भारतीय ऑटो कंपोनेंट इंडस्ट्री के लिए बड़ी तस्वीर सिर्फ बढ़ते कारोबार की नहीं है। उद्योग में करीब 98,000 करोड़ रुपये का स्टॉक ऐसी जगह अटका हुआ है, जिसे बेहतर मैनेजमेंट के जरिए काफी हद तक कारोबार में वापस लगाया जा सकता है। वेक्टर कंसल्टिंग ग्रुप की रिपोर्ट के मुताबिक, स्टॉक मैनेजमेंट में सुधार होने पर 29,000 करोड़ से 39,000 करोड़ रुपये तक की रकम रिलीज हो सकती है। यह पैसा कंपनियों के लिए कार्यशील पूंजी यानी Working Capital का काम कर सकता है। खास तौर पर MSME सेक्टर को इससे करीब 4,000 करोड़ से 5,600 करोड़ रुपये का फायदा मिलने का अनुमान है।
98 हजार करोड़ का स्टॉक, लेकिन असली मौका कितना बड़ा?
भारत के ऑटो कंपोनेंट उद्योग में MSME की भूमिका काफी बड़ी है। रिपोर्ट के मुताबिक, देश के करीब 80 फीसदी ऑटो कंपोनेंट निर्माता MSME श्रेणी में आते हैं। ऐसे में स्टॉक में फंसी पूंजी का सवाल सिर्फ कंपनियों की बैलेंस शीट तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध उनकी रोजमर्रा की नकदी जरूरत, निवेश क्षमता और आगे बढ़ने की रफ्तार से है।
वेक्टर की रिपोर्ट बताती है कि जो कंपनियां खपत-आधारित इस्तेमाल यानी consumption-based usage approach अपनाती हैं, वे अपने स्टॉक में करीब 30 से 40 फीसदी तक की कमी ला सकती हैं। इससे कंपनी का पैसा अनावश्यक रूप से इन्वेंट्री में फंसा रहने के बजाय दूसरे कारोबारी कामों में लगाया जा सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत के ऑटो कंपोनेंट MSME सेक्टर का कुल राजस्व करीब 2.4 लाख करोड़ से 2.9 लाख करोड़ रुपये के बीच है। यहां उत्पादकता में सिर्फ 30 फीसदी सुधार भी बड़ा असर डाल सकता है। इससे अनुमानित तौर पर 74,000 करोड़ से 88,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त सालाना राजस्व पैदा हो सकता है।
क्षमता मौजूद है, फिर भी उत्पादन में क्यों नहीं बदल रही?
रिपोर्ट का एक अहम निष्कर्ष यह है कि समस्या सिर्फ क्षमता बढ़ाने की नहीं है। कंपनियों के संयंत्र औसतन 75 से 85 फीसदी क्षमता उपयोग पर चल रहे हैं। इसके बावजूद 91 फीसदी उत्तरदाताओं ने क्षमता को बड़ी चुनौती बताया।
इसके पीछे कई ऑपरेशनल वजहें हैं। बार-बार होने वाले बदलाव, गुणवत्ता में कमी, दोबारा काम करने की जरूरत और सामग्री के प्रभावी प्रवाह में रुकावट जैसी समस्याएं वास्तविक उत्पादक क्षमता को घटा देती हैं। यानी मशीनें और प्लांट मौजूद हैं, लेकिन उपलब्ध क्षमता का पूरा हिस्सा उत्पादक आउटपुट में तब्दील नहीं हो पा रहा।
वेक्टर कंसल्टिंग ग्रुप के मैनेजिंग पार्टनर रविंद्र पटकी ने भी इसी तरफ इशारा किया। उनके मुताबिक, अवसर केवल नई क्षमता जोड़ने में नहीं है। मौजूदा क्षमता का बड़ा हिस्सा ही अभी उत्पादक उत्पादन में पूरी तरह नहीं बदल पा रहा है।
MSME के लिए अगला फोकस सिर्फ पैसा नहीं, Productivity भी
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि 95 फीसदी उद्योग नेताओं का मानना है कि MSME भविष्य की ग्रोथ के लिए पर्याप्त निवेश नहीं कर रहे हैं। यह अध्ययन ऑटोमोटिव कंपोनेंट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ACMA) के 66वें वार्षिक सत्र में जारी किया गया।
अध्ययन में भविष्य की प्रतिस्पर्धा के लिए जरूरी क्षमताओं और मौजूदा क्षमताओं के बीच बड़ा अंतर पाया गया। इसके लिए ऑटोमोटिव MSME सप्लायर्स और Tier-1 तथा Tier-2 कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारियों से इनपुट लिया गया। जुलाई से अगस्त 2026 के बीच 21 वरिष्ठ उद्योग अधिकारियों से डेटा जुटाया गया।
रिपोर्ट के मुताबिक, सामग्री लागत को हटाने के बाद उत्पादकता सुधार से करीब 29,000 करोड़ से 44,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त मूल्य पूल तैयार हो सकता है। अगर कंपनियां ऑपरेशनल सुधारों के जरिए नकदी मुक्त करती हैं और उसे नई क्षमताओं में निवेश करती हैं, तो इससे एक ऐसा निवेश चक्र बन सकता है जिसमें बेहतर संचालन से पूंजी निकले और वही पूंजी आगे की ग्रोथ में लगे।
भारत की ऑटो सप्लाई चेन के लिए क्यों अहम है यह रिपोर्ट?
ऑटो इंडस्ट्री तेजी से बदल रही है। वाहनों की वैल्यू में बैटरी, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स और इंटीग्रेटेड इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम की भूमिका बढ़ रही है। ऐसे में भारतीय सप्लायर्स के लिए सिर्फ मौजूदा ऑर्डर पूरे करना पर्याप्त नहीं होगा। उन्हें बदलती तकनीक और भविष्य की सप्लाई चेन की जरूरतों के हिसाब से अपनी क्षमताएं भी मजबूत करनी होंगी।
रविंद्र पटकी के मुताबिक, ऑपरेशंस में फंसी नकदी को बाहर निकालना और मौजूदा कारोबार की अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाना इस दिशा में महत्वपूर्ण होगा। इससे जो अतिरिक्त संसाधन उपलब्ध होंगे, उन्हें नई क्षमताएं तैयार करने में लगाया जा सकता है।
भारत की घरेलू लोकलाइजेशन और ग्लोबल सोर्सिंग की अगली लहर का फायदा कितना मिलेगा, इसमें सप्लायर इकोसिस्टम की मजबूती अहम भूमिका निभाएगी। इसलिए 98,000 करोड़ रुपये के स्टॉक का आंकड़ा केवल इन्वेंट्री का मामला नहीं है। इसके पीछे यह सवाल भी है कि भारतीय ऑटो कंपोनेंट MSME अपनी मौजूदा पूंजी और क्षमता का कितना बेहतर इस्तेमाल कर पाते हैं।


