लखनऊ जिला एवं सेशन कोर्ट के आसपास सार्वजनिक जगहों पर बचे अवैध कब्जों को अब हटाने की कार्रवाई तेज होगी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अधिकारियों को कोर्ट परिसर और आसपास के सार्वजनिक क्षेत्रों में बचे सभी अवैध कब्जे हटाने का निर्देश दिया है। अदालत ने यह कार्रवाई अधिमानतः पांच सप्ताह के भीतर पूरी करने को कहा है। इससे पहले भी इस मामले में कार्रवाई हो चुकी है और कोर्ट को बताया गया कि 57 और अवैध कब्जे हटाए जा चुके हैं। इससे पहले 14 अवैध निर्माण हटाए गए थे।
यह मामला सिर्फ अतिक्रमण हटाने तक सीमित नहीं है। कोर्ट के सामने मुख्य चिंता सार्वजनिक रास्तों के इस्तेमाल और न्यायिक क्षेत्र के आसपास आम लोगों को होने वाली परेशानी को लेकर भी रही है।
57 कब्जे हटे, लेकिन हाईकोर्ट ने कहा- कार्रवाई अभी बाकी है
जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस राजीव भारती की पीठ दो याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इन याचिकाओं में लखनऊ जिला एवं सेशन कोर्ट परिसर और उसके आसपास सार्वजनिक क्षेत्रों में कथित अवैध कब्जों का मुद्दा उठाया गया था।
सुनवाई के दौरान लखनऊ नगर निगम के जोन-1 के जोनल अधिकारी ने 8 सितंबर 2026 के निर्देशों के तहत हटाए गए कब्जों की तस्वीरें भी अदालत के सामने पेश कीं। अधिकारियों की ओर से की गई कार्रवाई को कोर्ट ने संज्ञान में लिया, लेकिन यह भी साफ किया कि अभी पूरा काम समाप्त नहीं हुआ है।
हाईकोर्ट ने अपने 7 अप्रैल 2026 के आदेश के पैरा-9 में जिन अवैध कब्जों को हटाने का निर्देश दिया था, उन्हें पूरी तरह हटाने को कहा है। साथ ही कार्रवाई के दौरान 4 अगस्त के आदेश में तय की गई सावधानियों का पालन करने का निर्देश भी दिया गया है।
72 कब्जेदारों को पहले ही दिया गया था आखिरी मौका
इस मामले में अदालत ने पहले बचे हुए 72 कथित कब्जेदारों को एक और अवसर देने का निर्देश दिया था। 4 अगस्त के आदेश में कहा गया था कि कब्जेदार अपने चैंबर या दुकान खाली कर सकते हैं। अगर वे इसे खाली नहीं करना चाहते, तो सक्षम प्राधिकारी के सामने यह बताना होगा कि उस जगह पर उनका वैध अधिकार किस आधार पर है।
यदि कोई व्यक्ति अपने कब्जे का कानूनी आधार साबित करने में असफल रहता है, तो संबंधित अवैध निर्माण हटाया जा सकता है।
कोर्ट ने नोटिस की प्रक्रिया को लेकर भी स्पष्ट निर्देश दिए थे। जिन कब्जेदारों को व्यक्तिगत रूप से नोटिस नहीं मिल पाए, उनके लिए एक हिंदी और एक अंग्रेजी दैनिक में नोटिस प्रकाशित करने की बात कही गई थी। इसके बाद कम से कम 10 दिन का समय देने का निर्देश था।
तोड़फोड़ की कार्रवाई के लिए रविवार का दिन इस्तेमाल किया जा सकता है, ताकि कोर्ट के सामान्य कामकाज पर इसका असर न पड़े। संबंधित कब्जेदारों को कार्रवाई की तारीख की जानकारी पहले से देने को भी कहा गया था।
पुलिस-प्रशासन को साथ लेकर चलेगा नगर निगम
अदालत ने यह भी सुनिश्चित किया है कि कब्जा हटाने की कार्रवाई के दौरान कानून-व्यवस्था की स्थिति न बिगड़े। इसके लिए लखनऊ के पुलिस आयुक्त, जिलाधिकारी और नगर आयुक्त को आपस में समन्वय करने का निर्देश दिया गया है।
नगर निगम के अधिकारियों को जरूरत के मुताबिक पर्याप्त प्रशासनिक और पुलिस सहायता उपलब्ध कराने को कहा गया है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कार्रवाई में किसी तरह की बाधा पैदा करने पर कानून के अनुसार कदम उठाया जा सकता है।
यह निर्देश इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पहले की कार्रवाई के दौरान अधिवक्ताओं की ओर से विरोध की आशंका जताई गई थी। नगर निगम ने इसी वजह से पर्याप्त पुलिस और प्रशासनिक बल उपलब्ध कराने की मांग की थी।
सार्वजनिक रास्तों पर कब्जे से आम लोगों को हो रही थी परेशानी
इस पूरे मामले की शुरुआत जिला एवं सेशन कोर्ट परिसर के आसपास अवैध निर्माण और सार्वजनिक रास्तों पर कब्जे की शिकायतों से हुई थी। हाईकोर्ट के सामने यह बात भी आई थी कि जिला एवं सेशन कोर्ट, पुराने हाईकोर्ट परिसर, कलेक्ट्रेट, राजस्व परिषद, पुराने सदर तहसील परिसर, उप निबंधक कार्यालय, कमिश्नरेट, रेजीडेंसी पावर सब स्टेशन, बलरामपुर अस्पताल और कैसरबाग बस स्टेशन के आसपास सार्वजनिक स्थानों पर कब्जे से लोगों को परेशानी हो रही थी।
नगर निगम ने पहले अदालत को बताया था कि उसके आदेशों के बाद 100 से ज्यादा अवैध रूप से बनाए गए चैंबर हटाए जा चुके हैं। हालांकि, 72 चिन्हित कब्जों में शुरुआती कार्रवाई के दौरान केवल 14 ही हटाए जा सके थे। इसके बाद आगे की कार्रवाई प्रभावित हुई।
नगर निगम के मुताबिक, सभी 72 कब्जेदारों को नोटिस दिए गए थे, लेकिन वे यह स्पष्ट नहीं कर सके कि चैंबर या दुकानों पर उनका कब्जा किस वैध आधार पर है।
अब हाईकोर्ट ने मामले में कार्रवाई को अंतिम चरण तक ले जाने के संकेत दिए हैं। अधिकारियों को शेष अवैध कब्जे हटाने का काम तेजी से पूरा करने और इसे पांच सप्ताह के भीतर करने को कहा गया है।
मामले की अगली सुनवाई 26 अक्टूबर 2026 को होगी। वहीं, 4 अगस्त के आदेश के तहत वकीलों को दी गई सुरक्षा अगली सुनवाई तक जारी रहेगी।
आम लोगों के लिए इसका सीधा असर सार्वजनिक रास्तों और कोर्ट परिसर के आसपास की आवाजाही पर पड़ सकता है। यदि आदेश के मुताबिक कार्रवाई पूरी होती है, तो इन इलाकों में सार्वजनिक स्थानों के इस्तेमाल को लेकर स्थिति पहले से बेहतर होने की उम्मीद है।



