POCSO में 20 साल की सजा पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, उम्र साबित नहीं हुई तो बदली सजा, रेप का दोष बरकरार

POCSO में 20 साल की सजा पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, उम्र साबित नहीं हुई तो बदली सजा, रेप का दोष बरकरार

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने POCSO से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए 20 साल की कठोर कैद की सजा को बदल दिया है। कोर्ट ने कहा कि POCSO Act की धारा 4 के तहत सजा देने के लिए अभियोजन पक्ष को यह साबित करना जरूरी है कि घटना के समय पीड़िता की उम्र 18 साल से कम थी। इस मामले में पीड़िता की नाबालिग उम्र ठोस दस्तावेजों से साबित नहीं हो सकी। हालांकि, कोर्ट ने यह भी माना कि उसके साथ रेप की घटना अभियोजन पक्ष ने पर्याप्त सबूतों के आधार पर साबित कर दी है। इसलिए POCSO की धारा 4 के बजाय IPC की धारा 376(1) के तहत दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए सजा 12 साल की कठोर कैद और 20 हजार रुपये जुर्माने में बदल दी गई।

20 साल की सजा क्यों बदली? पूरा मामला उम्र के सबूत पर अटका

मामला अक्टूबर 2019 का है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी ने देओसुंगा नदी के पास पीड़िता के साथ रेप किया था। इस मामले में पीड़िता के बयान को दो चश्मदीद गवाहों के बयानों से समर्थन मिला। मेडिकल जांच में भी डॉक्टर को हाइमन में फटन मिली थी और जांच के आधार पर 48 घंटे के भीतर पेनिट्रेशन के सबूत बताए गए थे।

ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को POCSO Act की धारा 4 के तहत दोषी माना था। इसके तहत उसे 20 साल की कठोर कैद और 20 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने IPC की धारा 376(1) के तहत आरोप तो तय किया था, लेकिन उस आरोप पर अलग से कोई निष्कर्ष दर्ज नहीं किया।

इसके बाद आरोपी ने CrPC की धारा 374(2) के तहत हाईकोर्ट में अपील की। उसकी ओर से पीड़िता के बयान में कथित विरोधाभासों और उसकी उम्र साबित न होने को प्रमुख आधार बनाया गया।

पीड़िता के बयान में अंतर था, लेकिन रेप की बात पर कोर्ट को भरोसा

अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई कि पीड़िता ने अलग-अलग मौकों पर आरोपी को पहचानने को लेकर अलग बातें कही थीं। एक जगह उसने कहा कि वह आरोपी को जानती थी, जबकि दूसरी जगह उसने बताया कि उसने उसे पहले कभी नहीं देखा और वह उसे नहीं जानती थी।

इसी तरह, उसके बयान में यह भी अंतर बताया गया कि वह नदी के पास पानी लेने गई थी या घटना से पहले शौच के लिए गई थी। CrPC की धारा 161 और 164 के तहत दिए गए बयानों और अदालत में दर्ज गवाही में इन बातों को लेकर अंतर था।

लेकिन हाईकोर्ट ने इन विरोधाभासों को मामले की बुनियादी कहानी को खत्म करने वाला नहीं माना। जस्टिस माइकल ज़ोथानखुमा और जस्टिस शमीमा जहान की डिवीजन बेंच ने कहा कि इन बयानों में कुछ अंतर जरूर हैं, लेकिन रेप की घटना के संबंध में पीड़िता का मुख्य बयान लगातार बना रहा।

कोर्ट ने माना कि उसके बयान की पुष्टि चश्मदीद गवाहों और मेडिकल साक्ष्यों से भी होती है। इसलिए आरोपी द्वारा पीड़िता के साथ रेप किए जाने की बात अभियोजन पक्ष साबित करने में सफल रहा।

उम्र साबित करने के लिए स्कूल या बर्थ सर्टिफिकेट नहीं मिला

मामले का सबसे अहम मोड़ पीड़िता की उम्र को लेकर आया। अभियोजन पक्ष ने उसकी जन्मतिथि 1 फरवरी 2006 बताई थी। यह जानकारी एक जब्ती सूची (Seizure List) में दर्ज होने का दावा किया गया था।

लेकिन हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल के दौरान न तो स्कूल सर्टिफिकेट और न ही जन्म प्रमाणपत्र अदालत के सामने पेश किया गया। रिकॉर्ड में भी इन दस्तावेजों की कॉपी मौजूद नहीं थी।

अभियोजन पक्ष ने जब्ती सूची को Exhibit-5 के तौर पर पेश किया था। मगर अदालत ने कहा कि सिर्फ जब्ती सूची को रिकॉर्ड में दाखिल कर देने से उसमें बताए गए स्कूल या जन्म प्रमाणपत्र की जानकारी अपने आप साबित नहीं हो जाती। अभियोजन पक्ष के गवाहों ने भी उस जब्ती सूची में दर्ज जानकारी को पर्याप्त रूप से प्रमाणित नहीं किया।

इसके बाद कोर्ट ने रेडियोलॉजिकल जांच रिपोर्ट पर ध्यान दिया। इस रिपोर्ट में पीड़िता की उम्र 14 से 16 साल के बीच बताई गई थी।

हाईकोर्ट ने उम्र के आकलन में संभावित अंतर को ध्यान में रखते हुए इस रिपोर्ट से मिलने वाली अधिकतम उम्र 16 साल मानी और उसमें दो साल का लाभ जोड़ा। इस आधार पर अदालत ने घटना के समय पीड़िता की उम्र 18 साल मानी। नतीजा यह हुआ कि POCSO Act के प्रावधान लागू करने के लिए जरूरी नाबालिग होने का तथ्य साबित नहीं माना गया।

POCSO हटा, लेकिन रेप का दोष नहीं; 12 साल की सजा बरकरार

हाईकोर्ट ने साफ किया कि पीड़िता की उम्र 18 साल से कम साबित नहीं होने का मतलब यह नहीं है कि रेप की घटना भी साबित नहीं हुई। अदालत ने उपलब्ध गवाहियों और मेडिकल साक्ष्यों को देखते हुए IPC की धारा 376(1) के तहत अपराध साबित माना।

इसी आधार पर POCSO Act की धारा 4 के तहत दी गई 20 साल की सजा को हटाकर आरोपी को IPC की धारा 376(1) के तहत 12 साल की कठोर कैद और 20 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई।

यानी हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पूरी तरह पलटा नहीं। उसने सिर्फ उस हिस्से में बदलाव किया, जहां POCSO Act के तहत दोषसिद्धि और सजा दी गई थी। बाकी मामले में रेप का दोष कायम रहा।

इस फैसले में उम्र साबित करने के कानूनी महत्व पर खास जोर दिया गया है। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि POCSO की धारा 4 के तहत दोषसिद्धि के लिए पीड़िता का 18 साल से कम होना साबित होना जरूरी है। केवल किसी रिकॉर्ड या जब्ती सूची में जन्मतिथि लिखे होने से उम्र का तथ्य अपने आप प्रमाणित नहीं हो जाता।

Case Title: Md. Majib Ali v. The State of Assam & Ors.