकाना हक का पुराना विवाद है तो सरकार नहीं कर सकती तुरंत बेदखली, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

जमीन पर मालिकाना हक का पुराना विवाद है तो सरकार नहीं कर सकती तुरंत बेदखली, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

जमीन के मालिकाना हक को लेकर अगर विवाद पुराना और वास्तविक है, तो सरकार केवल अपनी दावेदारी के आधार पर किसी व्यक्ति या संस्था को तुरंत जमीन से बेदखल नहीं कर सकती। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ किया है कि गंभीर मालिकाना विवाद का निपटारा समरी प्रोसीडिंग यानी तुरंत बेदखली की प्रक्रिया के जरिए नहीं किया जा सकता। ऐसे मामलों में पहले यह तय होना जरूरी है कि जमीन का असली मालिक कौन है। कोर्ट ने यह टिप्पणी आंध्र प्रदेश की 40.65 एकड़ जमीन से जुड़े लंबे समय से चले आ रहे विवाद में की है।

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने आंध्र प्रदेश असाइन्ड लैंड (ट्रांसफर पर रोक) एक्ट, 1977 के संदर्भ में यह फैसला सुनाया। मामला नेल्लोर की जमीन से जुड़ा था, जिस पर सरकार का दावा था कि यह असाइन्ड लैंड है और इसे ट्रांसफर नहीं किया जा सकता।

40.65 एकड़ जमीन से शुरू हुआ विवाद, कई दशक पुराना है मामला

इस मामले की कहानी काफी पुरानी है। रिकॉर्ड के मुताबिक, संबंधित जमीन वर्ष 1920 से निजी कब्जे में थी। बाद में यह जमीन बी.जे. राव को विरासत में मिली। उन्होंने जमीन के अलग-अलग हिस्से बेचे। इसी क्रम में 1980 में सरकार पेपर मिल्स को 46.23 एकड़ जमीन बेची गई।

बाद में सरकार पेपर मिल्स बंद हो गई और कंपनी लिक्विडेशन में चली गई। वर्ष 2001 में ऑफिशियल लिक्विडेटर ने कंपनी की संपत्ति का कब्जा अपने हाथ में लिया। इसके बाद कंपनी कोर्ट की अनुमति से संपत्ति को सार्वजनिक नीलामी के लिए रखा गया।

इस नीलामी में जे.के. शुगर मिल्स लिमिटेड ने 7.80 करोड़ रुपये की बोली लगाकर सफलता हासिल की। लेकिन नीलामी के समय सरकार ने आपत्ति दर्ज कराई। सरकार का कहना था कि विवादित 40.65 एकड़ जमीन असल में सरकार की ओर से आवंटित जमीन है और इसे बेचा नहीं जा सकता।

इसके बावजूद कंपनी कोर्ट ने कुछ शर्तों के साथ बिक्री को मंजूरी दे दी। बाद में हाईकोर्ट की अपीलीय अदालत ने नीलामी की मंजूरी रद्द कर दी। मामला आखिरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- पुराने विवाद को ‘समरी बेदखली’ से नहीं सुलझा सकते

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए कहा कि जब जमीन के मालिकाना हक पर गंभीर और वास्तविक विवाद मौजूद हो, तब सरकार समरी बेदखली की शक्ति का इस्तेमाल उस विवाद का फैसला करने के लिए नहीं कर सकती।

जस्टिस के. विनोद चंद्रन द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि जमीन पर दावा करने वाले पक्ष रजिस्टर्ड डीड, सेल डीड और म्यूटेशन एंट्री के आधार पर अपने मालिकाना हक की बात कर रहे हैं। ऐसे दस्तावेज मौजूद होने के बावजूद सरकार यह नहीं कह सकती कि उसे पहले से हुई मंजूरियों या म्यूटेशन एंट्री की जानकारी नहीं थी।

कोर्ट ने यह भी गौर किया कि कुछ परिस्थितियों में सरकारी एजेंसी की ओर से संपत्ति का अधिग्रहण किया जाना इस बात का संकेत देता है कि उस समय संपत्ति पर निजी लोगों का मालिकाना हक माना गया था।

ऐसे में जब जमीन पर लंबे समय से कब्जा है और मालिकाना हक को लेकर विवाद भी पुराना है, तो सीधे बेदखली का रास्ता अपनाना उचित नहीं होगा।

थुम्माला कृष्णा राव केस का भी दिया हवाला

सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने फैसले ‘आंध्र प्रदेश सरकार बनाम थुम्माला कृष्णा राव और अन्य’ का भी उल्लेख किया। इस मामले में भी सरकार और दूसरे पक्ष के बीच जमीन के मालिकाना हक को लेकर विवाद था।

उस फैसले में कोर्ट ने कहा था कि अगर यह सवाल ही विवादित है कि जमीन का मालिकाना हक सरकार को अधिग्रहण के जरिए मिला या बाद में किसी दूसरे पक्ष ने लंबे कब्जे के आधार पर अपने अधिकार का दावा किया, तो इसका फैसला नियमित मुकदमे में होना चाहिए।

यानी सरकार की ओर से बेदखली की संक्षिप्त प्रक्रिया का इस्तेमाल करके ऐसे जटिल सवालों का अंतिम समाधान नहीं किया जा सकता।

मौजूदा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि सरकार की दावेदारी के सामने दूसरी तरफ भी लंबे कब्जे और रजिस्टर्ड दस्तावेजों से जुड़े दावे मौजूद हैं। इसलिए इसे महज प्रशासनिक कार्रवाई से खत्म नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकार अपने दावे को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत पेश नहीं कर पाई।

नीलामी प्रक्रिया फिर शुरू करने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सीधा असर नीलामी की कार्यवाही पर पड़ा है। कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए संबंधित नीलामी प्रक्रिया को फिर से शुरू करने का निर्देश दिया है।

इस फैसले का व्यापक महत्व यह है कि मालिकाना हक को लेकर वास्तविक और लंबे समय से चला आ रहा विवाद सिर्फ प्रशासनिक आदेश से खत्म नहीं किया जा सकता। अगर दोनों पक्ष जमीन पर अपना अधिकार साबित करने के लिए दस्तावेज और अलग-अलग कानूनी दावे पेश कर रहे हैं, तो पहले उस विवाद का उचित न्यायिक समाधान जरूरी होगा।

आम जमीन मालिकों और संपत्ति से जुड़े विवादों के लिहाज से यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें सुप्रीम कोर्ट ने बेदखली की शक्ति और मालिकाना हक तय करने के बीच स्पष्ट अंतर किया है। सरकार के पास कानून के तहत कार्रवाई का अधिकार हो सकता है, लेकिन उस अधिकार का इस्तेमाल किसी जटिल और वास्तविक स्वामित्व विवाद का विकल्प बनकर नहीं किया जा सकता।

Case Title: M/s Circar Paper Mills Ltd. v. District Collector, Nellore Distt. & Ors. (with connected matters)