सुप्रीम कोर्ट की BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा को दो टूक, ‘आप चुने हुए चेयरमैन नहीं, प्रो-टेम हैं’, बड़े फैसलों पर AG- SG को करना होगा शामिल

सुप्रीम कोर्ट की BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा को दो टूक, ‘आप चुने हुए चेयरमैन नहीं, प्रो-टेम हैं’, बड़े फैसलों पर AG- SG को करना होगा शामिल

सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा के अधिकारों की सीमा को लेकर बुधवार को अहम टिप्पणी की। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने साफ किया कि नई BCI के चुनाव होने तक मिश्रा का रोजमर्रा का कामकाज संभालना जारी रह सकता है, लेकिन उनकी स्थिति लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए स्थायी चेयरमैन जैसी नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस अंतरिम व्यवस्था के दौरान BCI कोई महत्वपूर्ण नीतिगत फैसला लेती है तो भारत के अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल को उसमें शामिल किया जाना चाहिए।

यह टिप्पणी उन याचिकाओं की सुनवाई के दौरान आई, जिनमें मनन कुमार मिश्रा के BCI चेयरमैन के रूप में निर्धारित कार्यकाल से अधिक समय तक बने रहने पर सवाल उठाया गया है। कोर्ट की टिप्पणी का सीधा असर BCI के फैसले लेने की प्रक्रिया और उसकी संस्थागत जवाबदेही पर पड़ सकता है।

‘रोजमर्रा का काम संभालें, लेकिन नीति तय करने का अधिकार नहीं’

CJI सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने BCI की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गुरु कृष्ण कुमार से कहा कि मौजूदा स्थिति को स्पष्ट तौर पर समझना जरूरी है। जस्टिस बागची ने कहा कि राज्य बार काउंसिलों में चुनाव होने और उसके बाद नई BCI के गठन तक मिश्रा को प्रो-टेम चेयरमैन की भूमिका में देखा जाना चाहिए।

अदालत के मुताबिक, इस व्यवस्था में रोजमर्रा के प्रशासनिक कामकाज को जारी रखने में कोई समस्या नहीं है। लेकिन इसे निर्वाचित नेतृत्व के बराबर नहीं माना जा सकता।

यानी BCI के सामने अब एक तरह की दोहरी जिम्मेदारी है। संस्था का सामान्य काम चलता रहे, लेकिन ऐसे फैसले न लिए जाएं जिनका व्यापक नीतिगत असर हो और जिनके लिए पूर्ण निर्वाचित निकाय की जरूरत मानी जा सकती है।

बड़े पॉलिसी फैसलों में AG और SG की भूमिका अहम

सुप्रीम कोर्ट ने इस अंतरिम व्यवस्था में अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल की भूमिका पर भी जोर दिया। जस्टिस बागची ने कहा कि दोनों BCI के स्थायी पदेन सदस्य हैं। इसलिए जब काउंसिल के सामने महत्वपूर्ण नीतिगत असर वाला कोई मामला आए तो उन्हें बैठक में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया जा सकता है।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि AG और SG को BCI के हर छोटे-बड़े रोजमर्रा के काम में शामिल करने की जरूरत नहीं है। उनकी भागीदारी खास तौर पर महत्वपूर्ण नीतिगत मामलों तक सीमित रखी जा सकती है।

BCI की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मनिंदर सिंह और गुरु कृष्ण कुमार ने इस सुझाव पर सहमति जताई। BCI ने कोर्ट के सामने यह आश्वासन भी दिया कि नीतिगत फैसलों में अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल को शामिल किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने इस आश्वासन को रिकॉर्ड पर लिया।

NALSAR विवाद के बाद उठे थे मिश्रा के कार्यकाल पर सवाल

मनन कुमार मिश्रा के कार्यकाल को लेकर दायर याचिकाओं का संदर्भ NALSAR से जुड़े विवाद से भी जुड़ा है। इस विवाद में मिश्रा ने NALSAR के एक ग्रेजुएट के एनरोलमेंट के खिलाफ निर्देश जारी किए थे। इसकी वजह यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में CJI सूर्य कांत को अतिथि के तौर पर बुलाए जाने पर उनकी आपत्ति बताई गई थी।

इस फैसले के बाद काफी आलोचना हुई और बाद में मिश्रा ने माफी मांगी थी। इसी घटनाक्रम के बाद उनके BCI चेयरमैन के रूप में बने रहने और अधिकारों को लेकर सवाल अदालत के सामने पहुंचे।

हालांकि मौजूदा सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट का मुख्य फोकस BCI की अंतरिम व्यवस्था और नई निर्वाचित काउंसिल के गठन पर रहा। जस्टिस बागची ने यह भी स्पष्ट किया कि अदालत किसी तरह की ‘दिखावटी लड़ाई’ को बढ़ावा नहीं देना चाहती। प्राथमिकता संस्था की अखंडता बनाए रखना है।

नई BCI के गठन की प्रक्रिया तेज करने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य बार काउंसिलों की चुनाव प्रक्रिया और उनके नोटिफिकेशन को जल्द पूरा करने की दिशा में भी निर्देश दिए हैं। मकसद यह है कि राज्य बार काउंसिल समय पर अपने प्रतिनिधि चुन सकें और उसके बाद नई चुनी हुई BCI का गठन हो सके।

इसका महत्व सिर्फ वकीलों तक सीमित नहीं है। BCI देश में कानूनी पेशे से जुड़े कई महत्वपूर्ण नियामकीय और नीतिगत मामलों में भूमिका निभाती है। इसलिए यह सवाल कि संस्था का नेतृत्व किस वैधानिक और लोकतांत्रिक आधार पर काम कर रहा है, व्यापक संस्थागत महत्व रखता है।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम व्यवस्था के लिए रास्ता साफ रखा है। मनन कुमार मिश्रा रोजमर्रा के कामकाज को संभाल सकते हैं, लेकिन महत्वपूर्ण नीतिगत फैसलों के मामले में अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल की भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी। साथ ही अदालत का जोर जल्द से जल्द निर्वाचित BCI के गठन पर है।

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान, चंदर उदय सिंह, शोभा गुप्ता, संजय हेगड़े और गोपाल शंकरनारायणन ने दलीलें रखीं।