प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने वाले लाखों शिक्षकों के लिए सुप्रीम कोर्ट से जुड़ी एक अहम खबर सामने आई है। देशभर के निजी स्कूल शिक्षकों के लिए पेंशन, मेडिकल सुविधा, बीमा, रिटायरमेंट के बाद आर्थिक सुरक्षा और दूसरे सामाजिक सुरक्षा लाभों को लेकर दायर जनहित याचिका (PIL) पर सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने केंद्र सरकार, सभी राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजुकेशन (NCTE) समेत संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद होगी।
इस याचिका का मुद्दा सिर्फ शिक्षकों की नौकरी तक सीमित नहीं है। सवाल यह है कि निजी स्कूलों में लंबे समय तक पढ़ाने वाले शिक्षक रिटायरमेंट के बाद किस तरह की सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा पाएं। याचिकाकर्ता का कहना है कि फिलहाल देशभर में इस संबंध में कोई एक समान और व्यापक व्यवस्था नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा निजी स्कूल शिक्षकों की सुरक्षा का मुद्दा
ऑल-इंडिया टीचर्स फेडरेशन की नेशनल कोऑर्डिनेटर लिगीमोल जॉर्ज ने एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड दीपक प्रकाश के जरिए यह PIL दाखिल की है। याचिका में केंद्र सरकार से एक तय समय-सीमा के भीतर निजी स्कूल शिक्षकों के कल्याण और सोशल सिक्योरिटी के लिए राष्ट्रीय नीति तथा प्रभावी कानूनी या प्रशासनिक ढांचा तैयार करने पर विचार करने की मांग की गई है।
याचिका में कहा गया है कि निजी स्कूलों के शिक्षक शिक्षा के संवैधानिक उद्देश्य, खासकर आर्टिकल 21A के तहत शिक्षा के अधिकार को लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके बावजूद उनके लिए सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी व्यवस्था अलग-अलग कानूनों, राज्य के नियमों, स्कूल प्रबंधन की नीतियों और रोजगार अनुबंधों पर निर्भर करती है।
इसका असर यह होता है कि समान काम करने वाले शिक्षकों को अलग-अलग जगहों पर अलग सेवा शर्तें और रिटायरमेंट लाभ मिल सकते हैं।
पेंशन से मेडिकल बीमा तक, आखिर मांग क्या है?
याचिका में निजी स्कूल शिक्षकों के लिए एक National Private School Teachers Welfare Board बनाने का प्रस्ताव रखा गया है। इसके अलावा एक व्यापक सामाजिक सुरक्षा और रिटायरमेंट वेलफेयर सिस्टम तैयार करने की मांग की गई है।
प्रस्तावित व्यवस्था में पेंशन, प्रोविडेंट फंड और ग्रेच्युटी से जुड़े लाभों का पालन सुनिश्चित करने के साथ मेडिकल सहायता, स्वास्थ्य और दुर्घटना बीमा, विकलांगता सहायता, परिवार कल्याण और रिटायरमेंट के बाद आर्थिक सुरक्षा जैसे प्रावधान शामिल करने की मांग है।
याचिका के मुताबिक देश में अलग-अलग श्रेणी के श्रमिकों के लिए विशेष कल्याणकारी व्यवस्थाएं बनाई गई हैं। इनमें निर्माण श्रमिक, बीड़ी श्रमिक, सिनेमा श्रमिक, मछुआरे, पत्रकार और असंगठित क्षेत्र के कामगार शामिल हैं। लेकिन निजी स्कूल शिक्षकों के लिए इसी तरह का कोई विशेष राष्ट्रीय कल्याण बोर्ड या एकीकृत संस्थागत व्यवस्था नहीं है।
मौजूदा कानून हैं, फिर समस्या कहां है?
याचिका में संसद की ओर से बनाए गए कई सामाजिक सुरक्षा और श्रम कानूनों का भी उल्लेख किया गया है। इनमें Employees’ State Insurance Act, 1948, Employees’ Provident Funds and Miscellaneous Provisions Act, 1952, Payment of Gratuity Act, 1972 और Code on Social Security, 2020 शामिल हैं।
हालांकि याचिकाकर्ता का तर्क है कि इन कानूनों के बावजूद निजी स्कूल शिक्षकों के लिए ऐसा कोई व्यापक और एकीकृत ढांचा नहीं है, जो उनकी नौकरी के पूरे जीवन चक्र और रिटायरमेंट के बाद की जरूरतों को कवर करे।
याचिका में दावा किया गया है कि अलग-अलग राज्यों और निजी संस्थानों में नियमों के अलग तरीके से लागू होने के कारण शिक्षकों को मिलने वाली सुरक्षा भी एक जैसी नहीं रहती। कई मामलों में शिक्षक मौजूदा कानूनों की प्रभावी सुरक्षा से बाहर रह सकते हैं या उन्हें सीमित लाभ मिल सकते हैं।
याचिका में इसे समान स्थिति वाले शिक्षकों के बीच संभावित मनमाने अंतर से जोड़ते हुए संविधान के आर्टिकल 14 का हवाला दिया गया है। इसके साथ आर्टिकल 21 और राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों से जुड़े आर्टिकल 38, 39, 41, 42 और 43 का भी उल्लेख किया गया है।
देश में 37 लाख से ज्यादा शिक्षक, इसलिए मामला बड़ा है
याचिका में सरकारी UDISE+ 2023-24 के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा गया है कि देश में करीब 14.72 लाख स्कूल, 98 लाख से ज्यादा शिक्षक और लगभग 24.8 करोड़ छात्र हैं। इनमें करीब 37,30,047 शिक्षक मान्यता प्राप्त निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों में काम करते हैं।
याचिकाकर्ता ने National Education Policy (NEP) 2020 का भी उल्लेख किया है। इसमें शिक्षकों को शिक्षा व्यवस्था की नींव बताते हुए उनके काम की परिस्थितियों में सुधार, पेशे की गरिमा और संस्थागत सहयोग पर जोर दिया गया है। लेकिन PIL में तर्क दिया गया है कि NEP 2020 निजी स्कूल शिक्षकों के लिए पेंशन या रिटायरमेंट के बाद सामाजिक सुरक्षा का ऐसा कानूनी अधिकार नहीं बनाती, जिसे सीधे लागू कराया जा सके।
याचिका में यह भी स्पष्ट किया गया है कि इसका उद्देश्य निजी स्कूलों और शिक्षकों के बीच व्यक्तिगत वेतन विवाद, नियुक्ति, प्रमोशन, कॉन्ट्रैक्ट या सर्विस से जुड़े मामलों को सुलझाना नहीं है। निजी स्कूलों के आंतरिक प्रशासन में हस्तक्षेप की मांग भी नहीं की गई है।
मांग इससे व्यापक है। याचिकाकर्ता चाहती हैं कि केंद्र शिक्षा, श्रम, सामाजिक सुरक्षा और वित्त से जुड़े मंत्रालयों तथा संबंधित संस्थाओं के साथ मिलकर मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा करे। इसके लिए अंतर-मंत्रालयी या विशेषज्ञ समिति बनाने और निजी स्कूल शिक्षकों के लिए एक समान न्यूनतम राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा मानक तैयार करने की मांग की गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इस मुद्दे पर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है। बेंच ने संबंधित सरकारों और संस्थाओं को नोटिस जारी कर उनका पक्ष मांगा है। अगली सुनवाई में इस मामले की दिशा और स्पष्ट हो सकती है।
Case Title: Ligimol George v. Union of India & Ors.


