300 से ज्यादा हेलिकॉप्टर यात्राओं का था आरोप
यह मामला सामाजिक कार्यकर्ता और पेशे से वकील सुधीर चरण मोहंती की शिकायत से जुड़ा है। शिकायतकर्ता का आरोप था कि कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं की ओर से दायर RTI आवेदनों से 500 करोड़ रुपये से ज्यादा के कथित गबन का खुलासा हुआ। उनका दावा था कि इस रकम का इस्तेमाल अलग-अलग जिलों में बैठकों और चुनावी कार्यक्रमों के लिए 300 से ज्यादा हेलिकॉप्टर यात्राओं में किया गया।
मोहंती ने इस मामले में 14 अगस्त 2024 को भुवनेश्वर के कैपिटल पुलिस स्टेशन में लिखित शिकायत दी थी। उनका कहना था कि पुलिस ने FIR दर्ज नहीं की। इसके बाद उन्होंने भुवनेश्वर के DCP को भी शिकायत भेजी। वहां से भी कार्रवाई नहीं होने पर उन्होंने भुवनेश्वर के सब-डिविजनल ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (SDJM) की अदालत का रुख किया।
लेकिन SDJM ने शिकायत को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया। इसके पीछे मुख्य तौर पर दो वजहें बताई गईं—BNSS की धारा 173(4) के तहत जरूरी प्रक्रिया का पालन नहीं होना और शिकायत में ठोस सामग्री के बजाय व्यापक यानी ‘ओम्निबस’ आरोप होना।
सेशंस कोर्ट में भी नहीं बदला फैसला
मजिस्ट्रेट के आदेश से असंतुष्ट होकर सुधीर चरण मोहंती ने BNSS की धारा 438(1) के तहत सेशंस कोर्ट में रिवीजन याचिका दायर की। मामले की सुनवाई खुर्दा के सेशंस जज बिरंची नारायण महंती ने की।
पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक और वी. कार्तिकेयन पांडियन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक परीजा ने अदालत में दलील रखी। उन्होंने कहा कि पुलिस स्टेशन में दी गई शिकायत की सही सामग्री DCP को भेजना जरूरी था। लेकिन शिकायतकर्ता ने मूल शिकायत की कॉपी के बजाय एक संक्षिप्त पत्र DCP को दिया। बचाव पक्ष के मुताबिक, इसे BNSS की धारा 173(4) के तहत जरूरी अनुपालन नहीं माना जा सकता।
अदालत ने पुलिस स्टेशन में दी गई शिकायत, DCP को भेजे गए पत्र और मजिस्ट्रेट के सामने पेश की गई शिकायत—इन तीनों दस्तावेजों को देखा। कोर्ट ने पाया कि तीनों में लगाए गए आरोप एक जैसे नहीं थे। DCP को भेजे गए पत्र में भी आरोप काफी व्यापक थे।
DCP को शिकायत भेजने के तरीके पर भी सवाल
कोर्ट ने एक और अहम प्रक्रियात्मक कमी की ओर इशारा किया। BNSS की धारा 173(4) के मुताबिक, पुलिस द्वारा FIR दर्ज करने से इनकार किए जाने के बाद शिकायत की सामग्री संबंधित पुलिस अधीक्षक को डाक के जरिए भेजी जानी चाहिए।
इस मामले में अदालत ने पाया कि 14 अगस्त या 19 अगस्त 2024 की रिपोर्ट DCP को डाक से नहीं भेजी गई थी। शिकायतकर्ता के मुताबिक, इसे DCP कार्यालय में जाकर दिया गया था। लेकिन अदालत के सामने इसकी प्राप्ति को प्रमाणित करने वाला पर्याप्त रिकॉर्ड भी नहीं रखा गया।
यानी अदालत के सामने सिर्फ आरोपों की गंभीरता ही सवाल नहीं थी। शिकायत दर्ज कराने की कानूनी प्रक्रिया भी उतनी ही महत्वपूर्ण थी। कोर्ट ने माना कि इस प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ।
कोर्ट ने कहा- आरोपों के समर्थन में ठोस सामग्री नहीं
सेशंस कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के 2024 के Priti Agarwalla & Ors. v. State of GNCT of Delhi & Ors. फैसले का भी हवाला दिया। अदालत ने कहा कि BNSS की धारा 175(3) के तहत किसी शिकायत को पुलिस जांच के लिए भेजने से पहले मजिस्ट्रेट को यह संतुष्ट होना जरूरी है कि शिकायत में किसी संज्ञेय अपराध का आधार बनता है।
इस मामले में कोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता अपने आरोपों के समर्थन में कोई ठोस दस्तावेज या सामग्री पेश नहीं कर सके। अदालत के शब्दों में, आरोपों को साबित करने के लिए एक ‘स्क्रैप ऑफ पेपर’ तक पेश नहीं किया गया।
कोर्ट ने यह भी माना कि BNSS की धारा 33 के तहत शिकायतकर्ता के पास इस शिकायत को दाखिल करने का आवश्यक locus standi यानी कानूनी अधिकार नहीं था।
इन सभी पहलुओं को देखते हुए खुर्दा के सेशंस जज ने मजिस्ट्रेट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और उसे बरकरार रखा। इस तरह नवीन पटनायक और वी. कार्तिकेयन पांडियन के खिलाफ यह शिकायत फिलहाल अदालत में आगे नहीं बढ़ेगी।
मामला Sudhir Charan Mohanty v. Sri Vairab Karthikeyan Pandian & Anr., Criminal Revision No. 171 of 2026 से संबंधित है। अदालत ने यह आदेश 2 सितंबर 2026 को पारित किया।


